कोर्ट ने यासीन मलिक की गांधीवादी सिद्धांत का पालन करने की दलील को खारिज किया

दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को कश्मीरी आतंकवादी नेता यासीन मलिक की इस दलील को खारिज कर दिया कि वह अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत का पालन कर रहा है.

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अदालत ने कहा कि यासीन मलिक ने सरकार के अच्छे इरादों के साथ विश्वासघात किया
नई दिल्ली:

दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को कश्मीरी आतंकवादी नेता यासीन मलिक की इस दलील को खारिज कर दिया कि वह अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत का पालन कर रहा है. अदालत ने कहा कि यासीन मलिक ने घाटी में बड़े पैमाने पर हिंसा के बावजूद, न तो हिंसा की निंदा की और न ही विरोध को बंद किया है. विशेष न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने मलिक की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उसने 1994 में बंदूक छोड़ दी थी और उसके बाद उसे एक राजनेता के तौर पर मान्यता मिली थी. अदालत ने कहा कि  "मेरी राय में, इस दोषी में कोई सुधार नहीं है."

अदालत ने कहा "यह सही हो सकता है कि अपराधी ने वर्ष 1994 में बंदूक छोड़ दी हो, लेकिन उसने वर्ष 1994 से पहले की गई हिंसा के लिए कभी कोई खेद व्यक्त नहीं किया था. यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब उसने दावा किया था वर्ष 1994 के बाद हिंसा का रास्ता छोड़ दिया, भारत सरकार ने इसे एक मौका दिया कि वो सही मुद्दों के साथ आगे बढ़ें इसे उचित प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध करवाया गया. लेकिन इसमें कोई सुधार नहीं देखने को मिला.अदालत ने कहा कि दोषी ने हिंसा से परहेज नहीं किया है.

अदालत ने कहा कि यासीन मलिक ने सरकार के अच्छे इरादों के साथ विश्वासघात करते हुए उसने राजनीतिक संघर्ष की आड़ में हिंसा को अंजाम देने के लिए एक अलग रास्ता अपनाया. दोषी ने दावा किया है कि उसने अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांत का पालन किया था और शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था. हालांकि, जिन सबूतों के आधार पर आरोप तय किए गए और दोषी ने जो अपना गुनाह कबूल किया, वह कुछ और ही बयां करता है.कोर्ट ने कहा कि पूरे आंदोलन को  एक हिंसक आंदोलन बनाने की योजना मलिक के द्वारा बनायी गयी. 

न्यायाधीश ने कहा कि हमें यहां ध्यान देना होगा कि अपराधी महात्मा गांधी का आह्वान नहीं कर सकता है और उनके अनुयायी होने का दावा नहीं कर सकता है, क्योंकि महात्मा गांधी के सिद्धांतों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी.
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