- ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की सभी ब्लॉक और राज्य स्तर समितियों को भंग कर पार्टी पुनर्गठन शुरू किया है
- तृणमूल कांग्रेस ने संसद में बागी सांसदों के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष से उनके सदस्यता रद्द करने की मांग की है
- ममता बनर्जी सड़कों पर उतरकर पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही हैं और जनता का समर्थन मांग रही हैं
पश्चिम बंगाल में अब इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि ममता बनर्जी और खासकर तृणमूल कांग्रेस का क्या होगा? टीएमसी विधायक दल और संसदीय दल में टूट हो चुकी है. चुनाव में हार के महीने भर बाद ममता बनर्जी दिल्ली आती हैं, इंडिया गठबंधन के नेताओं से मिलती हैं, सभी उन्हें ढाढ़स देते हैं, हिम्मत बढ़ाते हैं, वो सोनिया गांधी से मिलती हैं और गले लग जाती हैं. दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी की भी राहुल गांधी से मुलाकात होती है.
ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी को बचाने की कवायद शुरू कर दी है. उन्होंने ब्लॉक से लेकर राज्य स्तर तक की सभी समितियों को भंग कर दिया है. उसके बाद ममता बनर्जी ने सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लिया वो था, अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटाना, क्योंकि हार की वजहों में से एक सबसे बड़ी वजह अभिषेक के काम करने के तरीकों को भी बताया गया था और तृणमूल के बहुत सारे नेता उनसे नाराज बताए जाते थे. अब राष्ट्रीय महासचिव के साथ दो संयुक्त सचिव बनाए गए हैं. डोला सेन और डेरेक संयुक्त सचिव होंगे.
यही नहीं तृणमूल कांग्रेस के युवा विंग के अध्यक्ष के रूप में सायोनी घोष की जगह अर्णब बनर्जी और तृणमूल महिला कांग्रेस के अध्यक्ष पर माला रॉय की जगह अलिफा अहमद को नियुक्त किया गया है. उसी तरह वरिष्ठ सुदीप बंदोपाध्याय के पद उत्तर कोलकाता जिला प्रमुख पर कुणाल घोष को लाया गया है. ममता बनर्जी ने यह भी तय किया है कि पार्टी के कामों के लिए आगे से किसी सर्वे एजेंसी की सेवा नहीं ली जाएगी.
दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस ने संसद में अपनी पार्टी में टूट के बाद बागी ग्रुप के खिलाफ कार्रवाई करने लिए लोकसभा अध्यक्ष का दरवाजा खटखटाया है. अभिषेक बनर्जी दिल्ली आए और लोकसभा अध्यक्ष से मिले. अभिषेक ने उनसे कहा कि टीएमसी के 20 सासंदों ने अलग ग्रुप का क्लेम किया और एनसीपीआई नाम की पार्टी में शामिल हो गए. लेकिन संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधान के हिसाब से अगर कोई सांसद स्वैच्छिक आधार पर पार्टी छोड़ रहा है तो उसकी सदस्यता चली जाएगी, तो इस आधार पर उनकी सदस्यता जानी चाहिए.
अभिषेक बनर्जी ने कहा, "बागी गुट का दावा है कि दो तिहाई सांसदों ने मर्जर किया, लेकिन उसमें लिखा है कि दो तिहाई मर्जर तभी माना जाएगा, जब पार्टी करे, न कि लेजेस्लेटिव पार्टी यानी पूरी पार्टी संगठन मर्ज करे, तब माना जाएगा. केवल एमपी जाता है तो सदस्यता चली जाती है. मैंने 20 अलग अलग याचिका दायर की है. सबके लिए अलग-अलग अयोग्यता याचिका हैं.”
कहने का मतलब ये है कि तृणमूल कांग्रेस शुरुआती झटके से उबरकर अब अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उन्हें पता है कि बंगाल की 41 फीसदी जनता ने उन्हें अपना वोट दिया है और यही उनकी ताकत है.
ममता बनर्जी एक बार फिर सड़कों पर उतर रही हैं और अब भीड़ भी आने लगी है. पिछले दिनों जिस ढंग से उनके घर पर छापे पड़े और यह कहा गया कि कुछ नहीं मिला फिर ममता बनर्जी के दो दशक पुराने सुरक्षाकर्मी को हटाया गया. पश्चिम बंगाल सरकार के इन सब फैसलों ने ममता बनर्जी के पक्ष में काम करना शुरू किया है और वो सड़कों पर उतरकर वापसी करना चाहती है, जिसके लिए वो हमेशा से जानी जाती रहीं हैं. मगर पश्चिम बंगाल का इतिहास रहा है कि जब भी परिवर्तन हुआ है वो अगले कुछ चुनावों तक बरकरार रहा है.
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