वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की हिरासत के खिलाफ अब भारत में भी विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं. भारत की प्रमुख वामपंथी पार्टियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका की इस कार्रवाई को 'आपराधिक युद्ध' और अंतरराष्ट्रीय कानून का नग्न उल्लंघन करार दिया है. मादुरो का 'अपहरण' और संप्रभुता पर हमला भाकपा (माले) लिबरेशन, सीपीआई (एम), सीपीआई, आरएसपी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने एक सुर में कहा कि 3 जनवरी को कराकास पर की गई बमबारी और राष्ट्रपति मादुरो व उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को जबरन देश से बाहर ले जाना एक संप्रभु राष्ट्र की गरिमा पर खुला हमला है. वामपंथी नेताओं ने इसे 'अपहरण' की संज्ञा देते हुए कहा कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर की धज्जियां उड़ा दी हैं.
'नार्को-टेररिज्म' महज एक बहाना!
तेल संसाधनों पर कब्जे की साजिश संयुक्त बयान में अमेरिकी मंशा पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा गया कि 'नार्को-टेररिज्म' का हवाला देना महज एक बहाना है. असल मकसद वेनेजुएला के विशाल तेल संसाधनों पर कब्जा करना और बोलिवेरियन क्रांति को कुचलना है.
वाम दलों के अनुसार, अमेरिका एक बार फिर लैटिन अमेरिका को अपना 'बैकयार्ड' (Backyard) समझकर वहां की चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंकने की पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता का प्रदर्शन कर रहा है. उन्होंने इराक युद्ध की याद दिलाते हुए चेतावनी दी कि जिस तरह वहां तबाही मचाई गई, वही इतिहास अब वेनेजुएला में दोहराया जा रहा है.
देशव्यापी विरोध का आह्वान
भारत के पांच प्रमुख वामपंथी दलों, जिनमें एमए बेबी, डी राजा, दीपंकर भट्टाचार्य, मनोज भट्टाचार्य और जी देवराजन शामिल हैं, ने देश भर के शांति-प्रिय और साम्राज्यवाद विरोधी नागरिकों से सड़कों पर उतरने की अपील की है. उन्होंने भारत सरकार से भी मांग की है कि वह इस अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी के खिलाफ अपनी चुप्पी तोड़े.
वामपंथी दलों ने स्पष्ट किया कि यह जंग केवल वेनेजुएला के खिलाफ नहीं, बल्कि दुनिया के उन सभी देशों के खिलाफ है जो अपने राजनीतिक और आर्थिक भविष्य का फैसला खुद करना चाहते हैं. आने वाले दिनों में भारत के विभिन्न हिस्सों में अमेरिकी दूतावासों और सरकारी दफ्तरों के बाहर बड़े विरोध प्रदर्शनों की योजना बनाई गई है.














