विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण कानूनों की वैधता मामला: सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की पीठ करेगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आदेश दिया कि जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए विभिन्न राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों की वैधता पर अब तीन जजों की पीठ निर्णय करेगी.

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  • सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ विभिन्न राज्यों के धर्मांतरण कानूनों की वैधता पर सुनवाई करेगी
  • CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया.
  • सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इस मामले में केंद्र सरकार का जवाब तैयार है और शीघ्र दाखिल किया जाएगा.
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सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण कानूनों की वैधता के मामले में सुनवाई करेगी. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आदेश दिया कि जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए विभिन्न राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों की वैधता पर अब तीन जजों की पीठ निर्णय करेगी. मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान यह आदेश दिया गया. 

कोर्ट को बताया गया कि उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड समेत कई राज्यों के धर्मांतरण कानूनों को चुनौती देने वाली समान प्रकृति की याचिकाएं पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है. इस मामले के महत्व को देखते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि इसे तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा जाए. 

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केंद्र का जवाब तैयार है: सॉलिसिटर जनरल

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में केंद्र सरकार का जवाब तैयार है और शीघ्र दाखिल किया जाएगा. याचिकाकर्ता नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया की ओर से सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा पेश हुईं. 

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कोर्ट ने विभिन्न राज्यों के धर्मांतरण कानूनों को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी करते हुए प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. साथ ही अदालत ने कहा कि सभी प्रतिवादी एक साझा काउंटर हलफनामा दाखिल करें. 

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास स्‍थानांतरित की थी याचिकाएं

गौरतलब है कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न हाईकोर्ट्स में लंबित धर्मांतरण कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया था. 

इसके अलावा वर्ष 2021 में कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद को एक मामले में हस्तक्षेप की अनुमति दी थी, जब संगठन ने आरोप लगाया था कि देशभर में बड़ी संख्या में मुसलमानों को इन धर्मांतरण विरोधी कानूनों के तहत परेशान किया जा रहा है. 

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