सूरत से एक अहम और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक मामूली ATM ट्रांजैक्शन की गलती बैंक ऑफ बड़ौदा को भारी पड़ गई. करीब 9 साल तक ग्राहक को राहत न मिलने पर उपभोक्ता आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए बैंक पर लाखों रुपये का जुर्माना लगाया है. एनडीटीवी के पास इस आदेश की कॉपी है, जिसमें साफ तौर पर लिखा है कि बैंक ने ग्राहक को समय पर राहत नहीं दी और सेवा में गंभीर कमी बरती.
ATM से नहीं निकला कैश
यह मामला 18 फरवरी 2017 का है, जब उधना इलाके में एक ग्राहक SBI के ATM से 10,000 रुपये निकालने गया था. ग्राहक ने ATM में कार्ड डालकर PIN एंटर किया, लेकिन मशीन से न तो कैश बाहर आया और न ही कोई रसीद निकली. हालांकि, कुछ ही देर में उसके मोबाइल पर मैसेज आया कि खाते से 10,000 रुपये डेबिट हो चुके हैं, जिससे वह हैरान रह गया.
ग्राहक ने बैंक को दी लिखित शिकायत
इसके बाद ग्राहक ने बैंक ऑफ बड़ौदा की डुंभाल शाखा में 21 फरवरी को लिखित शिकायत दर्ज कराई और मार्च से मई 2017 के बीच कई बार ईमेल के जरिए फॉलो-अप किया. उसने RBI और संबंधित अधिकारियों से भी शिकायत की, यहां तक कि SBI से CCTV फुटेज हासिल करने के लिए RTI भी दाखिल की, लेकिन कहीं से भी उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला.आखिरकार, थक-हारकर ग्राहक ने 20 दिसंबर 2017 को उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया.
उपभोक्ता फोरम को बैंक ऑफ बड़ौदा ने दी ये दलील
सुनवाई के दौरान बैंक ऑफ बड़ौदा ने यह दलील दी कि ATM SBI का था और ट्रांजैक्शन उनके रिकॉर्ड में 'सक्सेसफुल' दिख रहा है, इसलिए उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती. हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने इस तर्क को खारिज करते हुए साफ कहा कि ग्राहक का इससे कोई लेना-देना नहीं है और ट्रांजैक्शन से जुड़ा ठोस सबूत पेश करना बैंक की जिम्मेदारी है. आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि RBI के नियमों के मुताबिक 5 दिनों के भीतर राशि वापस की जानी चाहिए थी, लेकिन बैंक ऐसा करने में विफल रहा.
ग्राहक को 3.28 लाख रुपये लौटाने का निर्देश
आयोग ने अपने फैसले में बैंक ऑफ बड़ौदा को निर्देश दिया कि ग्राहक को 10,000 रुपये की मूल राशि 9% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाई जाए. इसके अलावा देरी के लिए 100 रुपये प्रति दिन के हिसाब से मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया. 26 फरवरी 2026 तक 3,288 दिनों की देरी के चलते यह मुआवजा 3,28,800 रुपये तक पहुंच चुका है. साथ ही 3,000 रुपये मानसिक पीड़ा और 2,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में भी देने के लिए निर्देश दिए गए हैं.
आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अंतिम आदेश के साथ ही निपटाया हुआ माना जाए. साथ ही यह भी कहा गया है कि इस आदेश का पालन आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य होगा.
यह फैसला एक कड़ा संदेश देता है कि अगर बैंक ग्राहक की शिकायतों को नजर अंदाज करते हैं और समय पर कार्रवाई नहीं करते, तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. यह मामला न सिर्फ बैंकिंग सिस्टम की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि लंबी लड़ाई के बाद ही सही, लेकिन न्याय मिलना तय है.














