बच्चा किसका है? पति की मांग पर पत्नी का डीएनए टेस्ट कराने का MP हाईकोर्ट ने दिया आदेश

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्ची की डीएनए जांच के आदेश को सही ठहराते हुए कुटुम्ब न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है.

विज्ञापन
Read Time: 3 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • MP हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची की DNA जांच के आदेश को वैध और उचित मानते हुए कुटुम्ब न्यायालय का फैसला बरकरार रखा
  • अदालत ने गर्भधारण के समय पति-पत्नी के बीच शारीरिक संपर्क न होने के संकेत मिलने पर जांच को न्यायोचित बताया
  • पति ने पत्नी पर आरोप लगाते हुए DNA जांच की मांग की, क्योंकि गर्भधारण की अवधि के हिसाब से जन्म असंभव था
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची के डीएनए जांच कराने के आदेश को वैध और उचित बताते हुए कुटुम्ब न्यायालय, जबलपुर के फैसले को बरकरार रखा है. जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने पत्नी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में डीएनए जांच का आदेश न्यायोचित, आवश्यक और उपलब्ध तथ्यों के अनुरूप है.

गर्भधारण के समय संपर्क न होने के संकेत

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि गर्भधारण की अवधि के दौरान पति‑पत्नी के बीच शारीरिक संपर्क नहीं था. ऐसे में सच्चाई स्थापित करने के लिए डीएनए टेस्ट कराना उचित माना जा सकता है. साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि कुटुम्ब न्यायालय ने बच्ची की डीएनए जांच की अनुमति देकर कोई कानूनी त्रुटि नहीं की है.

ये भी पढ़ें : 14 साल बाद गिरफ्त में आया उम्रकैद का दोषी; पैरोल लेकर हुआ था फरार, एमपी पुलिस ने अहमदाबाद से दबोचा

पति और पत्नी के बीच विवाद

यह मामला सेना में कार्यरत पति और मध्य प्रदेश पुलिस में आरक्षक के पद पर कार्यरत पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है. इस मामले में पति का आरोप है कि अक्टूबर 2015 में पत्नी ने उसे बुलाया था और मात्र चार दिनों के भीतर गर्भवती होने की जानकारी दी, जो चिकित्सकीय रूप से संभव नहीं है.

Advertisement

पति ने यह भी दावा किया कि बच्ची का जन्म गर्भधारण की संभावित अवधि से पहले, लगभग आठ माह के भीतर हुआ, जिससे यह स्पष्ट होता है कि गर्भ उस समय ठहरा जब दोनों के बीच संपर्क ही नहीं था. इसी आधार पर पति ने पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की और डीएनए जांच की मांग की.

ये भी पढ़ें : MP का शाह परिवार विवादों में; मंत्री जी को सु्प्रीम कोर्ट से फटकार, विधायक जी पार्टी के विचारों से अलग!

Advertisement

निजता के अधिकार का तर्क, पर कोर्ट ने नहीं माना

इस मामले में पत्नी की ओर से दलील दी गई कि डीएनए जांच कराना उसके निजता के अधिकार और बच्ची की पहचान संबंधी अधिकारों का उल्लंघन है तथा यह अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के भी खिलाफ है. लेकिन हाईकोर्ट ने इन तर्कों को अस्वीकार कर दिया. अदालत ने कहा कि पति ने यह जांच न तो बच्ची की वैधता पर प्रश्न उठाने के लिए और न ही भरण‑पोषण से बचने के लिए मांगी है, बल्कि केवल व्यभिचार के आधार पर दायर तलाक याचिका को सिद्ध करने हेतु मांगी है.

उचित परिस्थितियों में डीएनए टेस्ट संभव

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि ऐसे ठोस आधार हों जिनसे यह प्रतीत हो कि गर्भधारण के समय पति‑पत्नी के बीच संपर्क नहीं था, यदि पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हों और यदि संतान को अवैध घोषित करने का कोई दावा न किया गया हो, तो अदालत डीएनए जांच का आदेश दे सकती है. इन्हीं तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने कुटुम्ब न्यायालय के निर्णय को सही ठहराते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी.
 

Featured Video Of The Day
West Bengal Election 2026: Bengal में ओवैसी और हुमायूं कबीर ने मिलाया हाथ! | Sawaal India Ka