चुनाव के समय बंगाल की राजनीति का माहौल कुछ अलग ही होता है, हवा में गेंदे के फूलों की खुशबू और पुराने झगड़ों की गर्मी घुली रहती है. कहीं चुनावी पोस्टरों के बीच से मछली करी की खुशबू आती है और दूर से ढाक (ढोल) की आवाज सुनाई देती है. यह आवाज कभी पूजा का एहसास कराती है तो कभी रैली का. यह ऐसा राज्य है जो कभी भी शांत नहीं रहा. इसी बंगाल ने बंगाल पुनर्जागरण की शुरुआत की, भारत को चार नोबेल पुरस्कार विजेता दिए और 34 साल तक चलने वाली वामपंथी सरकार भी दी. पिछले 15 साल से यहां एक ऐसा राजनीतिक दृश्य दिख रहा है, जिसे समझ पाना आसान नहीं है. एक महिला, सफेद सूती साड़ी और चप्पल में, बाढ़ के बीच नंगे पांव चलती हुई, जो राज्य के इतिहास में वामपंथ के बाद सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रही हैं, नाम है ममता बनर्जी.
चार मई 2026 को जब वोटों की गिनती शुरू होगी, तब बंगाल एक बड़े सवाल का जवाब ढूंढ रहा होगा, इस जमीन पर असली हक किसका है? उससे भी बड़ा सवाल— यह सवाल पूछने का हक किसे है? इस चुनाव में दो बड़ी कहानियां आमने-सामने हैं. एक तरफ ममता बनर्जी का नारा 'मां, माटी, मानुष' है, जिसे उन्होंने 2011 में गढ़ा था, जब उन्होंने 34 साल पुरानी वाम सरकार को हरा दिया था. दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जोरदार प्रचार अभियान रहा, जिसमें 'घुसपैठिए' शब्द को एक बड़े राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरे चरण के मतदान से पहले बनगांव की रैली में ममता बनर्जी पर हमला बोला था. उन्होंने कहा था कि पिछले 15 सालों में, जब से उनकी पार्टी सत्ता में आई है, महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़े हैं. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि उसने अपने ही नारे 'मां, माटी, मानुष' के साथ धोखा किया है. उन्होंने कहा था,'मां रो रही है, माटी घुसपैठियों के साथ है और मानुष डरा हुआ है.'
'मां, माटी, मानुष' की कहानी
ममता बनर्जी के इस नारे को सही मायने में समझने के लिए आपको गंगासागर के उस किनारे पर खड़ा होना पड़ेगा, जहां गंगा समुद्र से मिलती है या दुआर के चाय बागानों में जाना होगा, जहां मजदूर पीढ़ियों से गरीब हैं या सुंदरवन के मुस्लिम मछुआरों के गांवों में, जहां खारा पानी जमीन को धीरे-धीरे निगल रहा है. ये वो जगहें हैं, जहां सरकार हमेशा दूर की कौड़ी लगती थी. ममता बनर्जी ने इसे पूरी तरह बदल दिया या कम से कम लोगों को यह महसूस कराया कि सरकार अब उनके करीब है.
'मां' सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि बंगाल की राजनीति में इसका मतलब है वह अपनापन, जो आपको संभालता है.
'माटी' सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि पहचान और जुड़ाव है, यह भावना कि इस जमीन पर जो कुछ है वह हमारा है और दिल्ली से कोई इसे तय नहीं कर सकता.'मानुष' यानि लोग, यह वादा कि सरकार लोगों के लिए है न कि सिर्फ कागज़ी बातों के लिए.
तृणमूल कांग्रेस की कल्याणकारी योजनाएं काफी मजबूत हैं. बीजेपी इसे अच्छी तरह समझती है. लक्ष्मी भंडार योजना लगभग दो करोड़ घरों तक पहुंच चुकी है. कन्याश्री योजना लड़कियों को पढ़ाई के लिए मदद देती है. स्वास्थ्य साथी योजना हर परिवार को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा देती है. दुआरे सरकार योजना के जरिए सरकारी सेवाएं सीधे गांवों तक पहुंचाई गईं, इससे बिचौलियों की भूमिका कम हुई.
ममता बनर्जी ने कई बार कहा है कि उन्हें 294 सीटों पर खुद उम्मीदवार मानकर देखा जाए, ठीक वैसे ही जैसे बीजेपी पूरे देश में नरेंद्र मोदी को चुनाव का चेहरा बनाती है. 2021 के चुनाव में, जब बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी थी, मोदी की कई रैलियां हुईं, अमित शाह लगातार बंगाल के दौरे पर रहे और योगी आदित्यनाथ भी प्रचार में उतरे, इसके बाद भी तृणमूल 294 में से 215 सीटें जीतने में कामयाब रही.
इससे ममता को एक बात पता चली कि बंगाली पहचान ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है. बीजेपी जितना अधिक 'दिल्ली की पार्टी' लगेगी, ममता उतना ही 'मिट्टी की बेटी' के रूप में मजबूत दिखेंगी. इस बार उन्होंने एक कदम और आगे बढ़ाया. फरवरी में वे सुप्रीम कोर्ट में एक आम नागरिक की तरह पहुंचीं. वहां उन्होंने एसआईआर में 91 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जाने को चुनौती दी. इसके बाद मार्च की शुरुआत में उन्होंने कोलकाता में एक हफ्ते तक धरना दिया और आरोप लगाया कि एसआईआर के जरिए केंद्र सरकार मर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर के मतदाताओं, खासकर मुसलमानों को वोट के अधिकार से वंचित करने की कोशिश कर रही है.
ममता बनर्जी का अंदाज़ बिल्कुल वैसा ही था जैसा लोग पहले से जानते हैं, कभी सड़क पर लड़ने वाली नेता, कभी एक जिम्मेदार राजनेता और हमेशा थोड़ा नाटकीय. लेकिन उनका यह तरीका काम कर गया. एसआईआर विवाद चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया. इससे बीजेपी के भ्रष्टाचार वाले आरोप कुछ हद तक पीछे छूट गए.
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी 2011 के चुनाव से ही मां, माटी और मानुष को मुद्दा बना रही हैं.
घुसपैठियों पर राजनीति
अमित शाह की राजनीति में आंकड़ों की समझ बहुत गहरी मानी जाती है. वह सिर्फ लोगों से नहीं, बल्कि संख्या और गणित से बात करते हैं. बंगाल में उनका ध्यान लंबे समय से एक ही मुद्दे पर है, बांग्लादेश से लगती सीमा के पास आबादी में बदलाव.
करीब ढाई हजार किमी लंबी सीमा के बारे में बीजेपी का कहना है कि कई सालों से बिना दस्तावेज़ के लोग यहां आते रहे हैं. इससे मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में बदलाव आया, कूच बिहार की स्थिति बदली और सिलिगुड़ी कॉरिडोर (जिसे 'चिकन नेक' भी कहा जाता है) पर दबाव बढ़ा.
बीजेपी ने एसआईआर का इस्तेमाल ध्रुवीकरण कर हिंदू वोटों को एक करने में किया. उसने आरोप लगाया कि तृणमूल की सरकार ने फर्जी वोटरों के जरिए अपनी ताकत बढ़ाई है. उसका आरोप है कि बांग्लादेश से आए घुसपैठियों की वजह से बंगाल के सीमावर्ती इलाकों की जनसंख्या में बदलाव आया है.'घुसपैठिया' शब्द सिर्फ प्रशासनिक शब्द नहीं रह गया है. बीजेपी के प्रचार में इसका इस्तेमाल तीन तरह से होता है- यह हिंदू वोटरों को आबादी बदलने के खतरे के बारे में चेतावनी देता है, यह ममता बनर्जी के मुस्लिम वोट बैंक को एक बाहरी खतरे से जोड़ता है और यह स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ देता है, जैसे एनआरसी, सीएए और सीमा पर बाड़बंदी.
अमित शाह ने कूच बिहार और बशीरहाट की रैलियों में कहा कि अगर बीजेपी की सरकार बनती है, तो सीमा पर बाड़बंदी पूरी की जाएगी, सीएए के तहत नागरिकता देने की प्रक्रिया तेज होगी और बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति खत्म की जाएगी.
घुसपैठ के अलावा बीजेपी ने स्कूल भर्ती घोटाले को भी बड़ा मुद्दा बनाया. यह एक ऐसा मुद्दा रहा है, ममता बनर्जी सरकार की छवि धूमिल हुई है. बीजेपी का आरोप है कि शिक्षकों की हजारों नौकरियां बेची गईं, इस मामले में पूर्व शिक्षा मंत्री की गिरफ्तारी हुई. इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है.
बीजेपी ने 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए बलात्कार के बाद हत्या के मामले का भी जिक्र किया. इस मामले ने बंगाल में भारी आक्रोश पैदा किया था. लाखों लोग खासकर महिलाएं, जो आमतौर पर तृणमूल को वोट देती हैं, उन्होंने सड़कों पर उतर कर न्याय की मांग की. बीजेपी ने इनके अलावा बेरोजगारी, बंगाल के कमजोर औद्योगिक ढांचे और 'कट मनी' संस्कृति (यानी विकास योजनाओं में तृणमूल कांग्रेस नेताओं की कमीशनखोरी) को भी बड़ा मुद्दा बनाया.
ममता बनर्जी का आरोप रहा है कि केंद्र सरकार एसआईआर के जरिए मुसलमानों को वोट देने के अधिकार से वंचित रखना चाहती है.
दक्षिण बंगाल: सत्ता की असली जंग
दक्षिण बंगाल की 142 सीटों पर आज मतदान हो रहा है. यही इलाका चुनाव का फैसला तय कर सकता है. उत्तरी 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा में विधानसभा की 91 सीटें हैं, यानी विधानसभा का लगभग एक तिहाई हिस्सा. यह इलाका तृणमूल का सबसे मजबूत गढ़ है. बीजेपी के लिए सत्ता तक पहुंचने का सबसे कठिन रास्ता भी यही है.
भवानीपुर, ममता बनर्जी का अपना इलाका है. वहां लोगों का जुड़ाव पार्टी से ज्यादा व्यक्ति से दिखता है. सुंदरवन में जहां मछुआरे समुद्र और बाजार, दोनों की दूरी से जूझते हैं,सरकारी योजनाएं सिर्फ कागज नहीं बल्कि जीवन बदलने वाली हकीकत हैं. वहीं यह तय करती हैं कि बच्चा स्कूल जाएगा या नहीं. नंदीग्राम में, जहां 2021 में ममता बनर्जी को बीजेपी के सुवेंदू अधिकारी से बेहद कम अंतर से हार मिली थी, इस बार फिर सीधी टक्कर देखने को मिल रही है. यहां की राजनीति किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे से अधिक घात-प्रतिघात से तय होती है.
चुनावी राजनीति की जटिल सच्चाइयां
हर चुनाव में एक 'छिपी हुई कहानी' होती है, एक ऐसी कहानी, जिसे पार्टियां खुलकर नहीं कहतीं क्योंकि वह उनके बनाए हुए नैरेटिव के खिलाफ जाती है.
तृणमूल की चुनौती, भ्रष्टाचार का छाया
तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी कमजोरी भ्रष्टाचार का आरोप है. स्कूल भर्ती घोटाला बीजेपी की बनाई कहानी नहीं है. यह असल मुद्दा रहा है. पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी के घर से मिला भारी-भरकम नकदी भी एक सच्चाई थी. 'कट मनी' की संस्कृति—जहां स्थानीय नेता सरकारी योजनाओं से हिस्सा लेते हैं, यह काफी फैली हुई मानी जाती है.पिछले 15 साल में सरकारी नौकरी किसे मिलेगी, यह अक्सर रिश्तों और पहचान पर निर्भर रहा है. इतने लंबे समय की सत्ता के बाद एंटी इनकंबेंसी बनना स्वाभाविक है, यह कोई बनाई हुई चीज़ नहीं है.
BJP की चुनौती: दावों और हकीकत का अंतर
बीजेपी के लिए समस्या यह है कि 'घुसपैठिया' वाला नैरेटिव और ज़मीनी हकीकत में काफी अंतर दिखता है. उदाहरण के लिए, मतुआ समुदाय के कई परिवार जिन्हें बीजेपी घुसपैठ का शिकार बताती है, उनके नाम भी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान वोटर लिस्ट से कट गए. इसके अलावा, सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) का वादा कई चुनावों में किया गया, लेकिन जिन लोगों को नागरिकता मिलने की उम्मीद थी, उनमें से अधिकांश को अब तक कागज़ नहीं मिले हैं. बीजेपी ने 2021 के चुनाव से सबक लेते हुए, जब तृणमूल कांग्रेस ने 'बंगाली अस्मिता' को बड़ा मुद्दा बनाया था, इस बार बंगाली भाषा बोलने वाले नेताओं को आगे किया, ताकि वह 'बाहरी पार्टी' की छवि से बच सके.
आरजी कर मेडिकल कॉलेज का जख्म
साल 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में रेप के बाद हुई एक युवा डॉक्टर की हत्या ने कोलकाता को झकझोर दिया था. इस घटना ने लोगों को पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सड़कों पर ला दिया. महिलाओं ने'रातेर अंधोकार चीरे' (रात के अंधेरे को चीरते हुए) जैसे नारों के साथ सड़कों पर मार्च किया था. वे किसी पार्टी की समर्थक नहीं थीं, वे न्याय की मांग कर रही थीं. उनका गुस्सा उस सिस्टम के खिलाफ था, जो कुछ समय तक सच सामने लाने के बजाय कहानी को संभालने में ज्यादा लगा हुआ दिखा.ममता बनर्जी इस संकट से राजनीतिक रूप से तो निकल गईं, लेकिन इसका असर अभी भी बना हुआ है, खासकर शहरी मध्य वर्ग, डॉक्टरों और युवा लड़कियों के बीच, जिन्हें आमतौर पर तृणमूल का मजबूत समर्थक माना जाता है.
ममता बनर्जी की कल्याणकारी योजनाएं इतनी गहराई तक लोगों तक पहुंची हैं कि उन्हें आसानी से हटाना मुश्किल है. राज्य में मुस्लिम वोटर, जो लगभग एक-तिहाई हैं, अभी भी एकजुट तरीके से तृणमूल के साथ दिखते हैं, खासकर एसआईआर विवाद के बाद, जिसने ममता को यह कहने का मौका दिया कि बीजेपी लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करना चाहती है. पश्चिम बंगाल की एक बड़ी हकीकत यह भी है कि आबादी का बड़ा हिस्सा दक्षिण बंगाल में है, जहां तृणमूल काफी मजबूत है, यह भी उसके पक्ष में जाता है.
बीजेपी का वोट शेयर जिस तेजी से बढ़ा है, वैसा किसी और राज्य में कम ही देखने को मिलता है. केवल एक दशक में चार फीसदी से 38 फीसदी तक. स्कूल भर्ती घोटाले ने सरकारी नौकरियों को लेकर लोगों का भरोसा कम किया है. एसआईआर के कारण कई जगहों पर मुस्लिम वोटिंग कम हो सकती है. संदेशखाली,नंदीग्रा और आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप के हत्या जैसे मुद्दों ने तृणमूल की मजबूत पकड़ को थोड़ा कमजोर किया है.बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली है, अब वह बंगाली बोलने वाले नेताओं को आगे ला रही है और सुवेंदू अधिकारी जैसे नेताओं के अनुभव का फायदा उठा रही है, जो पहले तृणमूल में रह चुके हैं. 15 साल की सत्ता के बाद बदलाव (परिवर्तन) की मांग भी बढ़ी है.नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बंगाल में ममता बनर्जी के बराबर मानी जा रही है.
ममता की रणनीति: बचाव को आक्रमण दिखाना
71 साल की ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव बेहद अहम है. उन्हें पता है कि अगर इस बार हार हुई, तो पांच साल बाद वापसी करना बहुत मुश्किल होगा. अपनी रक्षात्मक स्थिति को आक्रामक दिखाने के लिए ममता यह कह रही हैं कि अगला लक्ष्य दिल्ली की सत्ता है और वो बीजेपी को केंद्र से हटाना चाहती हैं. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी बंगाल में ममता का समर्थन कर रहे हैं.लेकिन विपक्षी गठबंधन की कमजोरी भी सामने आई है. संसद में कुछ मामलों में साथ आने के बावजूद, बंगाल चुनाव में कांग्रेस और सीपीएम तृणमूल के खिलाफ ही चुनाव लड़ा. राहुल गांधी ने भी तृणमूल पर हमला करते हुए कहा कि राज्य में 'आतंक का राज' चल रहा है.
अंत में हम यह कह सकते हैं कि यह चुनाव दोनों पार्टियों के लिए 'करो या मरो' जैसा है. एक तरफ ममता बनर्जी का मजबूत जमीनी नेटवर्क और योजनाएं हैं तो दूसरी ओर बीजेपी की बढ़ती ताकत और बदलाव की मांग. अब फैसला बंगाल की जनता के हाथ में है, वह किस कहानी पर भरोसा करती है.
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