66 दिन रहे साथ, एक-दूसरे के खिलाफ 40 केस.. 13 साल की कानूनी लड़ाई के बाद अलग हुए दंपती!

सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से एक-दूसरे के खिलाफ केस लड़ रहे दंपती को तलाक लेने की इजाजत दे दी है. दोनों दंपती ने एक-दूसरे के खिलाफ 40 से ज्यादा केस दर्ज कर रखे थे.

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13 साल तक तलाक का मुकदमा
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  • एक कपल के तलाक की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला
  • 13 साल से चल रही इस लड़ाई पर शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी भी की
  • कोर्ट ने कहा कि कपल एक-दूसरे के खिलाफ 40 केस दर्ज कर चुके हैं, ये अदालत को जंग का मैदान बना रहे हैं
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नई दिल्ली:

शादी के बाद केवल 65 दिन साथ रहने वाले दंपती के बीच 13 सालों तक चली कड़वी कानूनी लड़ाई का आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में अंत हो गया. हैरत की बात ये है कि 66 दिन साथ रहने वाले दंपती ने  एक-दूसरे के खिलाफ 40 से अधिक मुकदमे दायर कर दिए. 


कोर्ट ने 10 हजार का जुर्माना भी लगाया 

न्यायिक व्यवस्था को “जंग का मैदान” बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को कड़ी फटकार लगाई और 10-10 हजार का जुर्माना भी लगाया. जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए दंपती को तलाक दे दिया, ताकि “पूर्ण न्याय” किया जा सके. साथ ही अदालत ने दोनों पक्षों को भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ कोई भी नया मामला दायर करने से रोक दिया. 

पति-पत्नी ने अदालत को जंग का मैदान बना दिया!

पीठ ने कहा कि पक्षकार केवल 65 दिनों तक साथ रहे और पिछले एक दशक से अधिक समय में अनेक मुकदमों के जरिए एक-दूसरे से हिसाब चुकता करने में लगे रहे. ऐसे मामलों में दोनों को दंडित किया जाना जरूरी है. यह जुर्माना सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन में जमा कराया जाएगा. अदालत ने चिंता जताई कि दंपती ने 40 से ज्यादा मामले अलग-अलग अदालतों में दायर किए हैं. पीठ ने कहा, “लड़ते हुए पति-पत्नी अदालतों को अपना जंग का मैदान बनाकर न्याय प्रणाली को जाम नहीं कर सकते.  

तो रिश्ता खत्म ही कर दो 

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता (मेडिएशन) पर जोर देते हुए कहा कि विवादों के समाधान के लिए इसे मुकदमे से पहले और मुकदमे के दौरान भी अपनाया जाना चाहिए. अदालत ने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में वैवाहिक विवादों में भारी बढ़ोतरी हुई है और सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर याचिकाओं से भरा पड़ा है, जो अक्सर पति-पत्नी के बीच प्रतिशोध का साधन बन जाती हैं.पीठ ने कहा कि समाज के हित में विवाह को यथासंभव बनाए रखने का प्रयास होना चाहिए, लेकिन जब यह स्पष्ट हो जाए कि शादी पूरी तरह टूट चुकी है और बचने की कोई संभावना नहीं है, तो उसे औपचारिक रूप से खत्म कर देना ही सभी के हित में होता है.

एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं

अदालत ने स्पष्ट किया कि पक्षकारों की आपत्ति के बावजूद भी, यदि साथ रहने की कोई संभावना नहीं है, तो यह अदालत पूर्ण न्याय के लिए विवाह को समाप्त कर सकती है. मामले में दंपती की शादी जनवरी 2012 में हुई थी. पत्नी ने 65 दिन बाद पति और ससुराल वालों पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए घर छोड़ दिया था. तब से दोनों अलग रह रहे थे और दिल्ली व उत्तर प्रदेश की विभिन्न अदालतों में लगातार मुकदमेबाजी चलती रही. तलाक देते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि शायद वे एक-दूसरे के लिए बने ही नहीं थे. आज सहनशीलता का स्तर कम हो गया है और अहंकार बढ़ गया है. एक दशक से ज्यादा की कड़वाहट के बाद अब समय को पीछे ले जाना और साथ रहना संभव नहीं है.

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