500 रुपये की घड़ी विवाद में मौत को लेकर 30 साल से चल रहा था केस, SC ऐसे खत्म किया उत्तराखंड का ये मामला

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड (Uttrakhand Hindi News) में 500 रुपये की घड़ी के विवाद में हुई मौत के मामले में तीन आरोपियों में से एक जिंदा बचे आरोपी को राहत दी है. कोर्ट उसे अब बरी करने का फैसला सुनाया है. जानें पूरा मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के 30 साल पुराने केस को किया खत्म

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने करीब 30 साल पुराने 500 रुपये की घड़ी के विवाद में हुई एक मौत से जुड़े आपराधिक मामले का निपटारा किया है. ये मामला 1997 में सिर्फ 500 रुपये की एक घड़ी को लेकर दो पड़ोसियों के झगड़े से शुरू हुआ था, जिसमें एक शख्स की मौत हो गई थी. फरवरी 1997 में उत्तराखंड निवासी पदम सिंह ने पड़ोसी मनुआ को 500 रुपये की घड़ी बेची थी. बाद में मनुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और वह उसे वापस करने पदम के घर गया. इसी बात पर दोनों के बीच विवाद हुआ. इसके बाद पदम सिंह मनुआ के घर पहुंच गया और झगड़ा बढ़ गया. इस झगड़े में मनुआ के साथ रामू और मथु भी शामिल हो गए. मारपीट के दौरान पदम सिंह पास ही में एक सूखी हुई नहर में गिर गया. इस नहर की तलहटी पत्थरों से भरी हुई थी. गंभीर चोट लगने के कारण अस्पताल में उसकी मौत हो गई और मनुआ और दो अन्य के खिलाफ केस दर्ज हो गया. 

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तीनों आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी करार दिया था

देहरादून की निचली अदालत ने 2002 में तीनों आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए 5 साल की कठोर कैद और 2 हजार जुर्माने की सजा सुनाई. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2012 में इस फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद तीनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन इस केस में सबसे अजीब बात ये भी रही कि अपील लंबित रहने के दौरान मनुआ और रामू की मौत हो गई.

तीन में से दो दोषियों की हो चुकी है मौत

अब फैसला सुनाते हुए जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने कहा है कि घटना को लगभग 30 साल बीत चुके हैं. जीवित बचे आरोपी मथु की उम्र 60 साल से ज्यादा हो चुकी है, जबकि घटना के समय वो 33 साल का था. इससे पहले करीब डेढ़ साल वो जेल में रह चुका है. कोर्ट ने ये भी स्प्ष्ट किया कि पदम सिंह कोचोट सूखी नगर में गिरने से लगी थी न कि पत्थर मारने से. इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन 5 साल की सजा को घटनाकर पहले से काटी गई डेढ़ साल की अवधि तक सीमित कर दिया. इस तरह लगभग तीन दशक पुराने इस मामले का अंत हो गया.

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