अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते पर 10 अप्रैल को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में होने वाली वार्ता को लेकर भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं है, बल्कि उसे तो इसका स्वागत करना चाहिए. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राजनयिक शशि थरूर ने ये बात NDTV की वसुधा वेणुगोपाल से विशेष बातचीत में कही. थरूर का कहना था कि भारत को इस शांति पहल का स्वागत करना चाहिए क्योंकि आखिरकार भारत भी क्षेत्र में शांति और स्थिरता चाहता है.
संबंधों में हर चीज जीत-हार का गेम नहीं
शशि थरूर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में हर चीज जीरो-सम गेम (एक की जीत दूसरे की हार) नहीं होती. अगर पाकिस्तान को भारत में आतंकवादी भेजने के लिए तालियां मिल रही होतीं तो यह हमारे लिए चिंता की बात होती, लेकिन जब पाकिस्तान शांति कायम कराने की कोशिश रहा है, तो मेरा मानना है कि हमें इसे सेलिब्रेट करना चाहिए. उन्होंने इस बारे में सरकार की तरफ से जारी बयान को परिपक्व और तर्कसंगत बताया और कहा कि भारत को एक क्षेत्रीय शक्ति और ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में रणनीतिक संयम के साथ इस घटनाक्रम को देखना चाहिए.
भारत भी क्षेत्र में शांति चाहता है
शशि थरूर ने कहा कि युद्धविराम के लिए पाकिस्तान को क्रेडिट देना जल्दबाजी होगी, लेकिन वो जो कुछ कर रहा है, उसका सम्मान किया जाना चाहिए. उनका कहना था कि भारत भी क्षेत्र में शांति चाहता है. ऐसे में पाकिस्तान की पहल का मजाक क्यों बनाना? ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होगा तो ऊर्जा बाजार स्थिर होगा, जिसका फायदा भारत को भी मिलेगा. ऐसे में हमें इस शांति प्रक्रिया का आलोचक होने के बजाय एक इच्छुक पड़ोसी के तौर पर देखना चाहिए.
मध्यस्थता पाकिस्तान की मजबूरी?
पाकिस्तान की मध्यस्थता की एक और वजह बताते हुए शशि थरूर ने कहा कि उसकी ईरान से 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है. अगर जंग तेज होती है तो पाकिस्तान को शरणार्थी संकट और अस्थिरता का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में वो अपनी खाल बचाने के लिए भी इसमें लगा हुआ है. इससे उसका सीधा हित जुड़ा है.
नई व्यवस्था के लिए आगे आए भारत
उन्होंने कहा कि अमेरिका जिस नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बात करता था, अब लगता है कि ऐसा कोई नियम ही नहीं बचा है. भारत को क्षेत्र और विश्व में उभरती नई व्यवस्था का ढांचा तैयार करने में एक विश्वसनीय आवाज की तरह खड़ा होने की जरूरत है. यह कोई वजूद बचाने जैसा मामला नहीं है बल्कि यह हमारी अपनी तरक्की, क्षेत्रीय स्थिरता और संभवतः दुनिया के नैतिक विवेक से जुड़ा हुआ है. हम दुनिया को बिखरते नहीं देख सकते. थरूर का कहना था कि जंगल राज किसी के भी हित में नहीं होती. ऐसा हुआ तो हम सभी या तो शिकार बनेंगे या फिर ताकतवर शक्तियों की दया पर निर्भर हो जाएंगे और कोई भी वैसी स्थिति में नहीं रहना चाहेगा.














