आज हर पार्टी को क्यों याद आ रहे हैं कांशीराम, कैसे बढ़ती जा रही है उनकी 'माया'

आज बसपा के संस्थापक कांशीराम की 92वीं जयंती मनाई जा रही है. इससे पहले से ही उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक विरासत पर दावा ठोकने की होड़ में राजनीतिक दलों में लगी हुई है. आइए जानते हैं कि देश प्रदेश की राजनीति में कितना बड़ा था कांशीराम का काम और वो आज भी क्यों बने हुए हैं महत्वपूर्ण.

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  • राहुल गांधी ने कहा कि पंडित जवाहर लाल नेहरू जिंदा होते तो कांशीराम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते
  • कांशीराम ने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों के लिए BSP की स्थापना कर UP में राजनीति का आधार मजबूत किया
  • उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक की संख्या करीब इक्कीस फीसदी है और यह ओबीसी के बाद दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक है
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नई दिल्ली:

कांग्रेस नेता राहुल गांधी शुक्रवार को लखनऊ में थे. वहां उन्‍होंने कहा कि अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू जिंदा होते तो कांशीराम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते. उनके इस बयान ने जमकर सुर्खियां बटोरीं. कांग्रेस नेता ने यह बयान कांशीराम की जयंती से दो दिन पहले दिया था. आज उनकी 92वीं जयंती मनाई जा रही है. इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत तमाम लोगों ने उन्हें याद किया है. यह उनके कद को बताने के लिए काफी है.

कांशीराम और उनकी राजनीति

दलित समाज से आने वाले कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी. बसपा ने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चार बार अपनी सरकार बनाई. आज बसपा अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. लेकिन कांशीराम आज भी देश की राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं. उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. उससे पहले सभी राजनीतिक दलों को कांशीराम याद आ रहे हैं. सभी पार्टियों की कोशिश उनके राजनीतिक विरासत को भुना लेने की है. 

उत्तर प्रदेश में दलितों को अपने पाले में करने की कोशिश सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं. इस काम में सबसे आगे कांग्रेस है. उत्तर भारत की राजनीति में सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियों के उदय से पहले दलित वोट कांग्रेस के आधार का सबसे बड़ा हिस्सा था. इस हिस्से के हाथ से निकल जाने की वजह से कांग्रेस की हालत इन राज्यों में सबसे खराब है. वह बैसाखी के सहारे चल रही है. वह दलितों को फिर अपने पाल में करने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही है. इसलिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति जनगणना, आरक्षण, संविधान बचाने और सामाजिक न्याय की बातें पिछले कुछ सालों से लगातार कर रहे हैं. 

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सपा का पीडीए और बसपा का बहुजन

कांशीराम ने 1978 में बामसेफ (BAMCEF - Backward and Minority Communities Employees Federation) की स्थापना की थी. इसमें दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों के पढ़े-लिखे लोगों का संगठन था. उन्होंने इसका पूरे देश में विस्तार किया. इसके बाद 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया. यह एक राजनीतिक संगठन था. कांशी राम के 'बहुजन' में दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक शामिल थे, जिनकी देश में कुल आबादी करीब 85 फीसदी मानी जाती है. 

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उत्तर प्रदेश में 2017 के बाद से लगातार मिल रही है हार से परेशान सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2022 के बाद से पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का नारा बुलंद किया. यह बहुजन का ही एक नया रूप था. उन्हें इसका फायदा 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला. उस चुनाव में सपा कांग्रेस के गठबंधन ने यूपी की 80 में से 43 सीटें अपनी झोली में डाल ली थीं. यही हाल केंद्र और उत्तर प्रदेश में सरकार चला रही बीजेपी का है. मंदिर और राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाली यह पार्टी देखते ही देखते जाति की राजनीति में उतर गई. वह भी दलितों को अपने पाले में करने के लिए कांशीराम का भी सहारा लेती है. बिहार बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉक्टर संजय पासवान 2013 में पार्टी के एससी मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए थे. उन्होंने कांशीराम की फोटो मोर्चे के सभी कार्यालयों में लगाने के आदेश दे दिए थे.   

उत्तर प्रदेश: कांशीराम की राजनीतिक प्रयोगशाला

कांशीराम पंजाब के रहने वाले थे, लेकिन उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीति की प्रयोगशाला बनाई. उन्होंने पैदल और साइकिल से घूम-घूम कर उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में बसपा को गांव-गांव तक पहुंचाया था. उनके इस कठिन परिश्रम का ही परिणाम था कि अपनी स्थापना के आठ साल बाद ही बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी पहली सरकार बना ली थी. इस मुकाम को हासिल करने के लिए बीजेपी जैसी कैडर आधारित पार्टी को 11 साल लगे थे. यह कांशीराम की सोच और राजनीतिक कौशल ही था कि जिस प्रदेश में दलितों को कैबिनेट में समाज कल्याण से बड़ा कोई विभाग नहीं दिया जाता था, उसी उत्तर प्रदेश में चार बार दलित मुख्यमंत्री बना. आज बसपा भले ही अपने बुरे दौर से गुजर रही है. लेकिन कांशीराम के सिखाए कम से कम 50 बड़े नेता आज उत्तर प्रदेश की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं. इनमें यूपी के उपमुख्यमंभी बृजेश पाठक, कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर, दारा सिंह चौहान,  सपा सांसद रामअचल वर्मा-लालजी वर्मा, सपा नेता नसीमउद्दीन सिद्दीकी के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं. 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित

उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी करीब 21 फीसदी है. यह ओबीसी के बाद सबसे बड़ा वोट बैंक है. यूपी में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं. इनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं.साल 2022 के चुनाव में बीजेपी ने इनमें से 58 सीटें जीतीं थीं. वहीं सपा के खाते में 16 सीटें आई थीं. कांग्रेस कोई भी सीट नहीं जीत पाई थी. इस तरह राज्य में लोकसभा की 80 में से 17 सीटें आरक्षित हैं. साल 2024 के चुनाव में बीजेपी ने आठ, सपा ने सात और कांग्रेस ने एक सीट पर जीत दर्ज की थी. 

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साल 2024 के लोकसभा चुनाव में गैर सरकारी संगठन लोकनीति-सीएसडीएस से जाति के आधार पर वोटिंग पैटर्न का अध्ययन किया था. इस अध्ययन में दलित वोटों को जाटव और गैर जाटव वोट बैंक में बांटा गया था. अध्ययन के मुताबिक 24 फीसदी जाटवों ने बीजेपी, 25 फीसदी ने विपक्षी इंडिया गठबंधन, 44 फीसदी ने बसपा और सात फीसदी ने अन्य को वोट किया था. वहीं गैर जाटव वोट बैंक में 29 फीसदी ने बीजेपी, 56 फीसदी ने इंडिया गठबंधन, 15  फीसदी ने बसपा और एक फीसदी ने अन्य को वोट किया था. 

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कांशीराम ने एक नारा दिया था, 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'. अब उत्तर प्रदेश में दलितों की संख्या को देखते हुए सभी राजनीतिक दल उन्हें अपने पाले में करने में लगे हुए हैं. बसपा की खराब हालत को देखकर दलित भी संशय में हैं. ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए कांशीराम एक उम्मीद की किरण के रूप में नजर आते हैं. राजनीतिक दलों को लगता है कि उनकी जयंती मनाकर वो दलितों को अपने पाले में कर लेंगे. वो कितना सफल हो पाते हैं इसके लिए हमें चुनाव तक इंतजार करना होगा.

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