- स्काईरूट एयरोस्पेस का पहला ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 ने सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया
- भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अब वैश्विक बाजार में प्रवेश कर चुका है और नई तकनीकों का परीक्षण कर रहा है
- भारत के अंतरिक्ष इतिहास में ISRO की स्थापना से लेकर चंद्रयान-3 की सफलता तक कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज हैं
भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में शनिवार को एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की. निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के पहले ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 ने अपने पहले ही मिशन में सफलता हासिल करते हुए तय समय पर सैटेलाइट को पृथ्वी से 450 किलोमीटर ऊंचाई पर निर्धारित कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित कर दिया. इस उपलब्धि को भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारत के स्पेस सफर की शुरुआत साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट के पुर्जे ले जाने से हुई थी और आज भारत दुनिया की लीडिंग स्पेस एजेंसियों में से एक है.
15 अगस्त 1969 को बेहद ही सीमित संसाधनों के साथ भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत की थी. अंतरिक्ष में पहले उपग्रह को भेजे जाने से लेकर मंगल, चंद्रयान और अब गगनयान की तैयारी, इसरो के साथ भारत का ये अंतरिक्ष का सफर काफी रोचक रहा है.
60 के दशक में रॉकेट बनाते भारत के वैज्ञानिक
भारत की स्पेस जर्नी और महत्वपूर्ण माइलस्टोन्स :-
23 फरवरी 1962 (INCOSPAR की स्थापना): भारत सरकार ने डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. होमी जहांगीर भाभा के प्रयासों से 'इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च' (INCOSPAR) का गठन किया. यही आगे चलकर इसरो बना.
21 नवंबर 1963 (पहला साउंडिंग रॉकेट): केरल के थुम्बा से भारत ने अपना पहला साउंडिंग रॉकेट 'नाइके-अपाचे' (Nike-Apache) लॉन्च किया, जिसे अमेरिका से लाया गया था.
भारत ने अपना पहला रॉकेट लॉन्च किया, तब इसके पार्ट को लॉन्च पैड तक साइकिल से ले जाया गया.
15 अगस्त 1969 (ISRO का जन्म): INCOSPAR को अपग्रेड करके आधिकारिक तौर पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना की गई.
19 अप्रैल 1975 (आर्यभट्ट - पहला सैटेलाइट): भारत ने अपना पहला स्वदेशी सैटेलाइट 'आर्यभट्ट' अंतरिक्ष में भेजा. इसे सोवियत संघ (रूस) के रॉकेट की मदद से लॉन्च किया गया था.
भारत ने अपना पहला स्वदेशी सैटेलाइट 'आर्यभट्ट' अंतरिक्ष में भेजा.
18 जुलाई 1980 (SLV-3 और रोहिणी): भारत ने अपने पहले स्वदेशी लॉन्च व्हीकल SLV-3 की मदद से 'रोहिणी' सैटेलाइट को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित किया. इसके साथ ही भारत खुद का रॉकेट बनाने वाले चुनिंदा देशों के एलीट क्लब में शामिल हो गया.
1981 में भारत ने पहला Communication Satellite 'एप्पल' लॉन्च किया. लॉन्चिंग साइट तक ले जाने के लिए बैलगाड़ी का सहारा लेना पड़ा.
1981 में ऐपल सैटेलाइट को प्रक्षेपण के लिए बैलगाड़ी में ले जाया गया.
3 अप्रैल 1984 (पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री): विंग कमांडर राकेश शर्मा सोवियत संघ के सोयूज टी-11 (Soyuz T-11) मिशन से अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने.
20 सितंबर 1993 (PSLV की पहली सफल उड़ान): इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) ने अपनी पहली सफल उड़ान भरी. इसे इसरो का 'वर्कहॉर्स' कहा जाता है.
18 अप्रैल 2001 (GSLV का आगमन): इसरो ने भारी सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने के लिए GSLV (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle) का पहला सफल टेस्ट किया.
रोहिणी-75 रॉकेट के लॉन्च की तस्वीर
22 अक्टूबर 2008 (चंद्रयान-1): भारत ने चंद्रमा के लिए अपना पहला मिशन 'चंद्रयान-1' लॉन्च किया. इस मिशन ने ही दुनिया को पहली बार चांद पर पानी (Water Molecules) की मौजूदगी के पुख्ता सबूत दिए थे.
5 नवंबर 2013 (मंगलयान - MOM): इसरो ने अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह के लिए 'मार्स ऑर्बिटर मिशन' (Mangalyaan) लॉन्च किया.
24 सितंबर 2014 (मंगल की कक्षा में प्रवेश): भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश किया, वह भी बेहद कम बजट में.
इसरो का पहला ऑपरेशनल पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, जिसे पीएसएलवी के नाम से जाना जाता है.
15 फरवरी 2017 (104 सैटेलाइट्स का वर्ल्ड रिकॉर्ड): इसरो ने PSLV-C37 रॉकेट के जरिए एक सिंगल मिशन में 104 सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजकर उस समय का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था.
22 जुलाई 2019 (चंद्रयान-2): भारत ने अपना दूसरा चंद्र मिशन लॉन्च किया. हालांकि इसका लैंडर 'विक्रम' आखिरी पलों में हार्ड लैंडिंग का शिकार हो गया, लेकिन इसका ऑर्बिटर आज भी चांद के चक्कर लगा रहा है और डेटा भेज रहा है.
23 अगस्त 2023 (चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक लैंडिंग): भारत ने इतिहास रचते हुए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला देश बनने का गौरव हासिल किया.
चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक लैंडिंग के साथ ही भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला देश बन गया.
2 सितंबर 2023 (आदित्य-L1): सूर्य का अध्ययन करने के लिए भारत ने अपना पहला सोलर मिशन 'Aditya-L1' सफलतापूर्वक लॉन्च किया, जो जनवरी 2024 में अपनी तय जगह (Lagrange Point 1) पर पहुंच गया.
2024 - 2026 (गगनयान की तैयारियां व कमर्शियल उड़ानें): इसरो अपने महत्वाकांक्षी 'गगनयान' (Gaganyaan) मिशन पर तेजी से काम कर रहा है, जिसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (गगननॉट्स) को खुद के दम पर अंतरिक्ष में भेजा जाएगा. इसके साथ ही इसरो का नया स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) भी अब पूरी तरह ऑपरेशनल हो चुका है.
सूर्य का अध्ययन करने के लिए भारत ने अपना पहला सोलर मिशन 'Aditya-L1' लॉन्च किया
18 जुलाई 2026: देश के पहले निजी कक्षीय रॉकेट ने तकनीकी पेलोड को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया.
18 जुलाई को श्रीहरिकोटा से निजी क्षेत्र द्वारा विकसित पहले कक्षीय रॉकेट ‘विक्रम-1' को कई तकनीकी पेलोड के साथ सफलतापूर्वक पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचा दिया. ‘मिशन आगमन' नाम से संचालित इस मिशन के साथ भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने पहली बार उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने वाले वैश्विक बाजार में औपचारिक रूप से प्रवेश कर लिया. इस मिशन का संचालन हैदराबाद आधारित निजी कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस' ने किया. कंपनी ने इस मिशन को ‘‘बड़ी सफलता'' करार दिया.
निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के पहले ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विक्रम-1 ने अपने पहले ही मिशन में सफलता हासिल की. सैटेलाइट को पृथ्वी से 450 किलोमीटर ऊंचाई पर निर्धारित कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित किया.
अपने पहले अभियान में चार चरणों वाला और सात मंजिला इमारत जितना ऊंचा ‘विक्रम-1' रॉकेट शनिवार को बादलों से घिरे मौसम के बीच दोपहर 12 बजकर पांच मिनट पर इसरो के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के पहले प्रक्षेपण परिसर से सफलतापूर्वक रवाना हुआ. प्रक्षेपण के दौरान रॉकेट से नारंगी रंग का धुआं निकला और इस अंतरिक्ष केंद्र से एक नए युग की शुरुआत हुई.
‘विक्रम-1' के साथ भेजे गए पेलोड में कॉसमोसर्व स्पेस का ‘एम्ब्रेस' मिशन शामिल है. (‘विक्रम-1' मिशन की टीम)
कंपनी के अनुसार, स्काईरूट एयरोस्पेस का ‘स्कोप' उपग्रह एक आंतरिक प्रायोगिक पेलोड है, जिसे भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों में उपयोग होने वाली प्रौद्योगिकियों के परीक्षण के लिए विकसित किया गया है.
इसके अलावा कॉस्मोस डायमंड्स द्वारा तैयार ‘कॉस्मिक ब्लूम', जो प्रयोगशाला में तैयार हीरे पर आधारित एक कलात्मक कृति है, तथा जर्मनी की कंपनी डीक्यूब्ड के परीक्षण पेलोड ‘यूडी3पीपी' और ‘एमडी3आरएन' भी शनिवार को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में पहुंच गए.
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