कभी 61 जिलों तक फैला था 'लाल आतंक', अब 5 में सिमटा... 7 साल में ऐसे हुआ नक्सलियों का 'The End'

केंद्र सरकार ने नक्सल-फ्री इंडिया की डेडलाइन 31 मार्च 2026 रखी है. अब इसमें सिर्फ 40 दिन बचे हैं. ऐसे में जानते हैं कि पिछले 7 साल में किस तरह से नक्सलवाद का खात्मा हुआ?

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  • बिहार में 23 नक्सल प्रभावित जिले थे, जो अब पूरी तरह नक्सल मुक्त हो गए हैं और अंतिम नक्सली ने सरेंडर कर दिया है
  • सरकार ने 2019 से 2026 तक नक्सल प्रभावित जिलों को घटाकर केवल दो राज्यों के पांच जिलों तक सीमित कर दिया है
  • नक्सल विरोधी ऑपरेशनों में पिछले सात वर्षों में हजारों नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और कई ने सरेंडर किया है
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नई दिल्ली:

चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग ने एक बार कहा था- 'एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा देती है.' भारत में भी नक्सलवाद की यही चिंगारी मई 1967 में पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी जिले में पड़ने वाले नक्सलबाड़ी गांव में उठी थी. तब आदिवासी किसानों ने जमींदारों के खिलाफ हथियार उठा लिए थे. ये वो लोग थे जो माओ की विचारधारा को मानते थे. नक्सलबाड़ी से निकली ये चिंगारी देखते-देखते देश के कई हिस्सों में फैल गई और इस तरह से भारत में 'नक्सलवाद' या 'माओवाद' की शुरुआत हुई. 

आज से लगभग 49 साल पहले एक चिंगारी से भड़की आग अब लगभग बुझ गई है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश के नक्सल फ्री होने की डेडलाइन 31 मार्च 2026 रखी है. अब इसमें 40 दिन ही बचे हैं. और पिछले कुछ सालों में नक्सलवाद के खिलाफ इतना तेज ऑपरेशन चलाया है कि अब भारत लगभग नक्सल फ्री हो गया है.

बिहार भी अब नक्सल फ्री

बिहार भी उन राज्यों में था जिसके दर्जनभर जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे. अब बिहार पूरी तरह से नक्सल फ्री हो गया है. बिहार में बुधवार को 3 लाख के इनामी नक्सली सुरेश कोड़ा ने सरेंडर कर दिया. सुरेश कोड़ा 60 मामलों में आरोपी था और 25 साल से फरार था.

मुंगेर के डीआईजी राकेश कुमार ने बताया कि बिहार में पहले नक्सल प्रभावित 23 जिले थे लेकिन अब एक भी नहीं है. सुरेश कोड़ा आखिरी नक्सली था, जिसने बुधवार को सरेंडर कर दिया.

साल 2012 में बिहार के 23 जिले नक्सल प्रभावित थे. 70 के दशक में बिहार में नक्सलवाद तेजी से बढ़ा. खासकर मध्य बिहार के जिलों में. लेकिन पिछले कुछ सालों में सुरक्षाबलों के ऑपरेशन से नक्सलवाद की कमर तेजी से टूटी. 2025 में बिहार में एक भी नक्सली घटना नहीं हुई.

7 साल में ऐसे हुआ नक्सलियों का 'The End'

केंद्र सरकार नक्सलवाद या माओवाद को 'वामपंथी उग्रवाद' कहती है. 3 फरवरी को संसद में गृह मंत्रालय ने इसे लेकर कुछ जानकारी और आंकड़े पेश किए थे. इसमें बताया था कि 2019 से लेकर अब तक नक्सलवाद किस तरह से खत्म होता चला गया.

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इसमें सरकार 2019 से जनवरी 2026 तक के आंकड़े दिए थे. इसमें सरकार ने बताया था कि 2019 तक देश के 9 राज्यों के 61 जिलों के 245 पुलिस थानों तक नक्सलवाद फैला हुआ था. जनवरी 2026 तक सिर्फ दो राज्यों के 5 जिले और 11 पुलिस थाने ही नक्सल प्रभावित बचे थे.

इन 7 सालों में 7,409 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि इसी दौरान 5,880 नक्सलियों ने सरेंडर कर दिया. 

सरकार ने बताया था कि 2019 तक आंध्र प्रदेश के 2, बिहार के 14, छत्तीसगढ़ के 12, झारखंड के 16, केरल, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 2-2, ओडिशा के 8 और तेलंगाना के 3 जिले नक्सल प्रभावित थे. अब सिर्फ छत्तीसगढ़ के 3 और झारखंड के 2 जिले ही नक्सल प्रभावित हैं.

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कैसे नक्सल फ्री हुआ इंडिया?

गृह मंत्रालय के मुताबिक, नक्सली घटनाओं और इनमें शहीद होने वाले सुरक्षाबलों और नागरिकों की मौत की संख्या में बहुत ज्यादा गिरावट आई है.

आंकड़ों के मुताबिक, 2004 से 2014 के बीच देशभर में 16,463 नक्सली घटनाएं हुई थीं, जिनमें 1,851 जवान शहीद हुए थे और 4,766 लोगों की मौत हुई थी. वहीं, 2014 से 2024 के बीच 7,744 नक्सली घटनाओं में 509 जवान शहीद हुए और 1,495 लोग मारे गए. इस हिसाब से 2014 से 2024 के बीच नक्सली घटनाओं में 53% की गिरावट आई है.

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बीते 7 सालों में सबसे अच्छा साल 2025 रहा. अकेले 2025 में ही 270 से ज्यादा नक्सलियों को ढेर किया गया. एक हजार से ज्यादा नक्सली गिरफ्तार हुए, जबकि 2,337 नक्सलियों ने सरेंडर कर दिया.

और ये सब हुआ कैसे?

संसद में दिए जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया था कि 2014-15 के बाद से लगभग 3,682 करोड़ रुपये का फंड नक्सल प्रभावित राज्यों के लिए जारी किया गया. इसका इस्तेमाल सुरक्षाबलों की ट्रेनिंग, सरेंडर करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास और नक्सली हमलों में मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा देने में किया जाता है.

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इसके अलावा, केंद्र सरकार सरेंडर पॉलिसी भी लेकर आई है. इसके लिए राज्य सरकारों की मदद की जाती है. वांटेड या बड़े नक्सलियों को सरेंडर करने पर तत्काल 5 लाख रुपये की मदद मिलती है. अगर छोटा नक्सली है तो उसे 2.5 लाख रुपये मिलते हैं. हथियार और गोला-बारूद सरेंडर करने पर भी इंसेंटिव दिया जाता है. साथ ही अगले तीन साल तक उस नक्सली को उसके मनपसंद काम की ट्रेनिंग मिलती है और हर महीने 10 हजार रुपये स्टाइपेंड दिया जाता है.

जो इलाके अब तक नक्सलवाद से प्रभावित थे, अब नक्सल-फ्री होने के बाद वहां भी विकास होने लगा है. नक्सल-फ्री होने वाले इलाकों में अब सड़कें बन रही हैं, मोबाइल टॉवर बन रहे हैं, स्कूल खुल रहे हैं, बैंक और पोस्ट ऑफिस खुल रहे हैं.

सरकार के मुताबिक, नक्सल-फ्री होने वाले इलाकों में जनवरी 2026 तक 15 हजार किलोमीटर की सड़कें बनाई जा चुकी हैं. इन इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी के लिए 9,233 टॉवर खड़े हो चुके हैं. स्किल डेवलपमेंट के लिए 46 ITI और 49 स्किल डेवलपमेंट सेंटर (SDC) खोले जा चुके हैं. इसके साथ ही 179 एकलव्य मॉडल स्कूल भी यहां खुल गए हैं. 

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इतना ही नहीं, नक्सल-फ्री जिलों में 6,025 पोस्ट ऑफिस खुल गए हैं. इन इलाकों में बैंकों की 1,804 ब्रांच और 1,321 ATM खुल गए हैं.

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