- भारतीय क्रिकेटर रिंकू सिंह के पिता का कैंसर के कारण निधन हो गया है, जिससे वे भावनात्मक रूप से टूट गए हैं
- रिंकू सिंह अपने पिता की बीमारी के दौरान वर्ल्ड कप से बीच में मिलने ग्रेटर नोएडा भी गए थे, फिर टीम में लौटे थे
- रिंकू सिंह अलीगढ़ के गरीब परिवार से हैं, जिनके पिता ने सिलेंडर डिलीवरी कर बेटे के सपनों को संजोया था
भारतीय क्रिकेट के सितारे रिंकू सिंह इस समय इस बेहद कठिन दौर से गुजर रहे हैं. आज तड़के सुबह उनके पिता का निधन हो गया. वो लंबे वक्त से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे. पिता की तबीयत बिगड़ने पर रिंकू वर्ल्ड कप के बीच में उनके पास आ गए थे. लेकिन देश के प्रति अपने फर्ज से भी पीछे नहीं हटना था इसलिए वो कल हुए भारत-जिम्बाब्वे के मैच में चेन्नई पहुंच गए. वो प्लेनिंग 11 का हिस्सा नहीं थे लेकिन मैदान में फील्डिंग करते हुए दिखे. अब पिता के निधन से रिंकू टूट गए होंगे. क्योंकि वो अपने पिता को जान बताते थे. एक बेहद अहम टूर्नामेंट में पिता का साया सिर से उठना और बेहद जरूरी मैच. रिंकू को अब दो-दो फर्ज निभाना होगा. एक बेटे और दूसरा टीम इंडिया के शानदार फिनिशर का. ऐसे मुश्किल वक्त में रिंकू को खुद को संभालना होगा. टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सचिन तेंदलुकर से लेकर विराट कोहली भी ऐसे मुश्किल वक्त का सामना कर चुके हैं. रिंकू ने आज अपना अक्स खोया है. उस अक्स का दर्द जरूर रिंकू को परेशान कर रहा होगा.
पिता ने सिलेंडर डिलिवर करके बेटे के सपनों को सींचा
रिंकू सिंह एक बेहद गरीब परिवार से आते हैं. वो यूपी के अलीगढ़ के रहने वाले हैं. उनके पिता खानचंद्र सिंह ने घर-घर गैस सिलेंडर पहुंचाकर रिंकू के सपनों को सींचा था. आज जब बेटा कामयाबी के शिखर पर है, तो पिता का ऐसे अचानक चले जाना रिंकू के लिए भावनात्मक रूप से तोड़ देने पल वाला है. रिंकू जब मैदान पर बल्ला घुमाते हैं, तो उनकी आंखों में सिर्फ गेंद नहीं, बल्कि वो संघर्ष भी होता है जो उनके पिता ने झेला है. रिंकू का यह संघर्ष दिखाता है कि एक खिलाड़ी के लिए भारत की नीली जर्सी पहनना सिर्फ खेल नहीं, बल्कि अपने परिवार के त्याग का हिसाब देना भी है.
एक इंटरव्यू के दौरान रिंकू सिंह ने कहा था मेरे पिता ने बहुत संघर्ष किया. इसलिए मैंने मैदान से बाहर जो भी बॉल मारी, वह उन लोगों को डेडिकेट की जिन्होंने मेरे लिए इतना कुछ त्यागा. रिंकू अलीगढ़ में एक छोटे से दो कमरे के मकान में रहते थे. एक समय रिंकू को परिवार की मदद के लिए कोचिंग सेंटर में झाड़ू लगाने की नौकरी का प्रस्ताव मिला था, जिसे उन्होंने ठुकरा कर क्रिकेट को चुना. बता दें कि रिंकू के पिता को कैंसर की बीमारी थी और उनका इलाज ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में चल रहा था. रिंकू बीच वर्ल्ड कप पिता से मिलने ग्रेटर नोएडा भी पहुंचे थे. लेकिन देश के प्रति अपने कर्तव्य ने उन्हें फिर खेल के मैदान में पहुंचा दिया था.
देश और परिवार दोनों के लिए निभाना है फर्ज
रिंकू सिंह टी20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम का अहम हिस्सा हैं. टीम को उनकी जरूरत है. आगामी 1 मार्च को भारत और वेस्टइंडीज का अहम मुकाबला खेला जाना है. अगर भारत को सेमीफाइनल में पहुंचना है तो ये मैच जीतना ही होगा. ऐसे में भारतीय टीम को अपने सबसे बेहतरीन फिनिशर रिंकू सिंह की जरूरत है. रिंकू सिंह ये मैच खेलेंगे या नहीं, ये अभी साफ नहीं हो पाया है. लेकिन ये फैसला उनके लिए भावनात्मक रूप से कितना कठिन होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.
कभी विराट कोहली ने भी किया था ऐसे कठिन दौर का सामना
समय जिस तरह रिंकू सिंह की परीक्षा ले रहा था ठीक वैसा ही पल का सामना विराट कोहली ने भी किया था. 19 दिसंबर 2006 को जब विराट महज 18 साल के थे, दिल्ली के लिए कर्नाटक के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच खेल रहे थे. मैच के दौरान ही रात देर रात उनके पिता प्रेम कोहली का निधन हो गया. सुबह पूरी टीम को लगा कि विराट नहीं आएंगे, लेकिन वे पैड पहनकर मैदान पर उतरे. उन्होंने 90 रनों की जुझारू पारी खेली और अपनी टीम को हार से बचाया. अपनी पारी खत्म करने के बाद ही वे सीधे पिता के अंतिम संस्कार के लिए गए और बेटे होने का फर्ज अदा किया.
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सचिन तेंदुलकर के जीवन में आया वो भावुक पल
इसके अलावा मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के जीवन में भी ऐसा क्षण आया था. 1999 के वर्ल्ड कप के दौरान सचिन को अपने पिता प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर के हार्ट अटैक से निधन की खबर मिली. सचिन तुरंत भारत लौटे और जिम्बाब्वे के खिलाफ मैच नहीं खेल पाए, जिसमें भारत को हार का सामना करना पड़ा. पिता के अंतिम संस्कार के बाद सचिन बहुत टूटे हुए थे, लेकिन उनकी मां रजनी तेंदुलकर ने उनसे कहा, 'तुम्हें वापस जाना होगा और अपने देश के लिए खेलना होगा, क्योंकि तुम्हारे पिता भी यही चाहते थे.' वापसी के बाद 23 मई 1999 को केन्या के खिलाफ मैच में सचिन ने 101 गेंदों पर नाबाद 140 रन बनाए. शतक पूरा करने के बाद उन्होंने पहली बार आसमान की ओर देखकर अपने पिता को याद किया.
रिंकू सिंह आज उसी अग्निपरीक्षा से गुजर रहे हैं जिससे कभी सचिन और विराट गुजरे थे. यह महज एक खेल नहीं, बल्कि अपने पिता के उस संघर्ष को सम्मान देने का तरीका है जिसने उन्हें शून्य से शिखर तक पहुंचाया. जब रिंकू मैदान पर उतरेंगे, तो उनके साथ न केवल 140 करोड़ भारतीयों की दुआएं होंगी, बल्कि सचिन और विराट जैसा वह अदम्य साहस भी होगा जो अपनों को खोकर भी देश को जिताना जानता है.













