क्या आपने भी खाई है 90s की ट्रेन वाली थाली? जान लें तब कैसा मिलता था खाना?

IRCTC से पहले रेलवे कैटरिंग जोनल लेवल पर चलती थी. तब इंडियन रेलवे में मिलने वाला खाना सिंपल और लोकल स्वाद से भरा होता था. मेन्यू में फूड आइटम्स कम हुआ करते थे, लेकिन सफर को यादगार बना देते थे. जानिए 1990 में ट्रेन में कैसा खाना मिलता था.

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सोन पापड़ी के डिब्बे, गुलाब जामुन की टिन, बेसन लड्डू कागज में लिपटे, क्रीम बिस्कुट और ग्लूकोज बिस्कुट के पैकेट मिल जाते थे.

Indian Railway Food History: देश में हर दिन करोड़ों लोग ट्रेन से सफर करते हैं. ज्यादातर लोग ट्रेन के अंदर ही केटरिंग से खाने का ऑर्डर करते हैं. आज के समय ट्रेन में QR कोड, डिजिटल मेन्यू, ब्रांडेड पानी और रीजनल थाली से फास्ट फूड तक लंबी लिस्ट के साथ आती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि IRCTC से पहले और 1990 के दशक की ट्रेन में खाने की व्यवस्था कैसी थी, मेन्यू में क्या-क्या हुआ करता था. अगर नहीं, तो इस आर्टिकल में जानिए ट्रेन की केटरिंग से जुड़े दिलचस्प फैक्ट्स..

1990s में रेलवे कैटरिंग कैसे चलती थी

IRCTC बनने से पहले रेलवे में खानपान की जिम्मेदारी जोनल रेलवे, पेंट्री कार स्टाफ, स्टेशन रिफ्रेशमेंट रूम और निजी ठेकेदारों के पास थी. कोई एक जैसा नेशनल मेन्यू नहीं था, जो रूट, जो रिसोर्सेस और जो स्टाफ, वही मेन्यू हुआ करता था. खाना स्टील ट्रे या मेलामाइन प्लेट में आता था. चाय मोटे कांच के गिलास में मिलता था और बड़े स्टेशनों पर तली हुई कटलेट की खुशबू पहले कोच में एंट्री होती थी, उसके बाद बेचने वाला आता था. तब खाना सिर्फ ऑप्शन नहीं था, वो समय भी बताता था. सुबह का नाश्ता मतलब ट्रेन एक राज्य पार कर चुकी है, दोपहर का खाना मतलब पटरियों पर धूप टिक गई है.

90 के दशक में थाली में क्या-क्या हुआ करता था

90 के दशक में वेज थाली ही ज्यादातर मिलती थी. एक स्टैंडर्ड वेज थाली में चावल या 2-3 रोटियां, पीली सादी दाल, एक सब्ज़ी (आलू-गोभी, पत्ता गोभी, बीन्स या मिक्स वेज) और किनारे एक चम्मच अचार होता था. यह खाना इस तरह बनाया जाता था कि चलती ट्रेन में दोबारा गरम करने पर भी टिका रहे. रात की ट्रेनों में वेज पुलाव और खिचड़ी पॉपुलर थे.

ट्रेन में कैसा होता था नाश्ता

उत्तर भारत की ट्रेनों में आलू पराठा और दही, दक्षिणी रूट्स पर इडली, पोंगल या उपमा, ब्रेड-बटर हर जोन का कॉमन स्टेपल होता था. तब खाना लोकल टेस्ट लिए होता था यानी जिस राज्य से ट्रेन गुजरती थी, वहीं का स्वाद भी मिलता था. स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही समोसे, कचौरी, कटलेट और सैंडविच बेचने वाले कोच में चढ़ते थे. बड़े जंक्शन पर खिड़की से पकौड़े लिए हुए जाते थे.

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नॉन-वेज ऑप्शन था या नहीं

नाश्ते में आमलेट कॉमन हुआ करता था. लंबी दूरी पर एग करी-राइस या रोटी मिलता था. जहां स्टोरेज की सुविधा थी, वहां सिंपल चिकन करी भी मिल जाती थी. कुछ चुनिंदा ट्रेनों में चिकन बिरयानी मिलती थी. मटन ज्यादातर स्टेशन रिफ्रेशमेंट रूम तक सीमित रहता था.

मिठाई, स्नैक्स और फ्रूट्स का ऑप्शन

सोन पापड़ी के डिब्बे, गुलाब जामुन की टिन, बेसन लड्डू कागज में लिपटे, क्रीम बिस्कुट और ग्लूकोज बिस्कुट के पैकेट मिल जाते थे. केले और संतरे बेचते हॉकर्स भी दिख जाया करते थे. मीठा कम ऑप्शन में था, लेकिन सबसे ज्यादा यही बांटा जाता था.

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क्या पानी ब्रांडेड ही मिलता था

आज की तरह एक तरह का ब्रांडेड पानी नहीं मिलता था. बड़े स्टेशनों पर अलग-अलग पर्सनल ब्रांड हुआ करता था. कई पैसेंजर स्टील की बोतल या फ्लास्क लेकर चलते थे. कुछ स्टेशन के नलों से बोतल भरते थे. तब एक नेशनल ब्रांड की पहचान तब तक नहीं आ पाई थी.

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