श्रीकांत बडवे: बजाज, हीरो, इनफील्ड की बाइक में ताकत भर देता है ये शख्स, इसके बिना मुश्किल में जाएगी ऑटो इंडस्ट्री

Shrikant Badve success story: कैसे एक छोटा सा आइडिया जिंदगी बदल सकता है. श्रीकांत बडवे की बेलराइज इंडस्ट्रीज इसी का उदाहरण है. ये जीरो से हीरो बनने की कहानी है.

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Shrikant Badve Belrise Industries Success story

सोचिए, अगर कल सुबह एक कंपनी काम करना बंद कर दे, तो सड़क पर दौड़ती आपकी पसंदीदा Hero Honda, Bajaj और Royal Enfield जैसी मोटरसाइकिलों का बनना ही मुश्किल हो जाए. और मजे की बात ये है कि शायद ही आपने इस कंपनी का नाम सुना होगा. ये कंपनी है बेलराइज इंडस्ट्रीज (Belrise Industries).

कहानी शुरू होती है 22 साल के एक नौजवान इंजीनियर, श्रीकांत बडवे से. दिल में बड़े सपने थे, लेकिन जेब खाली थी. पुणे जैसे शहर में फैक्ट्री खोलने के पैसे नहीं थे, तो जनाब 230 किलोमीटर दूर औरंगाबाद चले गए. वहां एक किराए का वर्कशॉप लिया, तीन पुरानी मशीनें और दो मजदूरों के साथ सिर्फ 20 हजार रुपये में काम शुरू कर दिया. कंपनी का नाम रखा 'बडवे इंजीनियरिंग'. 

पहला ऑर्डर और कंपनियों की लाइन लग गई

80 के दशक में श्रीकांत ने भांप लिया था कि भारत में आने वाला समय ऑटोमोबाइल सेक्टर का है, खासकर टू-व्हीलर मार्केट बूम करने वाला है. उन्होंने देखा कि बड़ी-बड़ी बाइक कंपनियां हजारों छोटे-छोटे मेटल के पुर्जों के लिए परेशान रहती हैं. ये ऐसे 'बोरिंग' पुर्जे थे, जैसे- फ्रेम, ब्रैकेट, चेसिस, एग्जॉस्ट और सस्पेंशन. जिन्हें बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता था. सब चमक-दमक वाले काम करना चाहते थे. बस, यहीं से उन्हें अपना लक्ष्य मिल गया. 

शुरुआत में संघर्ष था, लेकिन 1990 में किस्मत ने दरवाजा खटखटाया. बजाज कंपनी अपनी नई स्कूटर 'सनी' (Sunny) लॉन्च करने वाली थी. बजाज ने बडवे इंजीनियरिंग को इसके साइलेंसर बनाने का मौका दिया. श्रीकांत ने इस मौके को दोनों हाथों से लपका. उन्होंने सीधे चीन से नई मशीनें मंगवाईं, लेटेस्ट तकनीक में निवेश किया और ऐसी क्वालिटी दी कि फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. देखते ही देखते होंडा, टाटा मोटर्स और यहां तक कि जगुआर-लैंड रोवर (JLR) जैसी दुनिया की दिग्गज कंपनियां उनके दरवाजे पर खड़ी थीं. 

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श्रीकांत के जीनियस आइडिया ने पलटा पूरा गेम

इसके बाद आया वो जीनियस आइडिया जिसने सब कुछ बदल दिया. श्रीकांत ने एक सीधा-सा नियम बनाया- "जहां ग्राहक की फैक्ट्री, वहां हमारी फैक्ट्री."

इसका नतीजा ये हुआ कि जैसे ही पुर्जे बनते, सीधे बाइक कंपनी की असेंबली लाइन में पहुंच जाते. इससे ग्राहक का बड़ा फायदा हुआ- डिलीवरी तेज, लागत कम और गोदाम में स्टॉक रखने का झंझट खत्म. हर कंपनी के लिए वो एक 'ड्रीम सप्लायर' बन गए.

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जो कंपनी एक छोटे से शेड से शुरू हुई थी, वो टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर, फोर-व्हीलर से लेकर इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) तक के पार्ट्स बना रही है. भारत के टू-व्हीलर मेटल कंपोनेंट मार्केट के 24% हिस्से पर आज इनका कब्जा है. ये देश की टॉप-3 कंपनियों में शुमार हैं.

साल 2022 में उन्होंने अपनी कंपनी का नाम बदलकर 'बेलराइज इंडस्ट्रीज' (Belrise Industries) कर दिया. आज देश भर में इनके 17 से ज्यादा बड़े कारखाने हैं, 8000 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं और कंपनी का सालाना टर्नओवर 7000 करोड़ रुपये के पार जा चुका है.

20,000 रुपये से शुरू हुआ ये सफर आज 18 हजार करोड़ रुपये के मार्केट कैप को पार कर चुका है. वो 'बोरिंग' पुर्जे, जिन्हें कोई हाथ नहीं लगाना चाहता था, आज एक विशालकाय साम्राज्य की नींव बन चुके हैं.

 


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