- सिद्धारमैया ने 2013 में पहली बार सीएम पद संभाला था. उन्होंने 2028 तक इस पद पर बने रहने का इरादा जताया है.
- 2005 में जेडीएस से निष्कासित होने के बाद सिद्धारमैया कांग्रेस में शामिल हुए और मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे.
- वे कुरूबा समुदाय से आते हैं और सामाजिक तथा राजनीतिक रूप से पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में उभरे हैं
कर्नाटक में सत्ता संघर्ष को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार इन दिनों सुर्खियों में है. हालांकि दोनों के बीच ब्रेकफास्ट टेबल पर चर्चा के बाद तनातनी में थोड़ी नरमी दिख रही है. 2022 में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने के समय 'ढाई-ढाई साल के सीएम' के कथित समझौते को इस विवाद का कारण बताया जा रहा है. लेकिन कभी भी पार्टी या किसी बड़े नेता ने इस समझौते की कोई पुष्टि नहीं की. सीएम सिद्धारमैया भी पुराने अनुभवी नेता हैं. उन्होंने खुलकर 2028 तक सीएम पद पर बने रहने की बात कही है.
ये पहला मौका नहीं है जब 79 साल के सिद्धारमैया राजनीतिक चुनौती का सामना कर रहे हैं. इससे पहले भी कई मौकों पर वो इससे बखूबी बाहर निकले हैं. 2024 में ही लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने बगावती तेवर अपनाकर कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ा दी थी. हासन में उस वक्त होने वाली रैली का नाम "सिद्धारमैया स्वाभिमान जनांदोलन समावेश" से बदलवाकर "जन कल्याण समावेश" करवाने में पार्टी को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी.
ऐसी ही अहिंदा रैली सिद्धारमैया ने 2005 में की थी, जब उपमुख्यमंत्री के तौर पर तब देवेगौड़ा ने उन्हें JDS से निकाल दिया था. सिद्धरमैया जब से राजनीति में आए हैं, किसी ना किसी महत्वपूर्ण पद पर रहे हैं. पार्टी बदलने का भी उनका बड़ा तजुर्बा है. वो पहले जनता दल, फिर जनता दल सेकुलर और बाद में कांग्रेस पार्टी आए.
2006 को सोनिया गांधी की मौजूदगी में बेंगलुरू में कांग्रेस में शामिल हुए सिद्धारमैया
3 सितंबर 2006 को सोनिया गांधी की मौजूदगी में बेंगलुरू में सिद्धारमैया कांग्रेस में शामिल हुए. लेकिन पुराने कांग्रेसी नेताओं को ये रास नहीं आया. बीजेपी-जेडीएस की साझा सरकार कुमारस्वामी के नेतृत्व में बन चुकी थी और इसी साल यानी 2006 के आखिर में एक नई चुनौती सिद्धारमैया के सामने खड़ी थी. वकील के तौर पर अपने पैतृक जिले मैसूर से अपना करियर शुरू करने वाले ओबीसी समाज के इस कुरबा नेता का वर्चस्व दांव पर था. जेडीएस से निकाले जाने के बाद उन्होंने MLA पद से इस्तीफा दे दिया. ऐसे में चामुंडेश्वरी सीट पर उपचुनाव सिद्धारमैया ने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा. देवेगौड़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने सिद्धारमैया को हराने की कोशिश में पूरी शक्ति लगा दी. ओल्ड मैसूर रीजन की ये सीट जेडीएस की मजबूत सीट मानी जाती रही है, लेकिन कांटे की टक्कर में सिद्धारमैया 257 वोट से जीत गए.
2013 में पहली बार मुख्यमंत्री बने सिद्धारमैया
इसके बाद सिद्धारमैया ने सफलता की सीढ़ी तेज़ रफ्तार से चढ़ी. 2008 में विपक्ष के नेता और 2013 में मुख्यमंत्री. सिद्धारमैया को किसी ना किसी तौर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी झेलनी पड़ी, लेकिन पार्टी हाइकमान का समर्थन उनके साथ था. 2013 में कांग्रेस सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा, इसको लेकर वोटिंग हुई. तब सिद्धारमैया के सामने थे मल्लिकार्जुन खरगे, लेकिन नतीजे पुराने कांग्रेसी नेता खरगे के खिलाफ आए और सिद्धारमैया बाजी मार गए. उन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूरा किया और ऐसा करने वाले वो कर्नाटक के दूसरे नेता थे, उनसे पहले देवराज अर्स थे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया था.
12 अगस्त 1948 को मैसूर में सिद्धारमैया का जन्म
मैसूर जिले के सिद्दरामनहुंडी गांव के एक किसान परिवार में 12 अगस्त 1948 को जन्मे सिद्धारमैया की 10 साल की उम्र तक कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी. मैसूर विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने यहीं से लॉ की डिग्री हासिल की. उनके परिवार में उनकी पत्नी पार्वती, दो पुत्र राकेश और यतीन्द्र हैं. फिल्मों में कुछ रोल कर चुके राकेश अपने पिता की मदद भी करते हैं. यतीन्द्र डॉक्टर हैं. सिद्धारमैया ईश्वर को नहीं मानते हैं. मुख्यमंत्री बनने पर जब शपथ लेने का मौका आया तो उन्होंने 'ईश्वर' की जगह 'सच्चाई' के नाम पर शपथ ग्रहण की थी.
2005 में एचडी देवेगौड़ा के सिद्धारमैया को जेडीएस से किया था निष्कासित
लेकिन कहा जाता है कि नियति जिसे जहां ले जाती है, वह वहां पहुंच जाता है. कर्नाटक के तीसरे सबसे बड़े जातीय समुदाय कुरूबा से आने वाले सिद्धारमैया पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में उभरने लगे थे, लेकिन एचडी देवगौड़ा अपने पुत्र एचडी कुमारस्वामी में पार्टी नेतृत्व का भविष्य देख रहे थे. वर्ष 2004 में बनी कांग्रेस और जनता दल (एस) की गठबंधन सरकार में सिद्धारमैया को डिप्टी सीएम बनाया गया. इसके अगले ही साल 2005 में पूर्व पीएम एचडी देवेगौड़ा के जनता दल (एस) से उनको निष्कासित कर दिया गया. इन हालात में उन्होंने उसी पार्टी का दामन थामा, जिससे वे लंबे अरसे से दो-दो हाथ करते रहे थे. वर्ष 2006 में वे अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए.
जनता दल (एस) से निष्कासित किए जाने के बाद सिद्दारमैया राजनीति से संन्यास लेकर फिर से वकालत करना चाहते थे. खुद को धन जुटाने में अक्षम मानते हुए उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाने से इनकार कर दिया था. इस दौरान कांग्रेस के अलावा बीजेपी ने भी उन्हें अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी. बीजेपी की विचारधारा से असहमति के कारण उन्होंने अपनी कांग्रेस की ओर कदम बढ़ाए.
1983 में पहली बार जीतकर विधानसभा पहुंचे थे सिद्धारमैया
सिद्धारमैया डॉ राममनोहर लोहिया के समाजवाद से काफी प्रभावित रहे हैं. सन 1983 में सिद्दारमैया लोकदल से मैसूर की चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट पर जीते थे. बाद में वे सत्तारूढ़ जनता पार्टी में शामिल हो गए थे. बाद में उन्हें सेरीकल्चर मंत्री बनाया गया. दो साल बाद मध्यावधि चुनाव में वे फिर जीते और रामकृष्ण हेगड़े की सरकार में पशुपालन और पशु चिकित्सा मंत्री बनाए गए. सिद्दारमैया को सन 1989 और 1999 के विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा. साल 2008 में वे कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति की प्रचार समिति के अध्यक्ष बनाए गए. चामुंडेश्वरी क्षेत्र से साल 2013 में उन्होंने फिर चुनाव जीता और कांग्रेस विधायक दल के नेता निर्वाचित होकर मुख्यमंत्री बने.













