टीपू सुलतान Vs शिवाजी महाराज पर बवाल: इतिहास, राजनीति और भावनाओं का सवाल

टीपू सुल्तान और शिवाजी महाराज पर बवाल हो रहा है. अब सवाल ये है कि क्या इतिहास वाकई इतना सरल है कि इन दोनों शख्सियतों को 'एक बराबर' की तराजू पर तौला जा सके? इसी को समझने की कोशिश करते हैं इस रिपोर्ट में.

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  • शिवाजी महाराज ने स्वराज्य की स्थापना की और नैतिक शासन, सैन्य अनुशासन और धार्मिक सहिष्णुता को प्राथमिकता दी
  • शिवाजी महाराज ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए जागीरदारी प्रथा समाप्त कर अधिकारियों को नकद वेतन देने की व्यवस्था की
  • टीपू सुल्तान ने मैसूरी रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा
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नई दिल्ली:

महाराष्ट्र की राजनीति में 'इतिहास' कभी धूल फांकने वाली किताब नहीं रहा, बल्कि वह एक जलती हुई मशाल है जिसे वक्त-बे-वक्त कोई न कोई सुलगा देता है. इस बार चिंगारी सुलगी है कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के एक बयान से, जिसमें उन्होंने टीपू सुल्तान और छत्रपति शिवाजी महाराज को एक ही कतार में लाकर खड़ा कर दिया है. जिसके बाद सड़कों पर पत्थर चलने लगे, पक्ष-विपक्ष के नेता अपने बयानों के तीर-कमान लेकर मैदान में उतर पड़े. इसके साथ-साथ इतिहास की किताबें भी फिर से धूल झाड़कर बाहर आ गईं हैं. अब सवाल ये है कि क्या इतिहास वाकई इतना सरल है कि इन दोनों शख्सियतों को 'एक बराबर' की तराजू पर तौला जा सके? इसी को समझने की कोशिश करते हैं इस रिपोर्ट में.

शिवाजी महाराज: एक 'स्वराज्य' का सपना

छत्रपति शिवाजी महाराज सिर्फ एक राजा नहीं, महाराष्ट्र की 'अस्मिता' और 'आइडेंटिटी' के सबसे बड़े केंद्र हैं. उनके लिए 'स्वराज्य' का मतलब था- विदेशी या दमनकारी सत्ताओं से मुक्ति और अपनी माटी का शासन. उनकी रणनीति, जिसे हम 'गनिमी कावा' (छापामार युद्ध) कहते हैं, आज भी मिलिट्री स्कूलों में पढ़ाई जाती है. महाराष्ट्र के घरों में उनकी पूजा इसलिए होती है क्योंकि उन्होंने एक बिखरते हुए समाज को 'स्वाभिमान' के सूत्र में पिरोया था. इसलिए, जब भी कोई उनकी तुलना किसी और से करता है, तो भावनाएं आहत होना स्वाभाविक है. छत्रपति शिवाजी महाराज का 'स्वराज्य' केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और प्रशासनिक क्रांति थी. कुछ प्वाइंट्स तस्वीर को और साफ कर सकते हैं

  • नैतिकता का सर्वोच्च मापदंडः सर जदुनाथ सरकार के मुताबिक जब उनके एक सूबेदार ने कल्याण के खजाने के साथ वहां की सुंदर बहू को नजराने के तौर पर पेश किया, तो शिवाजी महाराज ने उसे अपनी माता के समान बताकर ससम्मान वापस भेजा. यह 'नैतिक शासन' का वह उदाहरण है जो उन्हें दुनिया के किसी भी शासक से अलग खड़ा करता है.
  • सैन्य अनुशासन: शिवाजी ने 5 सितंबर 1671 को जारी अपने आज्ञापत्र में अपनी सेना को सख्त हिदायत दी थी कि किसी भी अभियान के दौरान खेती को नुकसान न पहुंचे, महिलाओं का अपमान न हो और धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी न की जाए.
  • प्रशासनिक दूरदर्शिता: उन्होंने 'अष्टप्रधान मंडल' बनाया और भ्रष्टाचार रोकने के लिए जागीरदारी प्रथा को खत्म कर अधिकारियों को नकद वेतन देना शुरू किया.
  • धार्मिक सहिष्णुता: भारतीय इतिहास लेखन के पितामह सर जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि शिवाजी महाराज की सेना में केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक और सेनापति भी थे. उन्हें उनकी योग्यता के आधार पर ऊंचे पदों पर रखा गया था. मसलन- इब्राहिम खान उनकी घुड़सवार सेना के प्रमुख थे. दौलत खान मराठा नौसेना के एडमिरल थे. इसके अलावा काजी हैदर महाराज के निजी सचिव और कानून सलाहकार थे. औरंगजेब के दरबारी इतिहासकार खाफी खान ने भी लिखा है- शिवाजी ने सख्त आदेश दे रखा था कि युद्ध के दौरान अगर कहीं से पवित्र कुरान मिले, तो उसे पूरी श्रद्धा के साथ किसी मुसलमान को सौंप दिया जाए. उन्होंने कभी किसी मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचाया.

टीपू सुल्तान: 'मैसूर का शेर' और रॉकेट तकनीकि का जनक?

टीपू सुल्तान के इतिहास के दो पन्ने हैं, और दोनों ही अपनी-अपनी जगह बहुत भारी हैं. सकारात्मक पक्ष ये है कि टीपू सुल्तान पहले ऐसे भारतीय शासक थे जिन्होंने रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल किया. उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ चार भीषण युद्ध लड़े और युद्ध के मैदान में ही वीरगति प्राप्त की. हालांकि विवादास्पद पक्ष ये है कि टीपू के शासनकाल में मालाबार और कुर्ग जैसे इलाकों में मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया और बड़े पैमाने पर जबरन धर्मांतरण हुए. यही वो हिस्सा है जिसे हिंदू संगठन 'क्रूरता' की संज्ञा देते हैं . दरअसल टीपू सुल्तान का इतिहास उपलब्धियों और विवादों का एक ऐसा मेल है जिसे एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता.

तकनीकी क्रांति: टीपू ने 'मैसूरी रॉकेट'के जरिए युद्ध को बदल दिया. अंग्रेजों के खिलाफ उनकी दृढ़ता ऐसी थी कि उन्होंने चौथे मैसूर युद्ध में भागने के बजाय युद्ध के मैदान में मरना चुना. उनके शासन में रेशम उद्योग और बैंकिंग के शुरुआती बीज पड़े.

धार्मिक विवादों का साया: इतिहासकार विलियम किर्कपैट्रिक के मुताबिक मालाबार और कुर्ग के अभियानों के दौरान टीपू ने हिंदू और ईसाइयों पर भारी अत्याचार किए और जबरन धर्म परिवर्तन की नीतियां अपनाईं. यही वह बिंदु है जहां उनकी तुलना शिवाजी महाराज के 'सर्वधर्म समभाव' वाले शासन से करना ऐतिहासिक रूप से विरोधाभासी हो जाता है.

क्या टीपू ने भी दूसरे धर्म का सम्मान किया?

मैसूर के पुरातत्व विभाग के निदेशक आर. नरसिंहाचार्य के मुताबिक जब श्रृंगेरी के शंकराचार्य ने टीपू से मदद मांगी, तो टीपू ने न केवल मूर्ति की पुनर्स्थापना के लिए चंदा दिया, बल्कि अनाज और धन भी भेजा. टीपू ने शंकराचार्य को लिखे पत्रों में उन्हें 'जगद्गुरु' कहा है. मैसूर के गजट में आज भी ऐसे 30 पत्रों का रिकॉर्ड मौजूद हैं. टीपू के सबसे ताकतवर मंत्री और दीवान का नाम था पूर्णैया, जो एक ब्राह्मण थे. श्रीरंगपट्टनम के जिस महल में टीपू रहते थे, उसके ठीक सामने 'रंगनाथस्वामी मंदिर' था, जिसे टीपू की ओर से रोजा-अफतार के समय भी कोई परेशानी नहीं हुई, बल्कि उन्होंने वहां उपहार भी भेजे. 1799 में जब टीपू सुल्तान अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए, तो उनकी उंगली से सोने की एक अंगूठी मिली थी. उस पर 'राम' (देवनागरी में) लिखा हुआ था

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इतिहास  को 'कॉपी-पेस्ट' मत करिए

कुल मिलाकर देखें तो शिवाजी महाराज (17वीं सदी) और टीपू सुल्तान (18वीं सदी) के कालखंड, उद्देश्य और चुनौतियां बिल्कुल अलग थीं. शिवाजी महाराज ने एक 'लोक-कल्याणकारी स्वराज्य' खड़ा किया, वहीं टीपू ने अपनी सल्तनत बचाने के लिए तकनीक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सहारा लिया.जहां छत्रपति शिवाजी महाराज को एक ऐसे जननायक के रूप में देखा जाता है जिन्होंने शून्य से 'स्वराज्य' खड़ा किया और नैतिक शासन की मिसाल दी, वहीं टीपू सुल्तान को एक ऐसे आधुनिक शासक के रूप में पढ़ा जाता है जिसने अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी, लेकिन उनकी धार्मिक नीतियों ने उनके व्यक्तित्व पर विवादों की एक लंबी परछाई छोड़ दी. अंत में हम तो यही कह सकते हैं कि भारत जैसे विविधता वाले देश में, जहां नायक भावनाओं से जुड़े हों, वहां तुलना के बजाय उनके विशिष्ट योगदानों को अलग-अलग पढ़ना ही 'पॉलिटिकली करेक्ट' और 'ऐतिहासिक रूप से सटीक' रास्ता है.

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