'साधु मंदिर में रहेगा या नहीं, माई लॉर्ड करेंगे तय', बाबुलनाथ मंदिर के पुजारी को लेकर SC सुनाएगा बड़ा फैसला

मुंबई के बाबुलनाथ मंदिर की सीढ़ियों की मिड-लैंडिंग पर बने एक छोटी सी जगह में रहने वाले साधु की किस्मत का फैसला सुप्रीम कोर्ट करने वाला है.

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  • बाबुलनाथ मंदिर की सीढ़ियों पर रहने वाले 75 वर्षीय साधु धर्मराज महाराज का भविष्य SC के फैसले पर निर्भर है
  • धर्मराज महाराज ने दावा किया वे दशकों से मंदिर की मिड-लैंडिंग पर रह रहे हैं और उनके पास किराए की रसीदें हैं
  • मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि सीढ़ियों के बीच की जगह कोई कमरा नहीं है और वह भक्तों के आने-जाने का रास्ता है
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मुंबई के प्रसिद्ध और सैकड़ों साल पुराने बाबुलनाथ मंदिर की सीढ़ियों पर रहने वाले एक 75 वर्षीय साधु के भविष्य का फैसला अब देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट के हाथों में है. साधु भगवान के इस मंदिर में रहेगा या नहीं, ये माई लॉर्ड यानी कोर्ट तय करेगा. शुक्रवार का दिन इस बुजुर्ग तपस्वी के लिए बेहद अहम होने वाला है.

क्या है पूरा विवाद?

मामला गामदेवी स्थित बाबुलनाथ मंदिर की सीढ़ियों के बीच (मिड-लैंडिंग) बनी एक छोटी सी जगह का है. साधु धर्मराज महाराज का दावा है कि वे और उनके गुरु दशकों से यहां रह रहे हैं और उनके पास 2 रुपये प्रति माह किराए की पुरानी रसीदें भी हैं.

दूसरी ओर, मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि सीढ़ियों के बीच की यह जगह कोई कमरा नहीं है, जिसे किराए पर दिया जा सके, बल्कि यह भक्तों के आने-जाने का साझा रास्ता है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी ट्रस्ट के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि ऐसी खुली जगह पर किराएदारी का दावा नहीं किया जा सकता और साधु को जगह खाली करने का आदेश दिया था.

'भगवान नहीं चाहेंगे कि उनके सेवक को हटाया जाए'

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच के सामने बुधवार को इस मामले की सुनवाई हुई. साधु के वकील शोएब आलम ने दलील देते हुए कहा, "ये 75 साल के तपस्वी हैं जिन्होंने अपना परिवार छोड़ दिया है. अब इस उम्र में वे कहां जाएंगे? मंदिर भगवान का घर है और भगवान कभी नहीं चाहेंगे कि उनके सेवक को बेघर किया जाए."

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सुनवाई के दौरान जस्टिस एन.के. सिंह ने भी मंदिर प्रबंधन के वकील से कहा कि इस मामले में "थोड़ी दया दिखाई जानी चाहिए."

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जज ने खुद पेश की मिसाल

इस सुनवाई की एक खास बात यह रही कि जस्टिस करोल ने ईमानदारी से बताया कि वे खुद इस मंदिर में जाते रहे हैं और उन्होंने इस साधु को कई सालों से वहीं देखा है. उन्होंने दोनों पक्षों से पूछा कि क्या उन्हें उनके सुनवाई करने पर कोई आपत्ति है? हालांकि, दोनों पक्षों ने उन पर पूरा भरोसा जताया.

विवाद का लंबा इतिहास

  • 1968: इस जगह पर पहले साधु बाबा रामगिरिजी रहते थे.
  • 1976: मंदिर ट्रस्ट ने पहली बार बेदखली का नोटिस जारी किया.
  • 1996 और 2001: निचली अदालतों ने मंदिर ट्रस्ट के पक्ष में फैसला दिया.
  • नवंबर 2024: बॉम्बे हाईकोर्ट ने साधु की याचिका खारिज कर जगह खाली करने को कहा.

अब पूरी नजरें शुक्रवार की अंतिम सुनवाई पर हैं. क्या अदालत मानवीय आधार पर साधु को वहां रहने की अनुमति देगी या कानून के मुताबिक उन्हें वह स्थान खाली करना होगा? यह देखना दिलचस्प होगा.

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