स्वार्थ नहीं, स्वाभिमान... राज ठाकरे ने बालासाहेब का जिक्र कर संजय राउत को दिया जवाब

कल्याण-डोंबिवली महापालिका में मेयर का पद अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हो गया है. गौर करने की बात ये है कि यहां न तो बीजेपी के पास और न उद्धव के पास कोई ST पार्षद है.

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कल्याण-डोंबिवली महापालिका (KDMC) में सियासी खेला करने के बाद राज ठाकरे ने शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे का उदाहरण देकर साफ किया है कि राजनीति में कभी-कभी एक कदम पीछे हटना या किसी से हाथ मिलाना मजबूरी नहीं, बल्कि रणनीति होती है. बाल ठाकरे की जयंती पर राज ठाकरे ने ऐसा पोस्ट किया, जिसे उद्धव गुट के रणनीतिकार संजय राउत के दावों का जबाव माना जा रहा है. 

संजय राउत ने क्या कहा था?

शिवसेना यूबीटी के सांसद संजय राउत ने कल्याण-डोंबिवली में एकनाथ शिंदे गुट और राज ठाकरे की MNS के बीच हुए गठबंधन को लेकर दावा किया था कि स्थानीय स्तर पर गठबंधन से राज ठाकरे को भी बुरा लगा था. उनका ये इशारा था कि राज ठाकरे इस गठबंधन के पक्ष में नहीं थे. लेकिन अब राज ठाकरे ने पोस्ट करके संजय राउत के दावे को एक तरह से गलत साबित कर दिया है. 

राज ठाकरे की पोस्ट में क्या है?

अब राज ठाकरे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "भले ही बालासाहेब को किसी समय राजनीति में लचीला रुख अपनाना पड़ा हो, लेकिन मराठी लोगों के लिए उनका प्यार जरा भी कम नहीं हुआ बल्कि और मजबूत हुआ. यही वो संस्कार हैं, जो हमारे साथ हैं. मैं आज फिर एक बात कहता हूं कि अगर पूरी तरह से बदली हुई राजनीति में थोड़ा लचीला रुख अपनाना पड़ा तो ये कभी भी मेरे व्यक्तिगत फायदे या मतलब के लिए नहीं होगा."

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राज ठाकरे की सहमति से गठबंधन?

अब सवाल ये उठता है कि राज ठाकरे ने पोस्ट करके जिस 'लचीलेपन' की बात कही, क्या उससे ये साफ नहीं हो जाता कि कल्याण-डोंबिवली में जो सियासी समीकरण बैठा, उसमें राज ठाकरे की पूरी सहमति थी? राज ने साफ किया है कि कल्याण-डोंबिवली में शिंदे गुट के साथ जाना उनका व्यक्तिगत फैसला नहीं बल्कि “मराठी मानुष के हित में लिया गया सोचा-समझा लचीला रुख' था. सूत्रों की मानें तो शिंदे गुट और MNS के बीच हुए इस गठबंधन को लेकर दोनों पक्षों के कई सीनियर नेताओं के बीच लगातार बैठकें हुई थीं. उसके बाद ही गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला हुआ था. 

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गठबंधन से बदला KDMC का समीकरण

इस गठबंधन के बाद कल्याण-डोंबिवली का समीकरण अब पूरी तरह बदल चुका है. 122 सीटों वाली इस महापालिका में शिंदे गुट (53), बीजेपी (50), उद्धव गुट (11) और MNS (5) के अपने-अपने आंकड़े हैं. यहां बीजेपी और शिंदे गुट ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन असली चाबी राज ठाकरे के पास आ गई.

बीजेपी-उद्धव का नहीं होगा मेयर

इस राजनीतिक उठापटक के बीच जो लॉटरी निकली, उसके मुताबिक यहां मेयर का पद अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित है. गौर करने की बात ये है कि यहां बीजेपी के पास कोई ST पार्षद नहीं है. ऐसे में मेयर अब शिंदे गुट का बनना लगभग तय माना जा रहा है. 

एसटी कैंडिडेट ना होने से इस महापालिका में मेयर की कुर्सी पर बीजेपी का गेम ओवर समझा जा रहा है. यही हाल उद्धव गुट का है. ऐसे में सवाल ये है कि बीजेपी क्या शिंदे-MNS के गठबंधन में अब मजबूरन भी जुड़ेगी, या फिर विपक्ष में बैठेगी? ये वक्त ही बताएगा. 

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