- गैस सिलेंडर की किल्लत ने हजारों प्रवासी मजदूरों को मजबूरन गांव लौटने पर विवश किया है.
- गैस सिलेंडर कालाबाजारी के कारण एक सिलेंडर के दाम 3 से 4 हजार रुपये तक पहुंच गए हैं.
- मजदूरों का कहना है कि रोजाना मिलने वाली मजदूरी के मुकाबले गैस की कीमतें बहुत अधिक हैं.
राजधानी दिल्ली और एनसीआर के औद्योगिक इलाकों में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी पसरी है. सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई ने हजारों प्रवासी मजदूरों के चूल्हों को ठंडा कर दिया है. प्रशासन भले ही यह भरोसा दिला रहा हो कि देश में एलपीजी (LPG) गैस की कोई किल्लत नहीं है. लेकिन हकीकत यह है कि आम कामगार की पहुंच से रसोई गैस को दूर कर दिया है. आलम यह है कि जो हाथ कल तक दिल्ली की प्रगति में ईंटें जोड़ रहे थे, आज वही हाथ मजबूरी में अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस अपनी गांवों की ओर लौटने को मजबूर हैं.
NDTV की टीम ने जब आनंद विहार रेलवे स्टेशन के खचाखच भरे प्लेटफॉर्म्स पर पहुंचकर इस पलायन की पड़ताल की, तो रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई सामने आई. यह महज त्योहारों की भीड़ नहीं, बल्कि 'हारकर' वापस लौटते लोगों का हुजूम है. मजदूरों का कहना है कि जिस शहर ने उन्हें रोजी-रोटी दी, अब उसी शहर में सिर छिपाना और पेट पालना उनके वश से बाहर हो गया है. गैस सिलेंडर नहीं मिलने से काफी परेशान है. पलायन की ये तस्वीरें उन दावों पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं जो ईधन की सुचारू आपूर्ति की बात करते हैं. दिल्ली की चमक-धमक के पीछे छिपे इस मानवीय संकट ने एक बार फिर महानगरों में प्रवासियों की असुरक्षा और उनकी बेबसी को उजागर कर दिया है.
'अगर गैस सिलेंडर भी 400 रुपये किलो मिलेगा...'
आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर घर वापस जाने की भीड़ और परेशान चेहरों के बीच बिहार के मोतिहारी के रहने वाले अमोद कुमार मिले. अमोद कहते हैं कि वे महज 10 दिन पहले बड़ी उम्मीदों के साथ दिल्ली आए थे. बिजली का काम करने वाले अमोद ने बताया कि दिन भर काम करने के बाद 400 रुपये की दिहाड़ी मिलती है. अब आप ही बताइए, अगर गैस सिलेंडर भी 400 रुपये किलो मिलेगा, तो हम खाएंगे क्या? दो-तीन दिन भूखा रहा, दोस्तों ने किसी तरह खिलाया. अब भूखे-प्यासे ही गांव लौट रहा हूं.
एक सिलेंडर के 3500 से 4000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं
गैस की किल्लत का फायदा उठाकर गैस की कालाबाजारी भी खूब हो रही है. न्यू कोंडली में रहने वाले वेब डेवलपर मोहम्मद सैफ आलम बताते हैं कि जिनके पास कनेक्शन नहीं है, उनसे एक सिलेंडर के 3500 से 4000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं. वहीं, गोद में छोटे बच्चे को लिए गोंडा के शिवम तिवारी का कहना है कि बड़ा सिलेंडर 5000-6000 रुपये में बिक रहा है. उनके छोटे बच्चे हैं और 3-4 दिन से गैस न होने की वजह से वे परेशान थे, इसलिए अब वापस गांव जा रहे हैं.
दिल्ली के ओखला में रहने वाली एक सिंगल मदर की व्यथा भी कम नहीं है. कॉस्मेटिक का काम करने वाली इस महिला ने बताया कि एक महीने से उनके घर में गैस नहीं है. मजबूरी में हीटर पर गुजारा किया, लेकिन कब तक? उन्होंने कहा कि जब तक दाम कम नहीं होते, गांव में रहना ही सुकून भरा होगा.
'गैस 400 रुपये किलो मिल रही है...'
असम के रहने वाले रकीबुल अली के सामने दोहरी चुनौती है. गुड़गांव के बादशाहपुर में रहने वाले रकीबुल कहते हैं कि एक तो गैस 400 रुपये किलो मिल रही है, जिससे चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है, और दूसरा ऊपर से असम में चुनाव हैं. वे कहते हैं कि अगर वोट डालने नहीं गए तो कहीं नाम न कट जाए. गैस की मार और वोट की जिम्मेदारी, दोनों हमें घर ले जा रही हैं.
'5-6 दिन से गैस नहीं..'
आनंद विहार स्टेशन पर मिले दर्जनों लोगों की आपबीती एक ही सच्चाई की ओर इशारा कर रही है - गैस की किल्लत. बल्लभगढ़ में फैक्ट्री मजदूर राजेंद्र दास ने कहा कि सिलेंडर की 400-600 रुपये किलो मिल रही है. वहीं मीनू पांडे जो नोएडा में हॉस्पिटल स्टाफ हैं उनका कहना है कि 5-6 दिन से गैस नहीं, होटल के खाने पर निर्भर थीं. विकास और राहुल जो दिल्ली में मजदूरी करते हैं उनका कहना है कि सिलेंडर न होने से चूल्हे पर खाना बना रहे, इंडक्शन पर चावल भी ठीक से नहीं पक रहा.
एक तरफ सरकार का कहना है कि सारी स्थिति सामान्य है और देश में कहीं भी गैस की किल्लत नहीं लेकिन दूसरी तरफ दिल्ली छोड़कर जाते इन मजदूरों के पास कहने को अपनी-अपनी दुख भरी दास्तानें हैं.
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