उन्नाव रेप केस में आडवाणी फैसले का हवाला क्यों? 'लोक सेवक' की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट में छिड़ी बहस

उन्‍नाव रेप केस मामले में सीबीआई ने कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के साल 1997 के एल.के. आडवाणी बनाम सीबीआई फैसले का हवाला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है.

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  • दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्नाव रेप केस में कुलदीप सिंह सेंगर को आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर ज़मानत दी थी
  • सीबीआई ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में विधायक को लोक सेवक मानने की मांग की
  • सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के 1997 के एलके आडवाणी बनाम सीबीआई फैसले का हवाला देते हुए विधायक को लोक सेवक बताया
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नई दिल्‍ली:

उन्नाव बलात्कार मामले में पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ी राहत देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर ज़मानत दिए जाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. साथ ही साफ कर दिया है कि इस मामले में कानून के सवाल हैं, जिनका जवाब जरूरी है. खास बात ये है कि सीबीआई  ने  चुनौती में सुप्रीम कोर्ट के साल 1997 के एल.के. आडवाणी बनाम सीबीआई फैसले का हवाला दिया है. इससे यह सवाल केंद्र में आ गया है कि क्या विधायक को पॉस्‍को (POCSO) कानून के तहत 'लोक सेवक' माना जा सकता है या नहीं?

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह माना था कि POCSO अधिनियम में 'लोकसेवक' की परिभाषा के तहत एक विधायक(MLA) स्वतः शामिल नहीं होता. चूंकि सेंगर को POCSO के तहत लोकसेवक के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता. इसलिए उन पर उस कानून के तहत कड़ी जिम्मेदारी लागू नहीं होती. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने सजा निलंबित कर ज़मानत दी. 

CBI ने सुप्रीम कोर्ट में क्या आपत्ति उठाई?

उन्‍नाव रेप केस में सीबीआई ने हाई कोर्ट के इस निष्कर्ष को कानूनी तौर पर त्रुटिपूर्ण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. सीबीआई का तर्क है कि एक निर्वाचित विधायक सार्वजनिक पद पर आसीन व्यक्ति होता है. ऐसे व्यक्ति को लोकसेवक मानने से इनकार नहीं किया जा सकता. खासकर पर तब, जब अपराध पद, प्रभाव और शक्ति के दुरुपयोग से जुड़ा हो. सीबीआई ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 1997 के एल.के. आडवाणी बनाम CBI फैसले का हवाला दिया है. उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के संदर्भ में, यह स्पष्ट किया था कि सांसद और विधायक जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि 'लोकसेवक' की श्रेणी में आते हैं. 

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CBI का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार जैसे अपराधों के लिए MLA को लोकसेवक माना जा सकता है, तो POCSO जैसे कहीं अधिक गंभीर अपराध है जिसमें विश्वास और अधिकार की स्थिति में बैठे व्यक्ति द्वारा बच्चे का शोषण किया गया हो, उसमें यह सिद्धांत और भी सख्ती से लागू होना चाहिए. 

CBI की मुख्य दलील

हाई कोर्ट ने पॉस्‍को कानून की व्याख्या बहुत संकीर्ण तरीके से की और आडवाणी केस जैसे बाध्यकारी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज किया. यदि विधायक को POCSO के तहत लोकसेवक नहीं माना गया तो यह कानून के उद्देश्य (बच्चों को सत्ता और प्रभाव के दुरुपयोग से बचाने) को कमजोर करेगा. 

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अब सुप्रीम कोर्ट में क्या तय होगा?

सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है कि क्या POCSO अधिनियम में लोकसेवक की व्याख्या भ्रष्टाचार कानूनों में तय सिद्धांतों से अलग हो सकती है? और क्या दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दी गई ज़मानत कानूनी रूप से टिकाऊ है या नहीं? उन्नाव मामले में आडवाणी फैसले का जिक्र किसी राजनीतिक समानता के लिए नहीं, बल्कि इस बुनियादी कानूनी सवाल के लिए किया गया है कि क्या एक विधायक, जो सत्ता और प्रभाव की स्थिति में है, POCSO जैसे कानून के तहत भी लोकसेवक माना जाएगा या नहीं?

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क्‍या है आडवाणी बनाम सीबीआई केस? 

एलके आडवाणी बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का मामला एलके आडवाणी और जैन परिवार के कई सदस्यों सहित प्रमुख राजनीतिक हस्तियों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के इर्द-गिर्द केंद्रित है. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत याचिकाएं दायर कर आरोप लगाया कि इन व्यक्तियों ने महत्वपूर्ण सार्वजनिक पदों पर रहते हुए सरकारी लाभ के बदले अवैध रिश्वत लेकर भ्रष्टाचार में लिप्त रहे. इससे एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न सामने आया- क्या संसद सदस्य  (सांसद) और विधान सभा सदस्य (विधायक) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम , 1988 के तहत 'लोक सेवक' माने जाते हैं? यह निर्धारण निर्वाचित विधायकों पर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों की प्रयोज्यता को सीधे प्रभावित करता है.

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