- चार्टेड प्लेन की लैंडिंग रफ़्तार आम यात्री विमान से अधिक होती है, जो लगभग 180 किलोमीटर प्रति घंटा होती है.
- बारामती एयरपोर्ट पर विज़िबिलिटी कम होने और नेविगेशन सिस्टम की कमी के कारण दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है.
- टेबलटॉप एयरपोर्ट के छोटे और ऊंचे रनवे के कारण पायलट को लैंडिंग में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी आवश्यक होती है.
बारामती में महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार के चार्टेड प्लेन की दुर्घटना के बाद हमने कई सारे तथ्यों की जांच हो रही है. ब्लैक बॉक्स मिल चुका है. लेकिन ये हादसा कैसे हुआ? वीडियो में प्लेन स्पीड में एक तरफ झुक क्यों रहा है? इन सारे सवालों का जवाब हमने कई साल तक कामर्शियल फ्लाइट उड़ा चुके और फ़िलहाल प्राइवेट पायलटों को ट्रेनिंग देने वाले फ्लाइट कमांडर आलोक सिंह से समझने की कोशिश की. इन सब सवालों का जवाब समझाने के लिए वो हमें कॉकपिट तक ले गए. जहां उन्होंने बेहद बारीकी से कॉकपिट की तकनीकी पहलुओं के साथ-साथ बारामती में क्रैश हुए विमान के संभावित कारणों को समझाने की कोशिश की. साथ ही कैप्टन तोमर अवधेश से भी बात की…
1. इस तरह के चार्टेड प्लेन की रफ़्तार ज्यादा होती है.
यात्री विमान के मुकाबले इस तरह के चार्टेड यानि Light commercial jet की रफ़्तार लैंडिंग के वक्त ज़्यादा होती है. आमतौर पर Airbus जैसे विमान की रफ़्तार अगर लैंडिंग के वक्त 140 KM प्रति घंटा होती है तो ऐसे चार्टेड प्लेन की रफ़्तार 180 Km प्रति घंटा होती है. पंकज सिंह का कहना है कि इस विमान का इंजन पुराने फाइटर जेट के इंजन की तरह होता है. ये विमान बहुत अच्छा माना जाता है.
2. वायरल वीडियो में एक तरफ विमान झुकता क्यों दिख रहा है?
इसके जवाब में फ्लाइट कमांडर आलोक सिंह कहते हैं कि पहले प्रयास में जब विमान नहीं लैंड हो पाया, तब पायलट ने दूसरा प्रयास किया. आमतौर पर DGCA की गाइड लाइन के मुताबिक विजीबिलिटी 3 किमी की होनी चाहिए. अगर आप कॉकपिट में बैठकर इसे देखें तो जब आप आसमान में होते हैं तो आपको हो सकता है एयरपोर्ट दिखाई दे लेकिन जब आप लैंड करते हैं तो कई बार रनवे आपको अच्छी तरह नहीं दिखता है.
कॉकपिट में बैठकर हादसे के संभावित कारणों को समझाते फ्लाइट कमांडर आलोक सिंह.
वो कहते हैं कि बारामती जैसे एयरपोर्ट जहां आधुनिक नेविगेशन सिस्टम और एप्रोच लाइट नहीं है, वहां अगर विजीबिलिटी अच्छी नहीं है तो दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है. वहीं कैप्टन तोमर अवधेश कहते हैं कि बारामती का एयरपोर्ट पुणे ATC से कंट्रोल होता है. बारामती के टावर पर उस तरह के तकनीकी दक्ष लोग नहीं होते हैं तो पायलट को अपनी विजीबिलिटी पर ही विमान को उतारना था.
3. टेबल टॉप एयरपोर्ट पर सतर्कता और जरूरी
बारामती जैसे एयरपोर्ट को टेबलटॉप एयरपोर्ट कहा जाता है. टेबलटॉप का मतलब जहां आसपास की जमीन के मुक़ाबले रनवे ऊंचाई पर और छोटा होता है. फ्लाइट कमांडर आलोक सिंह कहते हैं कि दिल्ली का रन-वे करीब 3.9 किमी का है जबकि बारामती का करीब 700 मीटर है.. इसीलिए वायरल वीडियो देखकर हम लोग अंदाज़ा लगा रहे हैं कि विमान ने जब दूसरा प्रयास किया तब हो सकता है कि उसे अंतिम वक्त पता चला कि रनवे से पहले ही वो उतरने की कोशिश कर रहा है.
उस वक्त उसने विमान को घुमाने की कोशिश की और विमान खाई से टकरा गया. वहां कैप्टन तोमर अवधेश कहते हैं कि वीडियो में विमान ज्यादा झुका हुआ दिख रहा है. ये बड़ा अजीब है हो सकता हो कि अंतिम समय मे उन्हें रनवे दिखा और 90 डिग्री तक विमान बैंड करके वो निकालने की कोशिश कर रहे हों.
4. क्या VVIP का मानसिक दबाव रहता है पायलट पर?
फ्लाइट कमांडर आलोक सिंह कहते हैं कि जब आपके विमान में डिप्टी सीएम हो तो निश्चित तौर पर उसका दबाव कहीं न कहीं पायलट पर होता है. बारामती के सबसे नज़दीक का एयरपोर्ट पुणे था, लेकिन पायलट को लगा हो कि अगर उसे एयरपोर्ट दिखाई दे रहा है तो रनवे पर उतर सकता है. जबकि कई बार जब आप रनवे के नज़दीक होते हैं तो फ़ॉग के चलते आपको रनवे को एप्रोच करने में दिक़्क़त आ सकती है. ये सब कारण जब ब्लैक बॉक्स की बातचीत सुनी जाएगी तब पता चलेगा.
5. क्या तकनीकी कारण भी संभव है?
इस तरह विमान हादसे में तकनीकी कारण और पायलट का आंकलन दोनों कारणों का पता ब्लैक बॉक्स के जरिए मिल सकता है. लेकिन कई बार अंतिम वक्त पर जजमेंट गलती या कोई टेक्नीकल ग्लिच हादसे का कारण बन सकते हैं. कैप्टन तोमर अवधेश कहते हैं कि पायलट ने अपने रिस्क पर रनवे में इन करने की कोशिश की और टेक्नीकली वो न पहुँच पाए हों. फिलहाल बारामती प्लेन क्रैश की जांच AAIB कर रही है. एएआईभी की जांच में क्या कुछ सामने आता है, यह आने वाला वक्त बताएगा.
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