- नौसेना में स्वदेशी गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट तारागिरी 3 अप्रैल को शामिल होगी.
- तारागिरी प्रोजेक्ट 17ए का चौथा युद्धपोत है, जिसमें ब्रह्मोस और बराक आठ मिसाइल सिस्टम लगाए गए हैं.
- इस युद्धपोत का लगभग पच्चीस प्रतिशत सिस्टम विदेश से है, जबकि बाकी हिस्से का निर्माण भारत में हुआ है.
ब्लू वॉटर में भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ने वाली है. समंदर में नौसेना की ताकत बढ़ाने की तैयारी में स्वदेशी गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट तारागिरी अब 3 अप्रैल को नौसेना में शामिल होने जा रही है. विशाखापत्तनम में इसका कमीशन होगा. इस मौके पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह मौजूद रहेंगे. वे इस युद्धपोत को औपचारिक रूप से नौसेना को सौंपेंगे.
इस युद्धपोत को प्रोजेक्ट 17A के तहत बनाया गया है. यह नीलगिरी क्लास का चौथा युद्धपोत है. इसमें कई आधुनिक हथियार लगाए गए हैं. यह ब्रह्मोस मिसाइल से लैस हैं. यह दुश्मन के जहाजों को निशाना बनाने में बेहद सक्षम है. हवाई हमलों से बचाव के लिए इसमें बराक -8 मिसाइल सिस्टम है. इसमें पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए इसमें वरुणास्त्र टॉरपीडो लगाया गया है. इसमें आधुनिक रडार और सोनार भी हैं. ये दुश्मन की गतिविधियों का जल्दी पता लगा लेते हैं. तारागिरी में हेलिकॉप्टर हैंगर भी है. इसमें एक साथ दो हेलिकॉप्टर उतर सकते हैं.
इस फ्रिगेट के ज्यादातर उपकरण भारत में बने हैं. करीब 75 प्रतिशत सिस्टम स्वदेशी हैं. इसका डिजाइन नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है. इसमें इस्तेमाल स्टील भी देश में बना है. इसका वजन करीब 6700 टन है. यह 30 नॉटिकल मील प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है.
प्रोजेक्ट 17A के तहत कुल 7 फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं. इनमें से चार का निर्माण मझगांव शिपयार्ड और तीन का गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एण्ड इंजीनियर्स लिमिटेड ने किया हैं . पहला युद्धपोत आईएनएस नीलगिरी जनवरी 2025 में शामिल हुआ था . इसके बाद हिमगिरी और उदयगिरी भी शामिल हो चुके हैं.
अब चौथे नंबर पर तारागिरी की एंट्री होने जा रही है.मुंबई की मझगांव शिपयार्ड ने इस युद्धपोत को पहले के मुकाबले ज्यादा आधुनिक और खतरनाक बनाया गया है . इसकी खासियत है कि इसका रडार पर कम दिखाई देना है जिससे दुश्मन के लिए इसे पहचानना काफी मुश्किल होता है .
यह युद्धपोत सिर्फ युद्ध के लिये ही नही बल्कि मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे मिशनों में भी काम आ सकता हैं. इसके नौसेना में शामिल होने से नौसेना की ताकत और बढ़ेगी. समुद्र में भारत की पकड़ और मजबूत होगी. दुश्मन की चुनौती का नौसेना मजबूती से जवाब दे पाएंगे.
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