हिमालय के ग्लेशियर में दोगुनी रफ्तार से खत्म हो रही बर्फ, यह दो अरब लोगों के लिए खतरे की घंटी: रिपोर्ट

इस रिपोर्ट के अनुसार यदि जल्द से जल्द ग्लेशियर को बचाने की दिशा में अहम कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. यह एक ऐसा संकट है जो वास्तविक समय में सामने आ रहा है, जहां हर गर्मी और मानसून में नई आपदाएं देखने को मिल रही हैं.

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  • इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डिवेलपमेंट के अनुसार हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं.
  • हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में बर्फ की मोटाई 1975 के बाद से 27 मीटर तक घट चुकी है.
  • हिंदू कुश हिमालय में फैले 63,700 से अधिक ग्लेशियर लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मौजूद हैं.
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नई दिल्ली:

हिमालय के ग्लेशियर में बर्फ बड़ी तेजी से खत्म हो रही है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डिवेलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्ट में इस की जानकारी दी गई है. दावा किया गया है कि हाल के सालों में बर्फ तेजी से पिघल रही है.रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 1990-2020 तक हिमालय ने कुल 12 प्रतिशत अपना ग्लेशियर एरिया खो दिया है. रिपोर्ट में कहा कि इसी दौरान हिमालय में 9 प्रतिशत अपना आइस रिजर्व भी खत्म हुआ है. दरअसल 21 मार्च को मनाए जाने वाले वर्ल्ड ग्लेशियर डे  के मौके पर ICIMOD ने दो नई महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की. इसके अनुसार, हिंदू कुश हिमालय (HKH) में फैले ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. साल 2000 के बाद से बर्फ पिघलने की दर दोगुनी हो गई है.

1975 के बाद बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी

Changing Dynamics of Glaciers in the Hindu Kush Himalaya Region from 1990 to 2020 और  HKH Glacier Outlook 2026: Insights from 50 Years of Himalayan Glacier Monitoring हेडिंग से जारी इन दो रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियम में हो रहे बदलावों के बारे में व्यापक प्रमाण प्रस्तुत किया गया है. रिपोर्ट की माने तो 1975 के बाद से बर्फ की मोटाई में कुल 27 मीटर तक की कमी हुई है. जो एशिया के जल स्तंभ कहे जाने वाले 'हिंदू कुश हिमालय' से पिघले पानी पर निर्भर लगभग दो अरब लोगों के लिए खतरे की घंटी है.

हिंदू कुश हिमालय में 55782 वर्ग किमी में ग्लेशियर

रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बाहर हिंदू कुश हिमालय बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है, जिसमें लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 63,700 से अधिक ग्लेशियर शामिल हैं. ये ग्लेशियर कम से कम दस प्रमुख एशियाई नदी प्रणालियों के स्रोत हैं, जो अरबों लोगों के भोजन, पानी, ऊर्जा और आजीविका सुरक्षा का आधार हैं.

समुद्र तल से 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस ग्लेशियर का लगभग 78% हिस्सा ऊंचाई के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी से अत्यधिक प्रभावित है.

यह ऐसा संकट, जो हर गर्मी और मानसून में लाएगी नई आपदाएंः निदेशक

ICIMOD के महानिदेशक पेमा ग्यामत्शो ने कहा, “यह कोई दूर की समस्या नहीं है; यह एक ऐसा संकट है जो वास्तविक समय में सामने आ रहा है, जहां हर गर्मी और मानसून में नई आपदाएं देखने को मिल रही हैं. इस सदी में बर्फ के नुकसान की दर दोगुनी हो जाना हम सभी के लिए चेतावनी होनी चाहिए. हिंदू कुश हिमालय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. जल अनिश्चितता से लेकर विनाशकारी बाढ़ तक जो तेजी से बढ़ते प्रभाव हम देख रहे हैं.” उन्होंने आगे कहा कि हमें तुरंत निगरानी बढ़ाने की जरूरत है.

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1990 से 2020 के बीच 9 फीसदी बर्फ भंडार खो दिया

रिपोर्ट में ग्लेशियर के व्यापक विश्लेषण से पता चलता है कि 1990 से 2020 के बीच HKH क्षेत्र के हिमनदों ने अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग 12% और अपने अनुमानित बर्फ भंडार का 9% खो दिया है. आईसीआईएमओडी के रिमोट सेंसिंग विश्लेषक और ग्लेशियर डायनामिक्स रिपोर्ट के प्रमुख लेखक सुदन बिकास महारजन के अनुसार, सबसे तात्कालिक खतरा क्षेत्र के सबसे छोटे हिमनदों से जुड़ा है.

महारजन ने कहा, “1990 से 2020 के बीच HKH के हिमनदों का कुल क्षेत्रफल लगभग 12% घटा है, लेकिन सबसे अधिक नुकसान उन छोटे हिमनदों में देखा गया है, जिनका क्षेत्रफल 0.5 वर्ग किलोमीटर से कम है. ये अन्य हिमनदों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से सिकुड़ रहे हैं. इससे ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में रहने वाले समुदायों के लिए स्थानीय स्तर पर जल संकट का खतरा बढ़ रहा है. ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी आपदाओं की आशंका भी तेज हो रही है. खतरा इसलिए और गंभीर है क्योंकि क्षेत्र के तीन-चौथाई हिमनद इसी संवेदनशील श्रेणी में आते हैं. हम सिर्फ बर्फ नहीं खो रहे हैं, बल्कि जोखिमों में तेज़ी से बढ़ोतरी का सामना कर रहे हैं.”

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HKH ग्लेशियर आउटलुक 2026 में 38 हिमनदों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, जिससे पता चलता है कि वर्ष 2000 के बाद से व्यापक स्तर पर हिमनदों के क्षरण की दर दोगुनी हो चुकी है. इन 38 हिमनदों में से केवल 7 ही वर्ल्ड ग्लेशियर मॉनिटरिंग सर्विस (WGMS) के वैश्विक मानकों पर खरे उतरते हैं. कराकोरम, सिक्किम, जांस्कर और भूटान जैसे प्रमुख हिमनदीय क्षेत्र अब भी बड़े पैमाने पर बिना निगरानी के हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार यदि जल्द से जल्द ग्लेशियर को बचाने की दिशा में अहम कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ी को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. 

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