सुप्रीम कोर्ट ने वांगचुक की हिरासत के खिलाफ उनकी पत्नी की याचिका पर सुनवाई 26 फरवरी तक टाली

वांगचुक की ओर से पेश हुए वकील ने दलील दी कि पुलिस ने हिरासत में लेने वाले प्राधिकार को गुमराह करने के लिए चुनिंदा वीडियो का इस्तेमाल किया.

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वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप
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  • सुप्रीम कोर्ट ने सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी की याचिका की सुनवाई 26 फरवरी तक टाल दी
  • वांगचुक को लद्दाख में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में हिरासत में लिया गया था
  • सुनवाई में बताया गया कि वांगचुक को नजरबंदी से पहले वीडियो दिखाने में देरी हुई
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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) के तहत जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को चुनौती देने संबंधी उनकी पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो की याचिका पर सुनवाई सोमवार को 26 फरवरी तक के लिए टाल दी. जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की पीठ ने मामले की सुनवाई सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अनुपलब्धता की वजह से टाली.

वांगचुक पर क्या आरोप

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था. बाद में उन्हें जोधपुर स्थानांतरित कर दिया गया. उनकी नजरबंदी उस समय हुई जब लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत और 90 लोग घायल हुए थे. सरकार ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है.

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वीडियो साक्ष्यों पर बहस

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील विवेक तनका ने अदालत को बताया कि केंद्र द्वारा सौंपे गए 40 मिनट के वीडियो के संदर्भ में वांगचुक को नजरबंदी से पहले वास्तविक वीडियो नहीं दिखाए गए थे. सिर्फ कागज़ पलटे गए, उन्हें बताया गया कि पेन ड्राइव में वीडियो हैं. उन्होंने लैपटॉप मांगा तो कहा गया मिलेगा. लैपटॉप उन्हें 5 तारीख को मिला, जबकि 4 तारीख को ही नजरबंदी का आदेश पारित कर दिया गया. अदालत ने कहा कि वह इस पहलू पर विचार करेगी.

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पहले की दलीलें और कोर्ट का रुख

इससे पहले वांगचुक के वकील ने दलील दी थी कि उन्हें केवल वीडियो के थंबनेल दिखाए गए, वीडियो चलाकर नहीं दिखाए गए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह उस पेन ड्राइव में मौजूद वीडियो देखेगी, जिसे अदालत के निर्देश पर प्रस्तुत किया गया है.

आंगमो की ओर से पेश हुए कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि वांगचुक का वह वीडियो, जिसमें उन्होंने हिंसा का समर्थन न करने की बात कही थी, नजरबंदी प्राधिकरण ने बिल्कुल नहीं देखा. इसके बजाय, पूरी तरह अप्रासंगिक सामग्री को प्राधिकरण के समक्ष रखा गया.

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