बंगाल में वोटिंग से ठीक पहले कैंडिडेट ने थामा TMC का झंडा, पलटी मारने से पार्टी में मचा बवाल

पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण में मत डाले जाएंगे. लेकिन वोटिंग से ठीक पहले दक्षिण 24 परगना जिले की मगराहट पश्चिम सीट के कांग्रेस उम्मीदवार ने पाला बदल लिया. सुशोभन मिस्त्री की रिपोर्ट.

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तृणमूल कांग्रेस का झंडा हाथ में लिए कांग्रेस उम्मीदवार (चश्मे में)
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  • पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मगराहट पश्चिम सीट पर कांग्रेस के अब्दुल मजीद हालदार ने पार्टी छोड़ दी.
  • पंचायत चुनाव में हार के बाद उनकी पार्टी में स्वीकार्यता कम हुई और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा था
  • तृणमूल कांग्रेस इस घटना को राजनीतिक सफलता मान रही है, जबकि कांग्रेस ने इसे ज्यादा महत्व देने से इनकार किया है.
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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दूसरे और आखिरी चरण के लिए चुनाव प्रचार का आज अंतिम दिन है. बुधवार, 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल की 142 सीटों पर मत डाले जाएंगे. लेकिन दूसरे दौर में वोटिंग से ठीक पहले एक सीट पर मुकाबला किसी और वजह से दिलचस्प हो गया है. दक्षिण 24 परगना जिले के मगराहट पश्चिम (नंबर 142) विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के उम्मीदवार अब्दुल मजीद हालदार आखिरी समय में पार्टी बदलकर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. 

इस घटना ने इलाके में काफी हलचल मचा दी है और राजनीतिक गलियारों में इसकी खूब चर्चा हो रही है. अब्दुल मजीद हालदार के कांग्रेस का साथ छोड़ तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार समीम अहमद का हाथ पकड़ लेने का चुनावी समीकरण पर बड़ा असर पड़ सकता है. हालदार लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े रहे हैं. वे सुंदरबन जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर मनोरंजन हालदार और वर्तमान जिला अध्यक्ष मुक्तार अहमद के करीबी माने जाते हैं. पार्टी संगठन में उनका काफी प्रभाव था. वो मगराहट पश्चिम ब्लॉक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

टिकट देने के बाद उठ रहे थे सवाल

हालांकि, पंचायत चुनावों के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठने लगे और पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता पर बहस छिड़ गई थी. हालदार ने उत्तर कुसुम क्षेत्र की पंचायत समिति सीट से स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था.  लेकिन वे तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गए. उस हार के बाद उन्हें मगराहट पश्चिम ब्लॉक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन पार्टी के कुछ नेता और कार्यकर्ता उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए. 

उनके प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा था, खासकर पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच. इसके बावजूद, कुछ शीर्ष पार्टी नेताओं के समर्थन से उन्हें इस साल के विधानसभा चुनावों के लिए नामांकित किया गया. लेकिन उन्हें टिकट देने की घोषणा के बाद से ही पार्टी के कई लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि इतने महत्वपूर्ण पद के लिए उन्हें क्यों नामांकित किया गया.

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तृणमूल कांग्रेस से संबंध

कई लोगों का मानना ​​है कि इसके पीछे उनके परिवार के राजनीतिक संबंध भी एक बड़ा कारण हैं. गौरतलब है कि उनके भाई उत्तरी कुसुम क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के सक्रिय नेता और पंचायत सदस्य हैं. नतीजतन, ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि उन पर पार्टी बदलने का दबाव था, जो राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आखिरकार सच साबित हो गया है.

इन सभी अटकलों के बीच, अब्दुल मजीद हल्दर ने चुनाव से ठीक पहले पार्टी छोड़ दी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. उनके कुछ अन्य करीबी समर्थक भी उनके साथ सत्ताधारी पार्टी में शामिल हो गए. तृणमूल नेतृत्व इस घटना को अपनी राजनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहा है. वहीं कांग्रेस नेतृत्व इस घटना को ज्यादा महत्व देने से कतरा रहा है. स्थानीय पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक व्यक्ति के जाने से संगठन पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा. 

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