जुबीन गर्ग मौत: सिंगापुर ने सुना दिया फैसला, पर असम में अब भी 'इंसाफ' की तलाश

जुबीन गर्ग की मौत के मामले में सिंगापुर की अदालत ने भले ही फैसला सुना दिया हो, लेकिन चुनाव की दहलीज पर खड़े असम में ये मुद्दा अब भी गरम है. हालांकि सुर बदल रहे हैं. जो पहले इसे हत्या की नजर से देख रहे थे, वो भी कह रहे हैं कि मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए.

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  • सिंगापुर की अदालत ने सिंगर जुबीन गर्ग की मौत को दुर्घटना बताया है और साजिश से इनकार किया है
  • चुनाव की दहलीज पर खड़े असम में जुबीन गर्ग की मौत का मुद्दा अब भी गरम है, हालांकि सुर बदल रहे हैं
  • सिंगापुर की कोर्ट का फैसला आ चुका है, लेकिन असम के लोगों के मन में कई सवाल अब भी घुमड़ रहे हैं
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सिंगर जुबीन  गर्ग की मौत के मामले में सिंगापुर की अदालत में हाल ही में अपना फैसला सुनाया. कोर्ट ने जुबीन की मौत को एक दुर्घटना करार दिया और कहा कि उनकी मौत के पीछे किसी तरह की साजिश के सबूत नहीं मिले हैं. सिंगापुर ने भले ही जुबीन गर्ग की मौत को हादसा मानकर फाइल बंद कर दी हो, लेकिन असम में यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. विधानसभा चुनाव की सियासी फिजांओं में इस मौत की तपिश अब भी महसूस की जा रही है. 

मौज-मस्ती से मौत तक, आखिर हुआ क्या था?

  • इस कहानी की शुरुआत 19 सितंबर 2025 को हुई थी, जब जुबीन गर्ग नॉर्थ ईस्ट इंडिया फेस्टिवल में शामिल होने सिंगापुर गए थे.
  • ऑफिशियल प्रोग्राम से अलग, जुबीन 15-20 लोगों के साथ लाजरस आइलैंड पर के पास एक यॉट पर गए थे. वहां खाने-पीने का दौर चला था.
  • मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि जुबीन के खून में अल्कोहल की मात्रा तय सीमा से बहुत ज्यादा थी, इतनी ज्यादा कि शरीर का संतुलन और निर्णय लेने की क्षमता तक प्रभावित हो जाए.
  • गवाहों की मानें तो जुबीन दो बार समंदर में उतरे थे. पहली बार सुरक्षित बोट पर आ गए. दूसरी बार जाने लगे तो उन्हें लाइफ जैकेट पहनने को दी गई, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. 
  • समंदर में उतरने के कुछ ही मिनटों बाद जुबीन को पानी में बेसुध तैरते देखा गया. उन्हें निकाला गया, सीपीआर दी गई. उसके बाद अस्पताल ले जाया गया. 19 सितंबर 2025 की दोपहर तक उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

असम में जनसैलाब 

जुबीन गर्ग असम में बहुत पॉपुलर थे. उनकी मौत की खबर जब राज्य में पहुंची तो भावनाओं में उबाल आ गया. 21 सितंबर को जुबीन का पार्थिव शरीर गुवाहाटी पहुंचा तो भारी भीड़ सड़कों पर आ गई. उनकी अंतिम विदाई में उमड़ी भीड़ की तुलना माइकल जैक्सन के निधन पर उमड़े जनसैलाब से की गई. 

संदेह की शुरुआत

कुछ ही दिनों के बाद माहौल बदल गया. जुबीन गर्ग की मौत पर सवाल उठाए जाने लगे. दबाव बढ़ता देख असम सरकार ने 23 सितंबर को जांच के आदेश दे दिए. उसी दिन असम पुलिस ने FIR दर्ज करके जांच शुरू कर दी. 

SIT से न्यायिक आयोग तक 

जनता की भावनाओं को देखते हुए 25 सितंबर गहराई से जांच के लिए SIT का गठन कर दिया गया. 3 अक्तूबर को न्यायिक आयोग की भी घोषणा कर दी गई.  गवाहों के पूछताछ, सबूतों की तलाश, संभावित लापरवाही के सुराग ढूंढे जाने लगे. एक पॉइंट पर आकर लगने लगा कि मामला उतना सीधा नहीं है, जितना दिख रहा है. 

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सीएम को 'हत्या' का शक

3 नवंबर को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक रूप से 'हत्या' की संभावना जताई. इसके बाद जांच की दिशा पूरी तरह बदल गई. 12 दिसंबर को एसआईटी ने विस्तृत जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की. 

इधर जांच, उधर फैसला 

इधर जांच चल ही रही थी कि सिंगापुर की अदालत का फैसला आ गया. कोरोनर कोर्ट ने मौत के घटनाक्रम, मेडिकल रिपोर्ट्स, गवाहों के बयान  और फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुना दिया और मौत का महज हादसा करार दे दिया. वहां भले ही फाइल क्लोज कर दी गई हो, लेकिन असम में दर्ज हत्या के मामले में फैसला आना अभी बाकी है. 

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चुनावी फिजा में बदले सुर

सिंगापुर की अदालत का फैसला भले ही आ गया हो, लेकिन चुनाव की दहलीज पर खड़े असम में ये मुद्दा अब भी गरम है. हालांकि सुर बदल रहे हैं. जो मुख्यमंत्री पहले इसे हत्या की नजर से देख रहे थे, वो भी कह रहे हैं कि इस मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, 

अनसुलझे सवाल अब भी बाकी

  • सिंगापुर की कोर्ट का फैसला आ चुका है, लेकिन असम के लोगों के मन में कई सवाल अब भी घुमड़ रहे हैं. 
  • लोग पूछ रहे हैं कि जो व्यक्ति अपनी सेहत और दवाओं को लेकर पहले से ही संवेदनशील था, उसने इतनी ज्यादा शराब कैसे पी ली? 
  • सवाल ये भी है कि उस स्थिति में उन्हें समंदर में क्यों जाने दिया गया, और वो भी बिना लाइफ जैकिट के?
  • सवाल ये भी है कि जब ये ट्रिप जुबीन के ऑफिशियल प्लान में नहीं थी, तब उन्हें जाने क्यों दिया गया. और चले भी गए तो उन पर नजर क्यों नहीं रखी गई?

जांच की शुरुआती दिशा को लेकर अभी तक लोगों में एक अनकही असहजता है. लोगों के मन में यह सवाल कौंध रहा है कि अगर मामला शुरू से ही इतना सीधा था तो असम में शुरुआती पूछताछ अचानक गंभीर और पेचीदा संभावनाओं की ओर क्यों मुड़ गई, और समय के साथ उस रुख में बदलाव कैसे आया. हालांकि आधिकारिक निष्कर्षों को चुनौती देने वाला कोई ठोस सबूत या सुराग अब तक सामने नहीं आया है, लेकिन एक भावना यह भी है कि सिस्टम सिर्फ उन्हीं तथ्यों को दर्ज करता है जो सामने दिख रहे हों और प्रमाणित किए जा सके. यह कहानी अब साबित हो चुके तथ्यों और महसूस की जाने वाली आशंकाओं के बीच एक अनसुलझे सवाल के रूप में जिंदा है.

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