7 RCR हुआ लोक कल्याण मार्ग, PMO बना सेवा तीर्थ... PM मोदी खुद रखते हैं ये नाम, आज इन नए नामों की वजह भी बताई

सरकार का कहना है कि ये परिवर्तन एक गहरे वैचारिक परिवर्तन का संकेत देते हैं. भारतीय लोकतंत्र सत्ता से ऊपर जिम्मेदारी और पद से ऊपर सेवा को चुन रहा है. नामों में परिवर्तन सोच में भी परिवर्तन है.

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  • पीएम मोदी ने नए प्रधानमंत्री कार्यालय की इमारत का नाम सेवा तीर्थ रखा है, जो सेवा की भावना को दर्शाता है
  • सेवा तीर्थ भवन में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय एक साथ हैं
  • सरकार ने कई प्रमुख स्थानों के नाम बदलकर सेवा, कर्तव्य और लोक कल्याण के संदेश को प्राथमिकता दी है
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नई दिल्ली:

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को नए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) का उद्घाटन किया. इस नई इमारत का नाम उन्होंने ‘सेवा तीर्थ' रखा  है. इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय हैं, जो पहले अलग-अलग स्थानों पर थे. सेवा तीर्थ की इस बिल्डिंग पर देवनागरी लिपि में ‘नागरिक देवो भव' लिखा गया है. पीएम ने इस मौके पर कहा कि ये स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि नाम बदलने की पहल केवल शब्दों का बदलाव नहीं है. इन सभी प्रयासों के पीछे वैचारिक सूत्रता एक ही है- 'स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान, गुलामी से मुक्त निशान'. उन्होंने कहा कि नए प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम 'सेवा तीर्थ' है. सेवा की भावना ही भारत की आत्मा है.

ये पहली बार नहीं है, जब मोदी सरकार ने किसी प्रमुख स्थल या भवन के नाम बदले हैं. इससे पहले भी कई प्रमुख स्थानों के नए नाम रखे गए हैं. जैसे साउथ ब्लॉक - सेवा तीर्थ हुआ है. उसी तरह केंद्रीय सचिवालय - कर्तव्य भवन, राजपथ - कर्तव्य पथ, रेस कोर्स रोड - लोक कल्याण मार्ग और राज भवन/राज निवास अब लोक भवन/लोक निवास के नाम से जाने जा रहे हैं. खास बात ये है कि प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी स्वयं ये नए नामकरण कर रहे हैं.

  • साउथ ब्लॉक → सेवा तीर्थ
  • केंद्रीय सचिवालय → कर्तव्य भवन
  • राजपथ → कर्तव्य पथ
  • रेस कोर्स रोड → लोक कल्याण मार्ग
  • राज भवन/राज निवास → लोक भवन/लोक निवास

आजादी के बाद भी गुलामी के प्रतीकों को ढोया जाता रहा- पीएम मोदी

शुक्रवार के अपने भाषण में पीएम मोदी ने ऐतिहासिक इमारतों के नए नामकरण के पीछे की वजह भी खुद ही बताई. उन्होंने कहा कि विकसित भारत की यात्रा में यह बहुत जरूरी है कि भारत गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर आगे बढ़े. दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद भी हमारे यहां गुलामी के प्रतीकों को ढोया जाता रहा. 2014 में देश ने औपनिवेशिक और दासात्मक मानसिकता के अवशेषों से मुक्ति पाने का संकल्प लिया. हमने गुलामी की मानसिकता को बदलने का अभियान शुरू किया. हमने वीरों के नाम पर नेशनल वॉर मेमोरियल बनाया. हमने पुलिस की वीरता को सम्मान देने के लिए पुलिस स्मारक बनाया. रेसकोर्स का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया. यह केवल नाम बदलने का निर्णय नहीं था, यह सत्ता के मिजाज को सेवा की भावना में बदलने का पवित्र प्रयास था.

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सरकार का कहना है कि भारत के सार्वजनिक संस्थानों में एक गहरा बदलाव आ रहा है. शासन की अवधारणा सत्ता से सेवा की ओर और अधिकार से उत्तरदायित्व की ओर बढ़ रही है. यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक भी है. हर नाम, हर इमारत और हर प्रतीक अब एक सरल विचार की ओर इशारा करता है. सरकार सेवा के लिए बनी है.
  1. राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया गया. एक प्रमुख सड़क अब एक संदेश देती है. सत्ता कोई अधिकार नहीं है, बल्कि एक कर्तव्य है.
  2. प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास का नाम 2016 में बदलकर लोक कल्याण मार्ग कर दिया गया. एक ऐसा नाम जो कल्याण को दर्शाता है, न कि विशिष्टता को. यह हर निर्वाचित सरकार के सामने आने वाले कार्यों की याद दिलाता है.
  3. प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर को सेवा तीर्थ कहा जाता है. यह एक ऐसा कार्यस्थल है जो सेवा की भावना को प्रतिबिंबित करता है और जहां राष्ट्रीय प्राथमिकताएं आकार लेती हैं.
  4. केंद्रीय सचिवालय का नाम कर्तव्य भवन रखा गया है. यह एक विशाल प्रशासनिक केंद्र है, जो इस विचार पर आधारित है कि लोक सेवा एक प्रतिबद्धता है.
  5. केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने शुक्रवार को ही कहा कि सरकार ने दिल्ली मेट्रो के उद्योग भवन स्टेशन का नाम बदलकर सेवा तीर्थ भवन स्टेशन रखने का निर्णय लिया है.
  6. राज्यों के राज्यपालों के आधिकारिक आवास ‘राजभवन' का नाम भी बदलकर ‘लोक भवन' रखा गया है.

सरकार का कहना है कि ये परिवर्तन एक गहरे वैचारिक परिवर्तन का संकेत देते हैं. भारतीय लोकतंत्र सत्ता से ऊपर जिम्मेदारी और पद से ऊपर सेवा को चुन रहा है. नामों में परिवर्तन सोच में भी परिवर्तन है. आज वे सेवा, कर्तव्य और नागरिक-प्रथम शासन की भाषा बोलते हैं. हर नाम, हर इमारत और हर प्रतीक अब एक सरल विचार की ओर इशारा करते हैं.

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