महारानी कामसुंदरी के निधन पर याद आए माधव सिंह... वो योद्धा जिसने डूबते दरभंगा राज को दी थी नई जिंदगी

Darbhanga Raj Story : इतिहासकार डॉ. शंकर देव झा के अनुसार, माधव सिंह ने न केवल आर्थिक बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी अंग्रेजों को मात दी. जब अंग्रेजों ने दरभंगा को अपना मुख्यालय बनाया, तो माधव सिंह ने कड़ा प्रतिरोध करते हुए स्पष्ट कर दिया कि "एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं."

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  • महाराजा माधव सिंह ने 18वीं शताब्दी में कूटनीति और सविनय अवज्ञा से दरभंगा राज की संप्रभुता बचाई थी.
  • 1793 में अंग्रेजों के स्थायी बंदोबस्त प्रस्ताव को ठुकराते हुए माधव सिंह ने असहयोग नीति अपनाई थी.
  • माधव सिंह की रणनीति से ब्रिटिश सरकार को तिरहुत का मुख्यालय दरभंगा से मुजफ्फरपुर स्थानांतरित करना पड़ा था.
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महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही दरभंगा राज के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया है, लेकिन इस राजवंश के इतिहास में महाराजा माधव सिंह का नाम एक ऐसे योद्धा के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी कूटनीति और संघर्ष से डूबती नैया को पार लगाया था. 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपनी जड़ें जमा रही थी, तब माधव सिंह ने गांधीजी के आंदोलनों से करीब 125 साल पहले ही 'सविनय अवज्ञा' और 'असहयोग' जैसे अस्त्रों का सफल प्रयोग कर अपने राज्य के अस्तित्व की रक्षा की थी.

बीते सोमवार को दरभंगा राज की आखिरी महारानी कामसुंदरी देवी का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनके निधन के बाद दाह-संस्कार के दौरान भी विवाद जैसी स्थिति देखी गई. हालांकि बिहार सरकार के मंत्री और स्थानीय प्रशासन की पहल पर महारानी का दाह-संस्कार संपन्न हो गया.

तिरहुत से दरभंगा राज तक

संघर्ष की पृष्ठभूमि और कंपनी की दखलंदाजी मिथिला, जिसे ऐतिहासिक रूप से तिरहुत कहा जाता रहा है, मुगल काल तक एक संप्रभु राज्य के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए था. 1703 ईस्वी में राघव सिंह के समय से ही इस वंश के राजाओं ने अपने नाम के साथ 'सिंह' लगाना शुरू किया था. हालांकि, 1765 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी मिली, तो तिरहुत की संप्रभुता पर संकट के बादल मंडराने लगे. कंपनी ने तत्कालीन राजा प्रताप सिंह से राजस्व न मिलने का बहाना बनाकर उनका राज्य छीन लिया और उन्हें पेंशन पर रख दिया। 1775 में जब माधव सिंह ने सत्ता संभाली, तो उन्होंने तलवार के बजाय कूटनीति का सहारा लिया. उन्होंने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से तिरहुत और धरमपुर के मालिकाना हक का फरमान हासिल कर कंपनी के दावों को चुनौती दी.

सविनय अवज्ञा और शह-मात का खेल कंपनी और माधव सिंह के बीच संघर्ष तब और गहरा गया जब 1793 में तिरहुत के कलेक्टर ने स्थाई बंदोबस्त का प्रस्ताव रखा. माधव सिंह ने इसे ठुकरा दिया क्योंकि इसमें उन्हें संपूर्ण तिरहुत का मालिकाना हक नहीं मिल रहा था. इसके बाद कंपनी ने तिरहुत की जिम्मेदारी फ़याज़ुद्दीन और बरकत खान जैसे बाहरी लोगों को सौंप दी. यहीं से माधव सिंह ने अपनी 'असहयोग नीति' शुरू की. उन्होंने ऐसी योजना बनाई कि नए जमींदार राजस्व वसूली में पूरी तरह विफल रहे. कंपनी की सत्ता को चुनौती दिए बिना, उन्होंने व्यवस्था को इस कदर ठप कर दिया कि अंततः 1800 ईस्वी में ब्रिटिश हुकूमत को घुटने टेकने पड़े और माधव सिंह की शर्तों पर ही उन्हें जमींदारी वापस लौटानी पड़ी.

इतिहासकार डॉ. शंकर देव झा के अनुसार, माधव सिंह ने न केवल आर्थिक बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी अंग्रेजों को मात दी. जब अंग्रेजों ने दरभंगा को अपना मुख्यालय बनाया, तो माधव सिंह ने कड़ा प्रतिरोध करते हुए स्पष्ट कर दिया कि "एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं." उनके इसी जुझारूपन के कारण ब्रिटिश प्रशासन को तिरहुत जिले का मुख्यालय दरभंगा से हटाकर मुजफ्फरपुर ले जाना पड़ा. उन्होंने अपनी न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता भी बनाए रखी, जिसका प्रमाण 1794 में उनके मुख्य न्यायाधीश सचल मिश्र द्वारा संस्कृत में दिया गया वह ऐतिहासिक निर्णय पत्र है, जिसे प्राचीन भारतीय न्याय प्रणाली का अंतिम दस्तावेज माना जाता है. महाराजा माधव सिंह का यह धैर्य और चातुर्य ही था जिसने तिरहुत को पूरी तरह विलीन होने से बचाया और इसे 'दरभंगा राज' के रूप में इतिहास में अमर कर दिया.

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