वोटर कम, वोटिंग ज्यादा... क्या SIR ने बदल दिया बंगाल-तमिलनाडु में चुनावी गणित?

पश्चिम बंगाल में पहले चरण की 152 सीटों पर और तमिलनाडु की सभी 234 सीटों के लिए गुरुवार को इतनी वोटिंग हुई कि पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए. रात 10 बजे तक बंगाल में 92.66 फीसदी और तमिलनाडु में 85.14 पर्सेंट वोटिंग दर्ज हो चुकी है.

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  • बंगाल के पहले चरण और तमिलनाडु में इस बार विधानसभा चुनाव ने मतदान के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं
  • बिहार में वोटरों में कमी और वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी का असर चुनाव नतीजों में देखने को मिला था
  • बंगाल में 2021 में 82.30 प्रतिशत मतदान हुआ था. इस बार ये आंकड़ा 10 फीसदी से भी ज्यादा पहुंच चुका है
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भारत के चुनावी इतिहास में गुरुवार का दिन बहुत खास रहा. पश्चिम बंगाल में कुल 294 सीटों में से पहले चरण की 152 सीटों पर और तमिलनाडु की सभी 234 सीटों के लिए इतनी वोटिंग हुई कि पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए. रात 10 बजे तक बंगाल में 92.66 फीसदी और तमिलनाडु में 85.14 पर्सेंट वोटिंग दर्ज हो चुकी थी. इतनी बंपर वोटिंग को लेकर सवाल उठ रहा है क्या ये SIR का असर है? आइए समझते हैं. 

SIR के बाद बिहार में हुआ पहला चुनाव

पिछले साल नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए थे. मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) के हालिया दौर के ये पहला चुनाव था, जिसमें संशोधित वोटर लिस्ट के आधार पर मतदान हुआ था. SIR की इस प्रक्रिया के दौरान बिहार में लगभग 69 लाख अयोग्य मतदाताओं को हटाया गया था. राज्य में लगभग 26 लाख नए मतदाता जोड़े भी गए थे. वोटर जुड़ने और हटने की इस प्रक्रिया की वजह से कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 42 लाख कम हो गई थी. 

बिहार चुनाव में SIR का असर

  • वोटरों की संख्या में इस कमी का असर भी बिहार चुनाव में देखने को मिला था. पूरे बिहार में वोटिंग प्रतिशत में भारी बढ़ोतरी हुई थी.
  • 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के जहां 57.29% वोट पड़े थे, 2025 में वो बढ़कर 67.25% हो गए
  • इस लिहाज से देखा जाए तो बिहार चुनाव में वोटिंग प्रतिशत में 9.96% का इजाफा हुआ था
  • बिहार ने अपने इतिहास में महिला वोटरों की सबसे ज़्यादा भागीदारी दर्ज की
  • इस चुनाव में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले लगभग 9 फीसदी ज़्यादा था

बिहार में बंपर वोटिंग का क्या असर?

मतदाताओं की संख्या में कमी और वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी का असर भी चुनाव नतीजों में देखने को मिला था. सत्ताधारी NDA ने विपक्ष को बुरी तरह से हरा दिया और अपनी सत्ता बरक़रार रखी. इस चुनाव में NDA ने कुल 243 सीटों में से 202 सीटों पर बंपर जीत हासिल की. वहीं विपक्षी गठबंधन महागठबंधन महज 35 सीटों तक सिमट कर रह गया. 

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चुनाव के लिए SIR कितना जरूरी?

देश के कई राज्यों में एसआईआर के जरिए मतदाता सूचियों के रिवीजन का काम चल रहा है. चुनाव आयोग का लक्ष्य पूरे देश में वोटर लिस्ट को संशोधित करना है. इस दौरान मृत, डुप्लीकेट, फर्जी और दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं. जब ऐसे वोटरों को हटा दिया जाता है, तब कुल वोटरों की संख्या कम हो जाती है. लेकिन चुनाव इस दौरान नए योग्य वोटरों को जोड़ने का भी काम करता है. कुल मिलाकर वोटर लिस्ट में असली वोटर ही बचते हैं. ऐसे वोटर जो चुनाव में वोट डालते हैं. इनमें से अधिकांश लोग चुनाव के वक्त पोलिंग बूथ तक पहुंचते हैं. यही वजह है कि मतदान का प्रतिशत बढ़ जाता है. 

बंगाल SIR में कितनी सियासी धार?

पश्चिम बंगाल में पिछली बार 2021 के विधानसभा चुनाव में 82.30 प्रतिशत मतदान हुआ था. इस बार ये आंकड़ा 10 फीसदी से भी ज्यादा पहुंच चुका है. बंगाल में SIR के दौरान लगभग 91 लाख अयोग्य मतदाताओं के नाम काटे गए थे. जिनके नाम काटे गए, उनमें से लगभग 27 लाख लोगों ने आयोग के फैसले के खिलाफ अपील है. इसके अलावा जो नाम जोड़े गए थे, उन्हें चुनौती देते हुए 7 लाख अर्जियां दी गई हैं. इनमें से फर्स्ट फेज में 136 लोगों को ही वोट डालने का अधिकार मिला, बाकियों की अपील ट्रिब्यूनल में पेंडिंग हैं. 

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तमिलनाडुः क्या गुल खिलाएगी बंपर वोटिंग  

तमिलनाडु की बात करें तो 2021 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में यहां 73.63 फीसदी मतदान हुआ था. उस वक्त कुल वोटरों की संख्या लगभग 6.26 करोड़ थी. 2026 में एसआईआर के दौरान इनमें से करीब 70 लाख नाम हटा दिए गए. बहुत से नए नाम जुड़े. इस तरह कुल वोटरों की संख्या 5 करोड़ 73 लाख 43 हजार 291 हो गई. 2021 में राज्य में डीएमके गठबंधन को 45.72 फीसदी वोट मिले थे और वह 159 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. वहीं AIADMK गठबंधन 40 फीसदी वोटों के साथ 75 सीटें जीत पाया था. इस बार तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 85.10 फीसदी मतदान हुआ है. ये देखने के लिए 4 मई का इंतजार करना होगा कि ये बंपर वोटिंग चुनावी नतीजों को किस ओर ले जाती है. 

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