यू-ट्यूबरों और इंफ्लुएंसर्स के लिए बनेंगे नियम, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा- NBSA से लें राय

केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि प्रस्तावित दिशानिर्देशों का पहला और जरूरी मकसद सोशल मीडिया यूजर्स को संवेदनशील बनाना होगा. उन्होंने कहा कि यदि कोई उल्लंघन करता है, तो उसे जिम्मेदारी लेनी होगी. उन्होंने यह भी कहा कि कई मीडिया ब्लॉग केवल व्यक्तिगत अहंकार को पोषित करने का माध्यम बन गए हैं.

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  • सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंटेंट नियंत्रित करने वाले प्रस्तावित दिशानिर्देशों का रिकॉर्ड देने को कहा
  • कोर्ट ने दिशानिर्देशों के निर्माण में समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण के परामर्श को अनिवार्य कर दिया है
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग से विभिन्न संवेदनशील वर्गों की भावनाएं आहत होने की चिंता जताई गई
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नई दिल्ली:

देशभर के यू-ट्यूबरों और इंफ्लुएंसर्स के लिए बड़ी जरूर खबर आई है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाने वाले तमाम कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए प्रस्तावित दिशानिर्देशों का रिकॉर्ड अदालत में पेश करे. इसके साथ ही कोर्ट ने ये भी साफ किया कि ये दिशानिर्देश समाचार प्रसारण मानक प्राधिकरण (NBSA) के परामर्श के साथ तैयार किए जाएं. अब इस मामले की अगली और अहम सुनवाई नवंबर में होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से क्या कुछ कहा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग को लेकर  अपनी चिंता जाहिर की है. कोर्ट ने कहा कि प्रभावशाली लोग इस स्वतंत्रता का व्यवसायीकरण कर रहे हैं, जिससे दिव्यांग, महिलाएं, बच्चे, वरिष्ठ नागरिक और अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत हो सकती हैं. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र को हिदायत दी है.

पॉडकास्ट भी हो दायरे में...

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कि वह पॉडकास्ट जैसे ऑनलाइन शो सहित सोशल मीडिया पर आचरण को विनियमित करने के लिए राष्ट्रीय प्रसारकों और डिजिटल एसोसिएशन के साथ मिलकर दिशानिर्देश तैयार करे. अधिवक्ता निशा भंभानी ने इस मामले में डिजिटल एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व किया. कोर्ट ने कहा कि इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज के विभिन्न वर्गों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होना चाहिए.

समय रैना मामले की सुनवाई

यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट कॉमेडियन समय रैना के खिलाफ विकलांग व्यक्तियों को लेकर असंवेदनशील मजाक मामले की सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग बताया. जस्टिस बागची ने कहा, “हंसना जीवन का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन हल्केपन में संवेदनशीलता का हनन नहीं होना चाहिए. हम विविध समुदायों का देश हैं.” वहीं, जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि दिव्यांगों पर चुटकुले बनाकर उन्हें मुख्यधारा में लाने का संवैधानिक उद्देश्य ही खत्म हो जाता है.

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दिशानिर्देशों में हो स्पष्ट परिणाम

कोर्ट ने यह भी कहा कि दिशानिर्देशों में उल्लंघन के स्पष्ट और प्रभावी परिणाम तय किए जाने चाहिए. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “जब तक परिणाम प्रभावी नहीं होंगे, लोग जिम्मेदारी से बचने के लिए इधर-उधर भटकते रहेंगे. ये परिणाम सिर्फ औपचारिकता नहीं होने चाहिए.”

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