ISRO का PSLV-C62 मिशन हुआ फेल, जानें कौन करेगा अरबों डॉलर के नुकसान की भरपाई

ISRO Mission Anvesha Failure: इसरो का PSLV-C62 मिशन तीसरे चरण में फेल हो गया. बताया गया कि तीसरे चरण में तकनीकी खराबी के चलते रॉकेट अपना रास्ता भटक गया. इस बड़े लॉन्च में करोड़ों डॉलर खर्च हुए थे.

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रॉकेट लॉन्च फेल होने पर कितना होता है नुकसान

भारत ने स्पेस सेक्टर में कई बड़े कीर्तिमान हासिल किए हैं, लेकिन कुछ मिशन ऐसे होते हैं, जो पूरे नहीं हो पाते हैं. ISRO यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन का साल 2026 का पहले मिशन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. मिशन 'PSLV-C62' रॉकेट के तीसरे चरण में गड़बड़ी आने के चलते ये फेल हो गया. पिछले साल भी PSLV-C61 मिशन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. ऐसे मिशनों पर अरबों डॉलर का खर्चा होता है, ऐसे में सवाल है कि एक मिशन फेल होने पर ISRO को कितना नुकसान होता है? आइए जानते हैं कि रॉकेट लॉन्च फेल होने पर होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होती है और ये स्पेस एजेंसी के लिए कितना बड़ा झटका होता है. 

रॉकेट लॉन्च क्यों हुआ था?

इसरो का PSLV-C62 रॉकेट आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केंद्र से 16 सैटेलाइट लेकर उड़ा था. EOS-N1 (अन्वेषा) और 14 सैटेलाइट्स को ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए ये रॉकेट लॉन्च किया गया था. ये सभी सैटेलाइट बारीक से बारीक चीजों की जानकारी देने और सर्विलांस को मजबूत बनाने के लिए लॉन्च किए गए थे. हालांकि ये रॉकेट सैटेलाइट्स को ऑर्बिट में स्थापित करने में असफल रहा और तीसरे चरण में ही रास्ता भटक गया. फिलहाल इसरो चीफ ने कहा है कि इसकी जांच चल रही है. 

लॉन्च में किनकी थी हिस्सेदारी? 

इस रॉकेट लॉन्च में कई देश और संस्थान भी शामिल थे. इनमें ऑर्बिटएड एयरोस्पेस, स्पेस किड्ज इंडिया, सीवी रमन ग्लोबल यूनिवर्सिटी, असम डॉन बॉस्को यूनिवर्सिटी, दयानंद सागर यूनिवर्सिटी और लक्ष्मण ज्ञानपीठ जैसे संगठन शामिल थे. इसके अलावा स्पेन, ब्राजील, थाईलैंड, यूके, नेपाल, मॉरीशस, लक्जमबर्ग, यूएई, सिंगापुर, फ्रांस और अमेरिका के संस्थानों की भी कुछ न कुछ भूमिका रही. हालांकि प्राइमरी कस्टमर रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) था, क्योंकि मुख्य पेलोड EOS-N1 (अन्वेषा) को डीआरडीओ ने ही तैयार किया था.

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कौन करता है भुगतान?

अब सवाल है कि इतने बड़े लॉन्च के फेल होने पर करोड़ों अरबों डॉलर के नुकसान की भरपाई कैसे होती है? दरअसल सैटेलाइट्स की कीमत को देखते हुए पहले ही इनका बीमा करवा लिया जाता है. ऐसे में स्पेस इंश्योरेंस कंपनियां ज्यादातर नुकसान की भरपाई करती हैं. हालांकि जरूरी नहीं है कि नुकसान की पूरी भरपाई हो पाए, इसमें मौजूद शर्तों के हिसाब से नेगोशिएशन किया जाता है और फिर आखिरी भुगतान की रकम तय होती है.  

नुकसान की भरपाई इस बात पर भी निर्भर करती है कि मिशन कब फेल हुआ है. अगर कोई रॉकेट लॉन्च होते ही फट जाता है या फिर ऑर्बिट में प्रवेश करते समय फेल होता है तो, ऐसे में बीमा कंपनी लगभग पूरी भरपाई करती है. हालांकि जब सैटेलाइट सफलतापूर्वक अलग हो जाते हैं और किसी टेक्निकल खराबी के चलते अपनी कक्षा में स्थापित नहीं हो पाते हैं तो ऐसे में नुकसान की भरपाई सैटेलाइट के मालिक को ही करनी पड़ सकती है. इसके लिए अलग से इन-ऑर्बिट इंश्योरेंस लेना होता है. यानी बीमा की रकम और कवरेज हर स्टेज के लिए अलग हो सकती है.

काफी कम कंपनियां देती हैं बीमा

स्पेस सेक्टर में इंश्योरेंस देना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. कई मिशन फेल होने के चलते स्पेस बीमा सेक्टर दबाव महसूस करता है और यही वजह है कि काफी गिनी-चुनी कंपनियां ही इसके लिए बीमा देती हैं. आमतौर पर स्पेस एजेंसियां ऐसे रॉकेट या सैटेलाइट का बीमा करवाते हैं, जिनकी कीमत अरबों डॉलर में होती है, वहीं छोटे सैटेलाइट्स का जोखिम खुद ऑपरेटर उठा लेते हैं. द फेडरल की रिपोर्ट के मुताबिक स्पेस सेक्टर में साल 2023 में लगभग 1 बिलियन डॉलर के क्लेम किए गए. 

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