भारत का खजाने से भरा मंदिर, जिसे एक नहीं कई बार लूटा गया; जान लीजिए पूरी कहानी

क्या आप जानते हैं कि सोमनाथ मंदिर को 17 बार लूटा गया, फिर भी इसका वैभव कभी कम नहीं हुआ. गजनवी की क्रूरता से लेकर आधुनिक भारत में लौह पुरुष सरदार पटेल के संकल्प तक, सोमनाथ मंदिर के बनने और बिगड़ने की कहानी काफी दिलचस्प है.

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Somnath Mandir Story

Somnath Mandir Story: भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर महज एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और अटूट आस्था का प्रतीक है. इतिहास की किताबों में सोमनाथ का नाम 'बरकत' और 'विनाश' दोनों के लिए दर्ज है. एक तरफ इसकी अकूत धन-संपत्ति थी, जिसने दुनियाभर के लुटेरों को आकर्षित किया, तो दूसरी तरफ इसकी वो शक्ति थी जो हर बार मलबे से निकलकर फिर से शिखर खड़ा कर देती थी. आइए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं इस मंदिर की कहानी, जो खजाने से भरा रहा है, जिसे मिटाने की कोशिशें तो बहुत हुईं, लेकिन उसका अस्तित्व कभी खत्म नहीं हुआ.

1000 साल पहले क्या हुआ

आज से ठीक 1,000 साल पहले की बात है. 6 जनवरी 1026 को सोमनाथ ने अपने इतिहास का सबसे खौफनाक मंजर देखा. गजनी का सुल्तान महमूद गजनवी, जो पहले ही कश्मीर, मथुरा और ग्वालियर में तबाही मचा चुका था, अपनी 30 हजार घुड़सवारों की सेना लेकर सोमनाथ के द्वार पर खड़ा था. उस समय मंदिर की भव्यता का आलम ये था कि वहां हजारों ब्राह्मण पूजा-पाठ में लीन रहते थे, सैकड़ों नर्तकियां और संगीतकार मंदिर की सेवा में थे. गजनवी के इतिहासकारों ने लिखा है कि जब वो मंदिर के भीतर पहुंचा, तो वहां की रत्नजड़ित दीवारों और सोने की जंजीरों को देखकर उसकी आंखें चौंधिया गईं. 15 दिनों तक चले भीषण संघर्ष और कत्लेआम के बाद गजनवी ने मंदिर को न सिर्फ लूटा बल्कि उसे पूरी तरह ध्वस्त कर दिया.

सोमनाथ मंदिर से गजनवी ने कितनी लूट की

विदेशी इतिहासकार रणबीर वोहरा और मिन्हाज-ए-सिराज के अनुसार, गजनवी यहां से करीब 6.5 टन सोना और बेशकीमती हीरे-जवाहरात ऊंटों पर लादकर ले गया था. इस हमले में करीब 50,000 हिंदुओं ने मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी.

सोमनाथ मंदिर में हवा में तैरता शिवलिंग देख दंग रह गए हमलावर

सोमनाथ के बारे में सबसे रोमांचक किस्सा 'हवा में तैरते शिवलिंग' का है. गजनवी के साथ आए यात्रियों और फारसी लेखक अल काजविनी ने अपनी डायरी में लिखा है कि मंदिर के गर्भगृह में मुख्य शिवलिंग बिना किसी सहारे के हवा में अधर में लटका हुआ था. ये नजारा देखकर हमलावर भी दंग रह गए थे.

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बाद में गजनवी के एक चतुर सहायक ने इसका रहस्य खोज निकाला. ये कोई जादू नहीं, बल्कि साइंस और इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना था. मंदिर की छत और फर्श में शक्तिशाली चुंबक (Magnets) लगाए गए थे, जिन्होंने लोहे से बनी उस भारी-भरकम शिवलिंग को चुंबकीय बल (Magnetic force) के जरिए बीच में स्थिर कर रखा था. जब गजनवी ने छत के पत्थर हटवाए, तो चुंबकीय संतुलन बिगड़ गया और शिवलिंग जमीन पर आ गया.

सोमनाथ मंदिर को कितनी बार लूटा गया

इतिहास बताता है कि महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को करीब 17 बार लूटा, लेकिन सोमनाथ का इतिहास बताता है कि इसे केवल गजनवी ने ही नहीं, बल्कि समय-समय पर कई इस्लामी आक्रांताओं ने निशाना बनाया, लेकिन हर विनाश के बाद एक नया निर्माण हुआ. इस पर सबसे पहला हमला 725 ई. में हुआ, जब सिंध के अरब गवर्नर अल जुनैद ने इसे पहली बार तोड़ा.

गजनवी की लूट 1025-26 ई. सबसे बड़ा हमला माना जाता है. 1299 ई. में दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुघ खान ने हमला कर अथाह संपत्ति लूटी. मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे दो बार 1665 और 1706 ई. में तोड़ने का आदेश दिया, ताकि वहां फिर कभी पूजा न हो सके. हर बार मंदिर टूटा, लेकिन प्रतिहार राजाओं, चालुक्य वंश के भीमदेव, राजा भोज और अहिल्याबाई होलकर जैसे शासकों ने इसे फिर से खड़ा किया.

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आधुनिक मंदिर का निर्माण किसने कराया

आजादी के बाद 13 नवंबर 1947 को भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ पहुंचे. वहां के खंडहरों को देखकर उनका हृदय भर आया. उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प किया, 'जब तक इस भव्य मंदिर का पुनरुद्धार नहीं हो जाता, मेरा काम अधूरा है.' महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि इसके निर्माण के लिए सरकारी पैसा नहीं, बल्कि जनता का चंदा इस्तेमाल होना चाहिए. तत्कालीन मंत्री और लेखक केएम मुंशी की देखरेख में ट्रस्ट बना और 1951 में मौजूदा भव्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ. पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की थी.

आज के सोमनाथ का वैभव

आज का सोमनाथ मंदिर 'मारू-गुर्जर' शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है. इसके मुख्य शिखर पर 10 टन वजन का स्वर्ण-जड़ित कलश स्थापित है. मंदिर के भीतर और बाहर की नक्काशी ऐसी है कि पर्यटक देखते रह जाते हैं. मंदिर के दक्षिण में एक 'बाण स्तंभ' है. इस पर लिखा है कि यहां से दक्षिण ध्रुव (South Pole) तक समुद्र के बीच कोई भी जमीन का टुकड़ा या बाधा नहीं है. प्राचीन भारतीयों का ये भौगोलिक ज्ञान आज भी वैज्ञानिकों को हैरान करता है.

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