तलाक दिए बगैर शादी करने पर दूसरे पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है महिला? हाई कोर्ट ने समझाया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में फैसला देते हुए साफ कर दिया है कि पहले पति को तलाक दिए बगैर दूसरी शादी करने पर महिला दूसरे पति से गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती.

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तलाक लिए बगैर दूसरी शादी करने पर महिला को पत्नी का दर्जा नहीं मिल सकता.
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अगर कोई महिला पहले पति को तलाक दिए बगैर, दूसरी शादी करती है तो क्या दूसरे पति से उसे गुजारा भत्ता पाने का हक है? इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना है- नहीं. क्योंकि तलाक दिए बगैर दूसरी शादी करने पर महिला को 'कानूनी पत्नी' का दर्जा नहीं मिल सकता. इस कारण महिला दूसरे पति से गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती.

इलहाबाद हाई कोर्ट ने साफ किया है कि अगर कोई महिला अपने पहले पति से तलाक लिए बिना किसी दूसरे पुरुष के साथ रहने लगती है तो उसे 'कानूनी रूप से ब्याही गई पत्नी' नहीं माना जाएगा. इसलिए वह CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है.

जस्टिस अचल सचदेव ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला के पार्टनर को गुजारा भत्ता देने को कहा गया था.

क्या था पूरा मामला?

अदालत के फैसले के दस्तावेज के मुताबिक, महिला ने 10 जून 2006 को संतोष कुमार नाम के व्यक्ति से हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की थी. महिला की ये दूसरी शादी थी. जब महिला की संतोष से शादी हुई थी, तब उसने पहले पति को तलाक नहीं दिया था.

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महिला ने दावा किया था कि संतोष और वह पति-पत्नी के तौर पर रहने लगे और उनकी एक बेटी हुई, जो अभी लगभग 8 साल की है. महिला ने CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांगा था.

महिला ने अपनी अर्जी में दावा किया कि बेटी के जन्म के कुछ साल बाद संतोष का बर्ताव बदल गया. वह उसे और उसकी बेटी को पीटने लगा और राजमिस्त्री के तौर पर हर महीने 18 से 20 हजार रुपये कमाने के बावजूद खाना और गुजारा-भत्ता देने से इनकार कर दिया.

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चित्रकूट की फैमिली कोर्ट ने अगस्त 2025 में आदेश दिया था कि संतोष कुमार महिला को हर महीने 2,000 रुपये और बेटी को 1,000 रुपये गुजारा भत्ता देगा. बेटी को 18 साल की उम्र तक गुजारा भत्ता मिलेगा. 

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अब हाई कोर्ट ने क्या कहा?

फैमिली कोर्ट के आदेश को संतोष ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी. हाई कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने खुद यह माना था कि महिला यह साबित नहीं कर पाई कि उसकी शादी हिंदू रीति-रिवाजों से संतोष से हुई थी और कोर्ट ने यह भी पाया कि जब वह संतोष के साथ रहने लगी थी, तब उसका पति जिंदा था.

जस्टिस सचदेव ने कहा, 'सबूतों को देखने से यह साफ है कि महिला 'कानूनी रूप से ब्याही पत्नी' की परिभाषा में नहीं आती है और निचली अदालत ने महिला के पक्ष में गुजारा भत्ता का आदेश देकर गलती की है.'

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हाई कोर्ट ने महिला के दावे को गलत माना और उसे गुजारा भत्ता दिए जाने के आदेश को रद्द कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने माना कि DNA रिपोर्ट से साबित होता है कि संतोष और वह महिला ही उस बेटी के बायोलॉजिकल माता-पिता हैं. इसलिए अदालत ने बेटी के गुजारा भत्ते के अधिकार को बरकरार रखा है.

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क्या है CrPC की धारा 125?

CrPC की धारा 125 में महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को गुजारा भत्ता देने का प्रावधान किया गया है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में यह प्रावधान धारा 144 में किया गया है.

इस धारा में कहा गया है कि अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी, बच्चे या माता-पिता से अलग होता है तो वह उन्हें गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता. धारा साफ करती है कि पत्नी, बच्चे और माता-पिता अगर अपना खर्च नहीं उठा सकते तो पुरुष को उन्हें हर महीने गुजारा भत्ता देना होगा.

पत्नी को गुजारा भत्ता तब मिलेगा जब या तो वह खुद तलाक ले या उसका पति तलाक दे. गुजारा भत्ता तब तक मिलेगा जब तक महिला दोबारा शादी नहीं कर लेती. 

इस धारा में यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कोई महिला बिना किसी कारण के पति से अलग रहती है या किसी और पुरुष के साथ रहती है या आपसी सहमति से अलग होती है तो उसे गुजारा भत्ता नहीं मिल सकता.

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