अभिषेक बनर्जी पर हमला सियासी साजिश या पब्लिक का गुस्सा? NDTV को सोनारपुर के लोगों सुनाई अपनी आपबीती

सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले को टीएमसी बीजेपी की साजिश बता रही है, लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि यह खराब सड़क, विकास की कमी और संजू कर्मकार को लेकर नाराजगी का स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश था, न कि राजनीतिक हमला.

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कोलकाता:

पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के 26 दिन बाद तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी जब कथित चुनावी हिंसा के पीड़ितों के परिवारों से मिलने निकले, तो सोनारपुर में उनके साथ जो हुआ उसने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया. तृणमूल कांग्रेस जहां इस घटना को बीजेपी प्रायोजित हमला बता रही है, वहीं स्थानीय लोगों का दावा है कि यह किसी राजनीतिक साजिश का नहीं बल्कि वर्षों की नाराजगी और गुस्से का विस्फोट था.

क्या हुआ था सोनारपुर में?

शनिवार को अभिषेक बनर्जी ने सबसे पहले कोलकाता के बेलियाघाटा में कथित तौर पर चुनावी हिंसा में मारे गए टीएमसी कार्यकर्ता बिस्वजीत पटनायक के परिवार से मुलाकात की. इसके बाद वह दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर स्थित कामराबाद पहुंचे, जहां टीएमसी कार्यकर्ता संजू कर्मकार के परिवार से मिलने का कार्यक्रम था.

हमले से पहले एक पीड़ित परिवार से मिले अभिषेक.

लेकिन सोनारपुर पहुंचते ही हालात बिगड़ गए. अभिषेक बनर्जी को विरोध का सामना करना पड़ा. प्रदर्शनकारियों ने उनके काफिले को घेर लिया. उन पर अंडे फेंके गए, पथराव हुआ, चश्मा टूट गया और शर्ट भी फट गई. हालात ऐसे बने कि उन्हें भीड़ के बीच से निकलने के लिए क्रिकेट हेलमेट पहनना पड़ा.

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TMC ने BJP पर लगाया आरोप

घटना के तुरंत बाद अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि हमला पूरी तरह बीजेपी प्रायोजित था. उन्होंने कहा, 'यह लोकतंत्र का नमूना है. मुझ पर हुआ हमला सरकार प्रायोजित था. जो लोग मुझे रोक रहे थे वे स्थानीय नहीं थे. स्थानीय लोगों ने तो मेरा स्वागत किया था. बाहर से लाए गए बीजेपी के गुंडों ने मुझ पर हमला किया.'

पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी अस्पताल पहुंचकर यही आरोप दोहराया. उन्होंने कहा कि पुलिस को पहले से अभिषेक के दौरे की जानकारी थी, फिर भी हमला कैसे हो गया? उनके मुताबिक हमलावर स्थानीय नहीं थे बल्कि बाहर से लाए गए लोग थे.

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NDTV टीम पहुंची मौके पर, सामने आई दूसरी तस्वीर

रविवार सुबह जब NDTV की टीम घटनास्थल पर पहुंची तो वहां का माहौल कुछ और कहानी कहता नजर आया. संकरी और कीचड़ भरी सड़कों से गुजरकर टीम उस चाय की दुकान तक पहुंची जहां शनिवार को विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था. स्थानीय निवासी सुरेश प्रसाद ने बताया कि यह विरोध किसी राजनीतिक दल के इशारे पर नहीं हुआ था. उन्होंने कहा, 'वार्ड नंबर 5 और 9 के लोग वर्षों से टूटी सड़कों की समस्या झेल रहे हैं. जब अभिषेक यहां पहुंचे तो लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. यह जनता की नाराजगी थी.'

खराब सड़कों से जनता परेशान.

विकास नहीं, राजनीति हुई?

चाय की दुकान पर मौजूद संजय भावाल ने दावा किया कि मृतक टीएमसी कार्यकर्ता संजू कर्मकार इलाके में विकास कार्यों में बाधा डालते थे. भावाल के अनुसार, 'संजू अच्छे इंसान नहीं थे. इलाके में सड़क निर्माण जैसे काम रुकवाने में उनकी भूमिका थी. टीएमसी को इस क्षेत्र से चुनावों में बढ़त नहीं मिलती थी, इसलिए विकास कार्य भी प्रभावित रहे.' स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीतिक कारणों से क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं को नजरअंदाज किया गया.

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संजू कर्मकार की मौत पर भी उठ रहे सवाल

अभिषेक बनर्जी जिस संजू कर्मकार के परिवार से मिलने पहुंचे थे, उनकी मौत को लेकर भी विवाद गहरा गया है. स्थानीय महिला प्रतिमा सिंह ने कहा, 'आरजी कर मामले में पीड़ित परिवार अभी तक न्याय का इंतजार कर रहा है, लेकिन अभिषेक यहां एक ऐसे व्यक्ति के घर क्यों आए जिसकी मौत ब्रेन स्ट्रोक से हुई थी?' उन्होंने दावा किया कि संजू कर्मकार की मौत राजनीतिक हिंसा में नहीं हुई थी.

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संजू कर्मकार की मौत पर उठे सवाल.

पड़ोसियों का दावा- संजू की मौत बीमारी से हुई

संजू कर्मकार की रिश्तेदार इप्सिता कर्मकार ने भी टीएमसी के दावों पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा, 'संजू इलाके में आपराधिक छवि वाला व्यक्ति माना जाता था. 22 मई की सुबह वह सामान्य रूप से दुकान से सिगरेट खरीदकर लौटे थे. बाद में घर पर उनकी तबीयत बिगड़ी. परिवार उन्हें अस्पताल ले गया, जहां अगले दिन उनकी मौत हो गई.' इप्सिता का दावा है कि मौत का कारण ब्रेन में ब्लड क्लॉट था, न कि चुनावी हिंसा.

उन्होंने कहा, 'यह कहना कि संजू की मौत चुनावी हिंसा में हुई, पूरी तरह गलत है. बल्कि इलाके में राजनीतिक दबाव और हिंसा फैलाने के आरोप उन्हीं पर लगते रहे हैं.'

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हमले के बाद भी संजू के परिवार से मिलने गए अभिषेक बनर्जी.

राजनीतिक नैरेटिव बनाम जमीनी हकीकत

सोनारपुर की घटना अब केवल अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले का मामला नहीं रह गई है. यह उस बहस का हिस्सा बन गई है जिसमें एक तरफ टीएमसी इसे लोकतंत्र पर हमला और बीजेपी की साजिश बता रही है, जबकि दूसरी तरफ स्थानीय लोग इसे वर्षों की नाराजगी, खराब बुनियादी सुविधाओं और स्थानीय राजनीतिक असंतोष का परिणाम बता रहे हैं.

सच्चाई क्या है, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा. लेकिन इतना जरूर है कि सोनारपुर की घटना ने चुनावी हार के बाद टीएमसी के सामने खड़े राजनीतिक और जनाधार संबंधी सवालों को और गहरा कर दिया है.

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