3.5 लाख करोड़ की अनक्लेम्ड रकम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र-आरबीआई-सेबी को भेजा नोटिस

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 3 नवंबर के लिए तय की है और तब तक सभी पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा है. यह याचिका आकाश गोयल ने दाखिल की है, जिसमें कहा गया है कि देशभर में करीब ₹3.5 लाख करोड़ रुपये की राशि विभिन्न वित्तीय संस्थानों में अनक्लेम्ड (बिना दावे की) पड़ी हुई है.

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  • SC ने केंद्र सरकार, वित्तीय नियामक से वित्तीय परिसंपत्तियों के लिए केंद्रीकृत पोर्टल बनाने पर जवाब मांगा
  • याचिका में कहा गया है देशभर में करीब 3 लाख 50 हजार करोड़ रुपये की अनक्लेम्ड राशि वित्तीय संस्थानों में पड़ी है
  • अलग नियामक संस्थाओं के बीच समन्वय और केवाईसी आधारित पोर्टल न होने से आम नागरिकों को धन का पता लगाना मुश्किल है
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और कई वित्तीय नियामक संस्थाओं से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें सभी नागरिकों के बैंक खातों, बीमा, म्यूचुअल फंड, पीएफ आदि से जुड़ी सक्रिय, निष्क्रिय और अनुपयोगी वित्तीय परिसंपत्तियों की जानकारी एक ही जगह उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीकृत पोर्टल बनाने की मांग की गई है.

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने इस पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार, उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), सेबी (SEBI), बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI), राष्ट्रीय बचत संस्थान, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और पेंशन फंड विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (PFRDA) को पक्षकार बनाया है .

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 3 नवंबर के लिए तय की है और तब तक सभी पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा है. यह याचिका आकाश गोयल ने दाखिल की है, जिसमें कहा गया है कि देशभर में करीब ₹3.5 लाख करोड़ रुपये की राशि विभिन्न वित्तीय संस्थानों में अनक्लेम्ड (बिना दावे की) पड़ी हुई है.

याचिकाकर्ता का कहना है कि अलग-अलग नियामक संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी और एकीकृत, केवाईसी-आधारित पोर्टल न होने से आम नागरिकों को अपने या अपने परिजनों के नाम पर जमा धन का पता लगाना बेहद कठिन हो गया है. याचिका में कहा गया है कि आरबीआई का ‘उदगम (UDGAM)' पोर्टल, सेबी की नामांकन सुधार पहल जैसी कोशिशें सीमित दायरे में हैं और किसी एक साझा मंच पर सभी वित्तीय सूचनाएं उपलब्ध नहीं हैं.

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इससे गरीब, वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल साक्षरता की कमी वाले लोगों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि किसी व्यक्ति को उसके अपने या उत्तराधिकार में मिले धन तक न पहुंचा पाना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा अनुच्छेद 300A (संपत्ति के अधिकार) का उल्लंघन है.

आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर याचिका में बताया गया है कि आरबीआई के Depositor Education and Awareness Fund  में 2015 के ₹2,795 करोड़ से बढ़कर मार्च 2024 तक ₹78,213 करोड़ जमा हो गए हैं. इसी तरह, Investor Education and Protection Fund (IEPF) में ₹18,000 करोड़ से अधिक की राशि है, जबकि Senior Citizens' Welfare Fund (SCWF) में 2016 से 2021 के बीच ₹7,000 करोड़ जमा हुए हैं.

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याचिका में यह भी बताया गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करीब 29.8 करोड़ खातों में नोमिनी नहीं हैं, जिनमें ₹10 लाख करोड़ से अधिक की राशि जमा है. वहीं, PFRDA के मुताबिक दो लाख से ज्यादा पेंशन खातों में ₹30,610 करोड़ बिना नामांकन के पड़े हैं. दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले इस मुद्दे पर दायर याचिका को निपटाते हुए केंद्र को इसे प्रतिनिधित्व के रूप में लेने का निर्देश दिया था.

लेकिन याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे करोड़ों आम नागरिकों की रकम अब भी बैंकों, बीमा कंपनियों और म्यूचुअल फंड्स में फंसी हुई है.

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