Iran War: ईरानी दूतावास की दीवारों पर चीख रहीं मिनाब स्कूल के मासूमों की रोंगटे खड़े कर देने वाली यादें

28 फरवरी को ईरान के मिनाब शहर में आसमान से बरसी मिसाइलों की भेंट चढ़ी अबोध जिंदगियों की रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीरें इस वक्त नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास की दीवारों पर चीख-चीख कर कह रही हैं कि आखिर उन बच्चियों का क्या कसूर था.

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जंग वो बेरहम आग है, जो न इंसानियत देखती है, न उम्र, न मासूमियत. इसमें सिर्फ जान-माल की ही बलि नहीं चढ़ती बल्कि यह हंसती-खिलखिलाती जन्नत को भी जहन्नुम बनाकर रख देती है. ईरान के एक स्कूल पर बरसी मौत ने साबित कर दिया कि नफरत की मिसाइलों को न मासूमियत की फिक्र होती है और न ही उनके खिलखिलाते बचपन की कद्र. जिन नन्हे हाथों में रंग-बिरंगी पेंसिल और किताबें होनी चाहिए थी, आज उनकी यादें चुनिंदा कागजों के टुकड़ों और नम आंखों तक सिमटकर रह गई हैं. आसमान से बरसी मिसाइलों की भेंट चढ़ी अबोध जिंदगियों की रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीरें इस वक्त नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास की दीवारों पर सजी हैं और चीख-चीख कर कह रही हैं कि सत्ता और वर्चस्व की इस जंग में आखिर उन बच्चियों का क्या कसूर था, जिन्होंने जिंदगी के रंग अभी ढंग से देखे भी नहीं थे. 

28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल ने जब ईरान के ऊपर अचानक बमबारी की थी, उस वक्त जिंदगी रोज की तरह चल रही थी. होर्मोज़गन प्रांत के मिनाब शहर का एक प्राइमरी गर्ल्स स्कूल भी नन्हीं बच्चियों की रौनक से गुलजार था. लेकिन पलक झपकते ही वह स्कूल 168 बच्चियों और लोगों की कब्रगाह बन गया. रेड क्रेसेंट के बचाव दल वहां पहुंचे, तो उन्हें वहां बच्चियों के शवों के साथ कुछ ऐसी चीजें मिलीं, जो आज दुनिया की रूह को झकझोर रही हैं- कटी-फटी कॉपियां, बिखरे हुए पन्ने और वो ड्राइंग्स, जिनमें उन बच्चियों ने अपनी मौत से कुछ पल पहले रंग भरे थे. 

ईरानी दूतावास में लगी "Children Still Draw the Sun” नाम की प्रदर्शनी में मासूमों की इन्हीं यादों को दर्शाया गया है. भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फताली ने प्रदर्शनी के दौरान बेहद भावुक होते हुए NDTV से कहा कि मिनाब के स्कूल पर हुए हमले ने न सिर्फ एक इमारत को ढहाया बल्कि मासूम जिंदगियों को भी हमसे छीन लिया. बचाव कर्मियों को मलबे में बच्चियों की जो चीजें मिली थीं, उनमें से कुछ इस वक्त दूतावास की गैलरी की दीवारों पर चीख-चीख कर युद्ध की कीमत बता रही हैं.

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हैरान करने वाली बात ये है कि इन चित्रों में कहीं भी युद्ध का खौफ नजर नहीं आता. मलबे से बरामद इन पन्नों पर बच्चों ने चमकता हुआ सूरज, नीला आसमान, छोटे-छोटे घर और हरियाली उकेरी थी. प्रदर्शनी में लगा एक नोट दिल को चीर देता है, जिसमें लिखा है- "इन चित्रों मे दिख रही दुनिया अब भी सरल, उज्ज्वल और भरोसेमंद है." हालांकि कड़वी सच्चाई ये है कि उन कागजों के बाहर की दुनिया इतनी बेरहम थी कि उसने मासूमों की जिंदगियों को पल भर में राख कर दिया.

एक ईरानी अधिकारी मेहदी एसफंदियारी ने एक ऐसी कहानी साझा की जिसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं. उन्होंने माकन नसिरी नाम की एक बच्ची के बारे में बताया, जिसका शव उस खौफनाक हमले के बाद कभी मिला ही नहीं. स्कूल के मलबे से माकन के नाम पर अगर कुछ मिला, तो वह था उसका एक मुड़ा हुआ नीला स्वेटर और क्रीम रंग के छोटे से जूते. वह बच्ची तो अब नहीं रही, लेकिन उसके वो खाली जूते युद्ध की संवेदनहीनता पर सवाल खड़ा करता सन्नाटा पैदा कर रहे हैं.

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प्रदर्शनी में आने वाले लोग सिर्फ मासूम बच्चों की कला नहीं देख रहे, बल्कि उस खामोशी और सन्नाटे को भी महसूस कर रहे हैं जो एक जिंदगी के अचानक रुक जाने से पैदा होती है. यहां हर ड्रॉइंग एक अधूरी कहानी है, एक ऐसी मुस्कान की कहानी, जिसे नफरत की आग ने निगल लिया. राजदूत फताली जोर देकर कहते हैं कि जंग चाहे किसी भी राजनीति का हिस्सा हो, बच्चे कभी उसका शिकार नहीं होने चाहिए, क्योंकि जब एक बच्चा इस दुनिया को छोड़ता है तो उसके साथ एक परिवार की पूरी दुनिया खत्म हो जाती है.

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