- लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान महाराष्ट्र के सांसद ने पगड़ी पहनकर ध्यान आकर्षित किया
- अमोल कोल्हे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सांसद हैं और शिरूर लोकसभा सीट से 2019 व 2024 में जीते हैं
- कोल्हे ने शिवसेना से राजनीति शुरू की थी और बाद में 2019 में एनसीपी में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में आए
लोकसभा में आज महिला आरक्षण बिल पर चर्चा हुई. पीएम मोदी ने इस विधेयक को लेकर अपनी बात रखी. लोकसभा में चर्चा के दौरान महाराष्ट्र के एक सांसद ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. ये सांसद हैं अमोल कोल्हे. कोल्हे एनसीपी से लोकसभा सदस्य हैं. अपने भाषण के दौरान अमोल कोल्हे ने एक खास तरह की लाल पगड़ी पहनी थी. यह पगड़ी समाज सुधारक ज्योतिराव फुले द्वारा पहनी जाने वाली पगड़ी के समान है और इसे अक्सर महाराष्ट्र में सम्मान और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में पहना जाता है.
कौन हैं सांसद अमोल कोल्हे?
डॉ अमोल कोल्हे महाराष्ट्र की शिरूर लोकसभा सीट से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के सांसद हैं. राजनेता के साथ कोल्हे अभिनेता भी हैं. राजनीति में आने से पहले उन्होंने कई मराठी धारावाहिकों में काम किया है. वे राजा शिवछत्रपति और स्वराज्यरक्षक संभाजी की भूमिका निभाने के लिए पूरे महाराष्ट्र में लोकप्रिय हुए. इसके अलावा उन्होंने MBBS की पढ़ाई की है. कोल्हे ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत शिवसेना के साथ की थी, लेकिन 2019 में वे एनसीपी में शामिल हो गए. उन्होंने 2019 और फिर 2024 के लोकसभा चुनावों में शिरूर सीट से जीत दर्ज की.
कोल्हे ने जो पगड़ी पहनी उसका महत्व?
ऐसा पहली बार नहीं था जब अमोल कोल्हे ये पगड़ी पहने नजर आए. वो संसद और अन्य कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस मराठी पगड़ी को पहनते हैं. इस पगड़ी को सामाजिक न्याय, समानता और शिक्षा का प्रतीक माना जाता है. इसे 'बहुजन' समाज की अस्मिता से जोड़कर देखा जाता है. 19वीं सदी के महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले इसी तरह की पगड़ी पहनते थे. उन्होंने छुआछूत मिटाने, किसानों के हक और महिला शिक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था. इस पगड़ी को शिक्षा और सुधारवादी आंदोलनों का प्रतीक माना जाता है.
अपने शायराना अंदाज के लिए जाने जाते हैं कोल्हे
कोल्हे संसद में अपने भाषणों के लिए चर्चा में रहते हैं. उन्होंने फरवरी 2024 में संसद के भीतर एक कविता पढ़ी थी, जिसमें उन्होंने राम मंदिर निर्माण का स्वागत तो किया, लेकिन उसके राजनीतिकरण पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि मंदिर की हर सीढ़ी चढ़ते समय उन्हें महंगाई, बेरोजगारी, किसानों के संकट और महिला पहलवानों के आंसुओं जैसे गंभीर मुद्दे याद आए. उन्होंने संदेश दिया कि भगवान राम मंदिर के साथ-साथ हर इंसान के मन में भी वास करते हैं और अंत में उन्होंने कहा कि राजनीति में धर्म का 'ठेकेदार' नहीं बल्कि उसका 'पहरेदार' बनना चाहिए.
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