आपदा में अवसर तलाशेगा भारत, LPG-PNG के मुकाबले ई-कुकिंग अपनाना क्यों है जरूरी?

मिडिल ईस्ट में जो हो रहा है, उस कारण भारत में कथित तौर पर LPG की किल्लत सामने आ रही है. इस आपदा में भारत के पास अवसर है ई-कुकिंग को अपनाने का.

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सांकेतिक तस्वीर.
PTI
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  • भारत में 2014 तक LPG कनेक्शन 14 करोड़ थे, जो अब बढ़कर 33 करोड़ से अधिक हो गए हैं
  • मिडिल ईस्ट में तनाव और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से भारत में LPG की कमी की समस्या उत्पन्न हुई है
  • भारत में केवल 5% परिवार ही खाना बनाने के लिए बिजली का उपयोग करते हैं, जबकि LPG और PNG का उपयोग व्यापक है
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यूं तो आजादी के समय से ही भारत में खाना बनाने के लिए LPG का इस्तेमाल होने लगा था. लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत सीमित था. सिर्फ हाई क्लास वाले लोग ही इसका इस्तेमाल कर पाते थे. केंद्र सरकार के मुताबिक, 2014 तक देशभर में LPG के 14 करोड़ कनेक्शन ही थे. आज के समय में 33 करोड़ से ज्यादा कनेक्शन हैं. अब LPG के साथ-साथ PNG भी चलती है, जिसमें पाइपलाइन के जरिए गैस घरों तक पहुंचती है. लेकिन PNG कनेक्शन भी सवा करोड़ के आसपास ही हैं. 

ये दिखाता है कि आज भी बहुत से घरों में LPG या PNG कनेक्शन नहीं है. अब जब मिडिल ईस्ट में एक जंग चल रही है और तेल-गैस का बड़ा रास्ता होर्मुज स्ट्रेट बंद पड़ा है तो भारत पर भी इसका असर पड़ रहा है. देश में कई जगहों से LPG की किल्लत की खबरें सामने आई हैं. LPG की कथित किल्लत के बीच लोगों ने इंडक्शन स्टोव की तरफ रुख किया. आलम ये रहा कि देखते ही देखते बाजार में इंडक्शन स्टोव और इलेक्ट्रिक बर्नर भी खत्म हो गए. ऑनलाइन मार्केट में तो एक-एक महीने का डिलीवरी टाइम दिखा रहा है.

LPG की इस 'आपदा' में एक 'अवसर' भी है. और वह अवसर है ई-कुकिंग का. इंडिया रेसिडेंशियल एनर्जी सर्वे 2020 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में अभी सिर्फ 5% परिवार ही खाना बनाने के लिए बिजली का इस्तेमाल करते हैं.

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LPG-PNG कितनी महंगी पड़ती है?

भारत में हर दिन 50 से 55 हजार टन LPG की खपत होती है. भारत अपनी जरूरत की 60% LPG आयात करती है. LPG की कीमतें प्रोपेन की कीमत पर निर्भर करती है. जियोपॉलिटिकल डिस्टर्बेंस के कारण प्रोपेन की कीमत 700 डॉलर से ज्यादा हो गई तो भारत में भी LPG की कीमत 1,000 रुपये के पार चली गई थी.

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इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की अक्टूबर 2025 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत हर साल आयात के लिए जितना खर्च करता है, उसका 3% सिर्फ LPG और LNG के लिए होता है. 

IEEFA की रिपोर्ट बताती है कि 2018-19 में LPG-LNG के आयात के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. 2024-25 में यह खर्च बढ़कर 2.20 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया. यानी, 6 साल में भारत का LPG-LNG का आयात बिल 50% तक बढ़ गया.

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क्या ई-कुकिंग की तरफ बढ़ा जा सकता है?

भारत में अभी भी 37% परिवार ऐसे हैं जो खाना बनाने के लिए लकड़ी, कोयला या गोबर के उपलों का इस्तेमाल करता है. जबकि, LPG और PNG के कनेक्शन के भी लगातार बढ़ रहे हैं. लेकिन एक और अच्छी बात ये है कि बिजली कनेक्शन काफी तेजी से बढ़ रहे हैं. 

आंकड़े बताते हैं कि 2023 तक भारत में गांवों के 98.6% और शहरों के 99.7% घरों में बिजली का कनेक्शन था. इतना ही नहीं, अब पावर सप्लाई पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हुई है. इकनॉमिक सर्वे बताता है शहरों में अब हर दिन औसतन 23.4 घंटे और गांवों में 21.9 घंटे बिजली आ रही है. 

बिजली कनेक्शन बढ़ना और LPG-PNG का महंगा होना, दोनों ही भारतीय परिवारों को धीरे-धीरे भारतीय परिवारों को ई-कुकिंग की तरफ बढ़ने का मौका देता है.

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ई-कुकिंग से बचत भी!

ई-कुकिंग इसलिए भी जरूरी हो जाती है, क्योंकि एक ओर जहां LPG या PNG का महंगी पड़ती है तो दूसरी ओर बिजली से खाना बनाना ज्यादा किफायती पड़ता है.

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IEEFA की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली में 4 लोगों के एक परिवार के लिए LPG या PNG की तुलना में ई-कुकिंग का इस्तेमाल करना ज्यादा सस्ता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 4 लोगों के परिवार के लिए ई-कुकिंग इस्तेमाल करने का सालाना खर्च 5,844 रुपये बैठता है, जो PNG से 14% और LPG से 37% कम पड़ता है. और तो और, LPG पर सब्सिडी भी मिले, तब भी ई-कुकिंग से खाना बनाना 10% सस्ता ही है.

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IEEFA की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में PNG से खाना बनाना 4 साल में 47% महंगा हो गया है. 4 लोगों के परिवार के लिए 2020-21 में PNG से खाना बनाने का सालाना खर्च 4,522 रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 6,657 रुपये हो गया. इसी तरह बिना सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर से खाना बनाने का खर्च भी 4 साल में 23% बढ़कर 6,424 रुपये हो गया. प्रधानमंत्री उज्ज्वला स्कीम में सब्सिडी में सिलेंडर मिलता है, इसलिए इसका सालाना खर्च 4,024 रुपये पड़ता है.

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इसी आपदा में है अवसर?

ईरान युद्ध के बाद जिस तरह से होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ और उसने LPG के संकट को बढ़ा दिया है. इससे पता चलता है कि अब बदलती दुनिया के साथ हमें भी बदलना जरूरी है. 

IEEFA की रिपोर्ट के मुताबिक, LPG और PNG कनेक्शन की तुलना में इंडक्शन स्टोव लेना थोड़ा महंगा पड़ता है. लेकिन इससे सालाना बचत काफी होती है. 

अब ई-कुकिंग की तरफ बढ़ना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यह आर्थिक से ज्यादा जियोपॉलिटिक्स का मसला बन गया है. LPG के लिए हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं और अब इसमें होर्मुज से गुजरने का रिस्क भी है. नहीं पता कि कल को हालात बिगड़ें और लंबे समय तक होर्मुज स्ट्रेट बंद पड़े तो क्या होगा?

LPG और PNG की तुलना में बिजली को हम सोलर पैनल से भी बना सकते हैं. अब ज्यादातर घरों में सोलर पैनल लगाए ही जा रहे हैं. ग्रामीण नहीं तो कम से कम शहरी लोग तो ई-कुकिंग की तरफ शिफ्ट हो ही सकते हैं. होना भी चाहिए, ताकि आने वाले समय में फिर इस तरह की आपदा में हमारे सामने कुकिंग गैस की कोई किल्लत न हो.

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