बिहार को मिला नया मुख्यमंत्री, क्या 10 साल बाद खत्म होगी शराबबंदी?

राजस्व के आंकड़ों पर नजर डालें, तो शराबबंदी से पहले बिहार को शराब बिक्री से हर साल लगभग 4 हजार से 5 हजार करोड़ रुपये की आय होती थी.

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  • बिहार में 2016 में लागू शराबबंदी राज्य की प्रमुख और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण नीति बनी हुई है.
  • शराबबंदी से राज्य को सालाना लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये के राजस्व में भारी कमी आई है.
  • शराबबंदी लागू रखने में सरकार को हर साल एक से डेढ़ हजार करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च का सामना करना पड़ता है.
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पटना:

बिहार में नए मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा होने के साथ ही एक बार फिर शराबबंदी को लेकर चर्चा तेज हो गई है. साल 2016 में लागू की गई शराबबंदी को राज्य की सबसे बड़ी और चर्चित नीतियों में माना जाता है. इसलिए जैसे ही नेतृत्व में बदलाव हुआ, यह सवाल भी उठने लगता है कि क्या नई सरकार इस नीति को जारी रखेगी या इसमें कुछ बदलाव करेगी.

राजनीतिक गलियारों में इस समय यही चर्चा है कि नई सरकार शराबबंदी की समीक्षा कर सकती है, खासकर तब जब राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव लगातार बढ़ रहा है. यह चर्चा इसलिए भी तेज हुई है, क्योंकि बीते दिनों एनडीए में शामिल कुछ नेता खुद शराबबंदी समाप्त करने या उसमें संशोधन की मांग उठा चुके हैं. इसमें सबसे पहला नाम जीतन राम मांझी का है. उन्होंने कई बार सरकार से शराबबंदी कानून में ढील देने की बात कही है. वहीं, हाल ही में मधुबनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक माधव आनंद ने भी शराबबंदी कानून को लेकर बिहार विधानसभा में सवाल खड़े किए थे.

महिलाओं ने शराबबंदी को बताया जरूरी

बिहार में शराबबंदी सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. खासकर महिलाओं और ग्रामीण इलाकों में इस नीति को लेकर समर्थन का एक मजबूत आधार तैयार हुआ है. कई जगहों पर महिलाओं ने शराबबंदी को अपने परिवार और समाज के लिए जरूरी बताया है. यही वजह है कि कोई भी सरकार इस कानून को अचानक खत्म करने का जोखिम आसानी से नहीं लेना चाहेगी. लेकिन इसके साथ-साथ सरकार के सामने एक बड़ा आर्थिक सवाल भी खड़ा है, क्योंकि शराबबंदी लागू होने के बाद राज्य के राजस्व पर सीधा असर पड़ा है.

शराबबंदी से राजस्व को कितना घाटा?

राजस्व के आंकड़ों पर नजर डालें, तो शराबबंदी से पहले बिहार को शराब बिक्री से हर साल लगभग 4 हजार से 5 हजार करोड़ रुपये की आय होती थी. यह राशि राज्य के कुल कर राजस्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती थी. शराबबंदी लागू होने के बाद यह आय लगभग खत्म हो गई. वित्त विभाग के अनुमान के अनुसार, पिछले 8–9 वर्षों में राज्य को शराब से मिलने वाले संभावित राजस्व के रूप में कुल मिलाकर 35 हजार से 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है. ऐसे समय में जब राज्य का कुल बजट करीब 2.78 लाख करोड़ रुपये है और अपनी आय सीमित है, यह नुकसान सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.

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शराबबंदी कानून को लागू रखने में कितना खर्च 

महिलाए को जब से नीतीश सरकार ने 10 हजार रुपए बांटे  है, तब से सरकारी खजाने की स्थिति और भी गंभीर हो गई है. इसके अलावा शराबबंदी लागू करने और उसे सख्ती से लागू कराने में भी सरकार को हर साल बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है. पुलिस, उत्पाद विभाग, जेल और न्यायालय से जुड़े खर्चों को जोड़ दें, तो अनुमान है कि शराबबंदी कानून को लागू रखने में हर साल 1 हजार से 1.5 हजार करोड़ रुपये तक अतिरिक्त खर्च हो जाता है. यानी एक तरफ राजस्व का नुकसान हो रहा है और दूसरी तरफ कानून लागू करने में अलग से खर्च बढ़ रहा है. यही वजह है कि कई आर्थिक विशेषज्ञ अब इसे वित्तीय दृष्टि से भी एक बड़ी चुनौती मान रहे हैं.

नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह कानून को सख्ती से लागू करने के साथ-साथ राज्य की आय के नए स्रोत भी खोजे. बिहार की अपनी टैक्स आय अभी भी करीब 60 से 65 हजार करोड़ रुपये के आसपास है, जबकि राज्य की जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं. कर्मचारियों का वेतन, पेंशन, सामाजिक योजनाएं और विकास कार्यों पर हर साल भारी खर्च करना पड़ता है. ऐसे में अगर राजस्व के स्रोत सीमित रहेंगे, तो खजाने पर दबाव बढ़ना तय है.

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शराबबंदी बेहद संवेदनशील मुद्दा

राजनीतिक तौर पर भी यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है, क्योंकि शराबबंदी सीधे तौर पर महिलाओं और गरीब तबके के वोट बैंक से जुड़ा हुआ है. इसलिए सरकार तुरंत शराबबंदी खत्म करने का फैसला नहीं लेगी, लेकिन इसमें कुछ व्यावहारिक बदलाव पर विचार जरूर कर सकती है. उदाहरण के तौर पर, छोटे मामलों में सजा कम करना, जुर्माने की प्रक्रिया को आसान बनाना या सीमित क्षेत्रों में नियंत्रित व्यवस्था लागू करने जैसे विकल्पों पर चर्चा हो सकती है. इससे कानून की मूल भावना भी बनी रहेगी और सरकार को कुछ आर्थिक राहत भी मिल सकती है.

सूत्रों की माने तो सरकार इसे खत्म करने के लिए अदालत का सहारा ले सकती है, यानी की इसे खत्म करने के लिए सरकार को कोर्ट का आदेश आ सकता है और तब सरकार इसे अपनी मजबूरी बता कर इस कानून से पल्ला झाड़ लेगी. 
आने वाले समय में असली संकेत सरकार के फैसलों और बजट से मिलेगा. अगर राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव और बढ़ता है, तो शराबबंदी नीति को लेकर बहस और तेज हो सकती है. फिलहाल इतना साफ है कि नई सरकार के सामने सिर्फ कानून और व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि राजस्व और आर्थिक संतुलन का मुद्दा भी उतना ही बड़ा बन चुका है.

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