मेरठ में लगा जाटों का जमावड़ा , लेकिन क्यों नहीं पहुंचे जयंत चौधरी?

जयंत चौधरी के परिवार को अगर राजनीति में जाटों का पहला परिवार कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा . आजतक जाट समुदाय से आने वाला केवल एक व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा है और वो थे चौधरी चरण सिंह . चरण सिंह के बाद उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह ने उनकी विरासत संभाली और अब ये कमान उनके पोते जयंत चौधरी के हाथों में है .

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नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले मेरठ में आज जाटों का महासम्मेलन हुआ . मौक़ा था जाटों के सबसे प्रतापी और प्रसिद्ध राजा , महाराजा सूरजमल की पहली मूर्ति के अनावरण का . अंतरराष्ट्रीय जाट संसद के झंडे तले हुए इस आयोजन में पार्टियों की कोई बंदिश नहीं दिखी . इसलिए अलग अलग पार्टियों के नेता शामिल हुए . उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब ज़्यादा दूर नहीं है लिहाज़ा इसे जाटों का शक्ति प्रदर्शन भी कहा जा रहा था. महासम्मेलन में शिरकत करने वालों में आम आदमी पार्टी के नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान , राजस्थान के नागौर से राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के लोकसभा सांसद हनुमान बेनीवाल , पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता संजीव बालियान और चौधरी देवीलाल के प्रपौत्र दिग्विजय चौटाला शामिल रहे . 

मगर एक नेता जिसकी गैर मौजूदगी सबके लिए चौंकाने वाली रही , वो थे राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी की . आयोजन में शामिल होने का निमंत्रण दिए जाने के बावजूद जयंत नहीं पहुंचे . ज़ाहिर है पश्चिम उत्तर प्रदेश और जाटलैंड के सबसे प्रतिष्ठित और जाने माने जाट परिवार से आने वाले जयंत चौधरी की अनुपस्थिति को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं . आयोजकों की तरफ़ से तो उनके नहीं आने का कोई कारण नहीं बताया गया लेकिन जयंत के करीबी सूत्रों के मुताबिक़ किसी जाति विशेष के किसी कार्यक्रम में जाना उन्हें ठीक नहीं लगता और अगर जाट महासम्मेलन की जगह किसानों के नाम पर सम्मेलन होता तो जयंत ज़रूर जाते . 

तर्क़ चाहे कुछ भी दिया जाए लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश की राजनीति को नज़दीक से देखने वाले बताते हैं कि आयोजन में जयंत की गैर मौजूदगी के पीछे कोरी राजनीति है और इसका सीधा नाता इस सवाल से है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाटों का असल नेता कौन हो ? यानि अगर स्थानीय भाषा में कहा जाए तो असल चौधरी कौन होगा? 

जयंत चौधरी के परिवार को अगर राजनीति में जाटों का पहला परिवार कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा . आजतक जाट समुदाय से आने वाला केवल एक व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा है और वो थे चौधरी चरण सिंह . चरण सिंह के बाद उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह ने उनकी विरासत संभाली और अब ये कमान उनके पोते जयंत चौधरी के हाथों में है . पश्चिम उत्तर प्रदेश के बागपत से आने वाले चरण सिंह को किसान नेता के तौर पर भी जाना जाता है . लेकिन पिछले कुछ सालों में , खासकर 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद इस परिवार के राजनीतिक रसूख में कमी आई है . ख़ुद अजीत सिंह और जयंत चौधरी को तबसे 2-2 बार लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा . जयंत चौधरी और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल आज एनडीए का हिस्सा है और बीजेपी की सहयोगी पार्टी है . 

इस बीच पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट नेताओं की एक नई पीढ़ी भी सामने आ गई है . उसमें सबसे प्रमुख रूप से उभर कर सामने आए हैं बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान . बालियान मुजफ्फरनगर से दो बात सांसद रहे हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में तो उन्होंने जयंत चौधरी के पिता चौधरी अजीत सिंह को ही मात दी थी . कहा जाता है कि जयंत चौधरी के एनडीए में शामिल होने के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाटों की चौधराहट वाली लड़ाई तेज़ हो गई है . वैसे तो आज का जाट महासम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय जाट संसद के झंडे तले आयोजित हुआ था लेकिन सम्मेलन का आयोजन स्थल मुजफ्फरनगर लोकसभा क्षेत्र में ही पड़ता है जो संजीव बालियान का लोकसभा क्षेत्र है . ऐसे में इस समारोह में शामिल होना जयंत चौधरी के लिए सियासी तौर पर शायद सही फ़ैसला नहीं होता . 

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पश्चिम उत्तर प्रदेश में क़रीब 28 लोकसभा और 126 विधानसभा सीटें पड़ती हैं . इन सीटों पर कुल आबादी देखें तो जाटों की आबादी करीब 16 -18 फीसदी है जो लगभग 40 - 45 सीटों पर चुनाव परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित करती है . मुजफ्फरनगर , बागपत , मेरठ और शामली जिलों में इनकी तादाद काफ़ी ज़्यादा है . इसमें अगर मुस्लिम मतदाताओं को भी जोड़ दिया जाए तो ये संख्या और बढ़ जाएगी . ज़ाहिर है उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ऐन पहले शुरू हुई ये रेस अभी और रफ़्तार पकड़ेगी .

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