- बिहार में विभिन्न विभागों की लगभग एक लाख पचास हजार करोड़ रुपये की कई परियोजनाएं अभी भी अधूरी स्थिति में हैं
- सड़क और पुल निर्माण के क्षेत्र में साठ हजार करोड़ रुपये की परियोजनाएं चल रही हैं जिनमें पटना रिंग रोड भी है
- स्वास्थ्य क्षेत्र में 20 नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने की योजना अधूरी है
बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही अब यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि पिछले वर्षों में शुरू की गई बड़ी योजनाओं और परियोजनाओं का क्या होगा? लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण कई ऐसी योजनाएं हैं, जिन्हें राज्य की पहचान से जोड़ा गया, लेकिन उनमें से कई अब भी अधूरी हैं या पूरी रफ्तार नहीं पकड़ सकी हैं. सरकारी दस्तावेजों और विभागीय आंकड़ों के अनुसार, राज्य में इस समय विभिन्न विभागों की करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली सैकड़ों परियोजनाएं अलग-अलग चरणों में चल रही हैं. ऐसे में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही मानी जा रही है कि वह इन अधूरे कामों को किस प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाती है.
60 हजार करोड़ सड़क-पुल योजनाएं अधूरी
सबसे ज्यादा चर्चा बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को लेकर हो रही है. बिहार में सड़क और पुल निर्माण से संबंधित करीब 60 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं चल रही हैं. पटना में रिंग रोड परियोजना की अनुमानित लागत करीब 7,500 करोड़ रुपये बताई जाती है, जबकि गंगा पथ और उससे जुड़े फ्लाईओवर परियोजनाओं पर 3,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुका है. इसके बावजूद कई हिस्सों में काम अभी अधूरा है और समय सीमा बार-बार आगे बढ़ाई गई है. राज्य सरकार के अनुसार, केवल पथ निर्माण विभाग में ही 200 से अधिक सड़क और पुल परियोजनाएं ऐसी हैं, जिनकी तय समय सीमा बढ़ाई जा चुकी है.
कब खुलेंगे 20 नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल
नीतीश कुमार के राज में स्वास्थ्य क्षेत्र में भी कई बड़ी योजनाएं अधूरी मानी जा रही हैं. बिहार में पिछले कुछ वर्षों में लगभग 20 नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने की योजना बनाई गई थी. इनमें से कई का निर्माण कार्य अभी जारी है और कुछ पूरी तरह शुरू नहीं हो पाए हैं. राज्य में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार में सरकारी अस्पतालों में करीब 30 से 35 प्रतिशत डॉक्टरों के पद खाली हैं. इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ रहा है. नई सरकार के सामने यह चुनौती होगी कि इन संस्थानों को जल्द चालू किया जाए और जरूरी स्टाफ की नियुक्ति की जाए.
टीचर्स के 1 लाख खाली पद कब भरेंगे?
शिक्षा के क्षेत्र में भी कई योजनाएं अभी अधूरी हैं. बिहार में सरकारी स्कूलों में करीब 3.5 से 4 लाख शिक्षक कार्यरत हैं, लेकिन अभी भी लगभग 1 लाख पद खाली बताए जाते हैं. कई स्कूलों में भवन और बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. शिक्षा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के विश्वविद्यालयों में करीब 40 प्रतिशत तक शिक्षकों के पद खाली हैं. इससे शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है.
हर साल 10 लाख नौकरियां देने का वादा कब होगा पूरा
रोजगार और उद्योग के क्षेत्र में भी कई लक्ष्य अभी पूरे नहीं हो पाए हैं. सरकार ने पिछले वर्षों में 10 लाख से अधिक सरकारी नौकरियां देने का लक्ष्य रखा था. इसमें से बड़ी संख्या में नियुक्तियां जरूर हुई हैं, लेकिन अभी भी हजारों पदों पर बहाली की प्रक्रिया लंबित है. उद्योग के मामले में भी राज्य में बड़े निवेश की गति अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ सकी है. उद्योग विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में करीब 50 हजार करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए, लेकिन उनमें से एक बड़ा हिस्सा जमीन पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है. यही वजह है कि रोजगार का मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है.
'हर घर नल-जल योजना' पर भी सवाल
कृषि और ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं की स्थिति भी मिश्रित रही है. हर घर नल-जल योजना पर अब तक करीब 45 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन कई जिलों में पानी की नियमित आपूर्ति को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं. सिंचाई परियोजनाओं पर भी हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, फिर भी राज्य के कई इलाकों में किसान अभी भी मानसून पर निर्भर हैं. ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए हर साल हजारों किलोमीटर सड़क बनाने का लक्ष्य तय किया जाता है, लेकिन कई जगहों पर काम की गुणवत्ता और समयसीमा को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
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राजनीतिक नजरिए से देखें, तो नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह पुराने कामों को पूरा करने और नई योजनाएं शुरू करने के बीच संतुलन बनाए. अधूरी परियोजनाओं पर पहले से ही बड़ी राशि खर्च हो चुकी है और अगर उन्हें समय पर पूरा नहीं किया गया, तो लागत और बढ़ सकती है. वित्त विभाग के अनुमान के अनुसार, किसी परियोजना में एक साल की देरी होने पर उसकी लागत औसतन 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि नई सरकार किन योजनाओं को प्राथमिकता देती है और किन क्षेत्रों में सबसे पहले सुधार की कोशिश करती है. फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि अधूरे कामों को समय पर पूरा करना नई सरकार की प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक विश्वसनीयता की सबसे बड़ी परीक्षा होगी.
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