इंदौर में एक शब्द ने ले ली 22 लोगों की जान? 'Discuss' लिखकर 72 दिन तक दबाए रखी सरकारी फाइल

इंदौर के भगीरथपुरा में गंदा पानी पीने से 22 लोगों की मौत के मामले की जांच रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, 52 में से 50 बोरवेल का पानी फेल था और अधिकारियों की सुस्ती के कारण यह घटना हुई. पूरी खबर पढ़ें.

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क्या सरकारी बाबुओं की टेबल पर रखी एक फाइल और उस पर लिखे सिर्फ एक शब्द की वजह से 22 लोगों की जान जा सकती है? सुनने में यह बेहद अजीब लगता है, लेकिन इंदौर के भगीरथपुरा में गंदा पानी पीने से हुई 22 मौतों के मामले में पेश की गई जांच रिपोर्ट में कुछ ऐसा ही खौफनाक सच सामने आया है. हाईकोर्ट में सौंपी गई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि इलाके में नई पाइपलाइन बिछाने के प्रस्ताव पर एक अधिकारी ने सिर्फ "Discuss" यानी 'चर्चा करें' लिखकर फाइल को 72 दिनों तक दबाए रखा, जिसके कारण समय पर काम नहीं हो सका और लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. इस रिपोर्ट में एक और डराने वाला खुलासा हुआ है कि प्रदूषण बोर्ड की जांच में भागीरथपुरा इलाके के 52 में से 50 बोरवेल का पानी पूरी तरह से फेल पाया गया था, जिसमें गंदे नाले का खतरनाक बैक्टीरिया मौजूद था.

लगातार आ रहा था काला पानी

रिपोर्ट के मुताबिक,भगीरथपुरा में पीने के पानी और सीवर (गंदे नाले) की पाइपलाइनें इस कदर लापरवाही से बिछाई गई थीं कि वे कई जगहों पर आपस में मिल गई थीं. कई जगहों पर तो सीवर की लाइनें पीने के पानी की पाइपलाइन के ऊपर से गुजर रही थीं. पाइपलाइनों में लीकेज होने के कारण गंदा सीवर का पानी सीधे लोगों के घरों में सप्लाई होने वाले पानी में मिल गया.इसके साथ ही प्रदूषण बोर्ड की जांच में 52 बोरवेल में से 50 बोरवेल का पानी पूरी तरह फेल मिला, जिसमें ई-कोलाई (E. coli) जैसा जानलेवा बैक्टीरिया था. वहीं, नगर निगम की अपनी जांच में भी 73 में से 54 पानी के सैंपल फेल पाए गए थे.
 

72 दिन तक सिर्फ 'चर्चा' के नाम पर दबी रही फाइल

कुल मिलाकर इस मामले में सरकारी स्तर पर फाइलों को दबाने और सुस्ती की जो कहानी सामने आई है, वह चौंकाती है. रिपोर्ट बताती है कि इस घटना के फैलने से ठीक पहले इलाके में 2.40 करोड़ रुपये की नई पाइपलाइन बिछाने का एक प्रस्ताव तैयार किया गया था. 15 अक्टूबर 2025 को एडिशनल कमिश्नर रोहित सिसोनिया ने उस फाइल पर सिर्फ एक शब्द लिखा- "Discuss" यानी चर्चा करें. लालफीताशाही का आलम ये है कि इस "Discuss" शब्द पर अगली चर्चा दो महीने से भी ज्यादा समय बाद यानी 18 दिसंबर को हुई. इसके बाद 26 दिसंबर को फाइल दोबारा आगे बढ़ी. यानी सिर्फ चर्चा करने के नाम पर फाइल को 72 दिनों तक दबाकर रखा गया. जब इलाके में लोग गंदा पानी पीने को मजबूर थे, तब जाकर 29 दिसंबर को टेंडर खोला गया और 13 जनवरी 2026 को काम शुरू हो पाया.

20 महीने लेट हुआ पुराना काम, बार-बार कैंसिल किए टेंडर

अधिकारियों की लापरवाही यहीं खत्म नहीं हुई. इससे पहले का एक 2.25 करोड़ रुपये का पाइपलाइन का काम, जिसे 14 मई 2024 तक हर हाल में पूरा हो जाना चाहिए था, वह जनवरी 2026 में जाकर पूरा हुआ. यानी यह प्रोजेक्ट करीब 20 महीने की भारी देरी से पूरा हुआ.

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रिपोर्ट में इसके लिए ठेकेदार मालवा इंजीनियरिंग और सुपरविजन करने वाले इंजीनियरों को सीधे तौर पर जिम्मेदार माना गया है. वहीं, करीब 97 लाख रुपये का एक और टेंडर बार-बार कैंसिल किया जाता रहा और नए सिरे से मंगाया जाता रहा, जिससे कीमती समय बर्बाद हुआ. रिपोर्ट कहती है कि अगर ये काम समय पर हो जाते, तो शायद आज 22 लोग जिंदा होते.

'मुझे नहीं पता था कि यह मेरी ड्यूटी है'

जांच के दौरान इलाके में तैनात रहे सहायक यंत्री (AE) सरोज कुमार प्रजापति के बयान ने अधिकारियों की असंवेदनशीलता को पूरी तरह उजागर कर दिया. प्रजापति ने खुद स्वीकार किया कि उन्हें इलाके के लोगों से लगातार क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों, बदबूदार और काले पानी की शिकायतें मिल रही थीं. लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने इसकी जानकारी अपने बड़े अधिकारियों को दी? तो उनका जवाब था कि वे इस बात को लेकर उलझन में थे कि इसकी सूचना देना उनकी ड्यूटी है या फिर ड्रेनेज विभाग की. रिपोर्ट में इसे बेहद गंभीर लापरवाही मानते हुए उन्हें इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है. इसके साथ ही वरिष्ठ जल प्रदाय यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव को भी अपनी जिम्मेदारियों से भागने का दोषी माना गया है.

पुरानी फाइलें और नक्शे ही गायब कर दिए

जब जांच कमेटी ने यह पता लगाने की कोशिश की कि 1990 से 1995 और 1999 से 2004 के दौरान पानी और सीवर की यह खतरनाक पाइपलाइन किसने बिछाई और इसका नक्शा किसने पास किया, तो नगर निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) ने हाथ खड़े कर दिए. उस दौर के जरूरी नक्शे, ब्लूप्रिंट और सरकारी फाइलें पूरी तरह से गायब पाई गईं. विकास प्राधिकरण ने दावा किया कि 2010 में पुराने रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए थे, लेकिन वे इसका कोई सबूत नहीं दे पाए. कमेटी ने फाइलों को जानबूझकर छिपाने या गायब करने के मामले की अलग से जांच कराने की बात कही है.

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कमिश्नर और मेयर को मिली राहत

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि तत्कालीन नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को टेंडर प्रक्रिया में देरी या इस गंदे पानी की घटना के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उनके स्तर पर कोई सीधी लापरवाही नहीं मिली. वहीं, मेयर पुष्यमित्र भार्गव के पास एक पुराने प्रस्ताव की फाइल 66 दिनों तक पेंडिंग रहने के मामले में भी कमेटी ने कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि फाइल लगातार सीधे उन्हीं के पास अटकी हुई थी, इसलिए उन पर भी कोई व्यक्तिगत लापरवाही साबित नहीं होती.
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