West Bengal Elections: पश्चिम बंगाल के हुगली (Hooghly) जिले की सिंगूर विधानसभा सीट (Singur Assembly Election 2026) एक बार फिर राजनीतिक हलचल के केंद्र में है. 2006 के ऐतिहासिक भूमि आंदोलन से राष्ट्रीय पहचान बनाने वाली यह सीट 2026 के चुनाव में भी विकास, किसान और उद्योग जैसे मुद्दों पर घिरी हुई है. एक ओर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार और राज्य के मंत्री बेचाराम मन्ना (Becharam Manna) मैदान में हैं, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने डॉ. अरूप कुमार दास (Dr. Arup Kumar Das) को उम्मीदवार बनाया है.
मंत्री बेचाराम मन्ना का दावा- 'सिंगूर के हर सुख-दुख में साथ'
तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार बेचाराम मन्ना ने खुद को सिंगूर की जनता के बीच हमेशा मौजूद रहने वाला नेता बताया. उनका कहना है कि वह हर दिन लोगों के बीच रहते हैं और हर परिस्थिति, चाहे वह संकट हो या खुशी, में जनता के साथ खड़े रहते हैं. मन्ना ने सिंगूर में हुए विकास कार्यों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस क्षेत्र को 'आदर्श भूमि' के रूप में विकसित किया है. उनके मुताबिक, सरकार ने जो भी वादे किए थे, उन्हें जमीन पर उतारने की कोशिश की गई है.
मोदी पर हमला, 'जुमले और हकीकत में फर्क'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सिंगूर में विकास न होने के आरोपों पर पलटवार करते हुए मन्ना ने कहा कि यह केवल जुमलेबाजी है.उन्होंने तर्क दिया कि जिस जमीन पर उद्योग लगाने की बात की जा रही है, वह निजी जमीन है और उस पर बिना किसानों की सहमति के कोई परियोजना संभव नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून के तहत 75 प्रतिशत जमीन मालिकों की सहमति जरूरी है, और यही कारण है कि सिंगूर में उद्योग स्थापित करना आसान नहीं है. मन्ना के अनुसार, भाजपा के नेता लोगों को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब सिंगूर की जनता इन दावों की सच्चाई समझ चुकी है.
केंद्र पर आरोप, राज्य योजनाओं का बचाव
बेचाराम मन्ना ने केंद्र सरकार पर पश्चिम बंगाल के विकास के लिए फंड रोकने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि इसके बावजूद राज्य सरकार अपनी योजनाओं के जरिए लोगों तक मदद पहुंचा रही है. उन्होंने किसान बंधु जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए बताया कि किसानों को आर्थिक सहायता दी जा रही है, बीमा का प्रीमियम सरकार खुद देती है और प्राकृतिक आपदा के समय मुआवजा भी प्रदान किया जाता है. उनके मुताबिक, धान, आलू और सब्जियों की खेती को भी सरकार लगातार समर्थन दे रही है.
बीजेपी का पलटवार- 'सिंगूर को चाहिए नई दिशा'
दूसरी ओर, भाजपा उम्मीदवार डॉ. अरूप कुमार दास ने सिंगूर की वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र शिक्षा और संस्कृति के मामले में समृद्ध है, लेकिन विकास की संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ. दास ने किसानों की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि आलू किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा और सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है. उन्होंने दावा किया कि भाजपा की सरकार बनने पर किसानों को उनकी उपज का सही दाम दिलाया जाएगा और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जाएगा.
उद्योग और रोजगार पर फोकस
भाजपा उम्मीदवार ने कहा कि सिंगूर में औद्योगिकीकरण की जरूरत है, ताकि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सके. उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों के विकास को भी प्राथमिकता बताया. उनके मुताबिक, 'ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहां पढ़ाई के बाद युवाओं को यहीं काम मिले, ताकि उन्हें बाहर न जाना पड़े और परिवार एकजुट रह सके.'
सिंगूर: प्रतीकात्मक सीट, बदलता राजनीतिक समीकरण
सिंगूर केवल एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का प्रतीक रही है. 2006-08 के भूमि आंदोलन ने जहां वाम मोर्चा सरकार के पतन की नींव रखी, वहीं तृणमूल कांग्रेस के उभार का रास्ता भी तैयार किया. 2011 से लगातार यह सीट तृणमूल के पास रही है, लेकिन 2021 में भाजपा के उभार के बाद मुकाबला और कड़ा हो गया. अब 2026 में यह चुनाव 'भूमि बनाम उद्योग', 'विकास बनाम रोजगार' और 'स्थानीय बनाम राष्ट्रीय मुद्दों' के बीच सीधी लड़ाई बनता दिख रहा है.
पिछले चुनावी रुझानों पर नजर डालें तो सिंगूर में तृणमूल कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है, लेकिन भाजपा ने हाल के वर्षों में अपनी पकड़ बढ़ाई है. वोटरों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है और मतदान प्रतिशत हमेशा ऊंचा रहा है, जो इस सीट की राजनीतिक जागरूकता को दर्शाता है.
सिंगूर में इस बार का चुनाव कई मायनों में अहम है. एक ओर तृणमूल कांग्रेस अपनी 'भूमि आंदोलन' की विरासत और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे मैदान में है, तो दूसरी ओर भाजपा 'उद्योग और रोजगार' के मुद्दे को लेकर आक्रामक है. अब देखना होगा कि सिंगूर की जनता विकास के मौजूदा मॉडल को बरकरार रखती है या बदलाव के नाम पर नई दिशा चुनती है. चुनावी नतीजे तय करेंगे कि सिंगूर की राजनीति किस ओर करवट लेती है.














