- हरीश राणा को एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में दस दिन से रखा गया है और उनकी स्थिति स्थिर बनी हुई है
- सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में पैसिव यूथेनेशिया को अस्वीकार कर विथ ड्राइंग ट्रीटमेंट को मान्यता दी है
- अदालत ने सभी जिलों के चीफ मेडिकल ऑफिसर्स को मेडिकल बोर्ड बनाने का निर्देश दिया है
Harish Rana Health Update: एम्स में हरीश राणा को शिफ्ट हुए आज 10 दिन पूरे हो चुके हैं. इस दौरान उनकी स्थिति लगातार स्थिर बनी हुई है. मेडिकल बोर्ड में शामिल डॉक्टर लगातार हरीश राणा की स्थिति पर नजर रख रहें हैं. हरीश का एम्स में बीत रहा हर एक मिनट उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है और इस दौरान उन्हें कोई तकलीफ ना हो इस बात का भी विशेष ख्याल रखा जा रहा है. परिवार से लेकर समाज तक, हर कोई हरीश के स्वास्थ्य के लिए चिंतित है और सबकी एक ही इच्छा है कि उन्हें सम्मानजनक तरीके से मुक्ति मिल जाए.
इस बीच हरीश को कानूनी सहायता दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले वकील मनीष जैन एनडीटीवी से खास बातचीत की. मनीष ने दिल्ली हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक परिवार की पूरी सहायता की. उन्होंने कोर्ट की फैसले से लेकर हरीश की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति पर कई बातें बताई.
फैसला सुनाते वक्त भावुक हो गए जज साहब
मनीष जैन कहते हैं, "जिस वक्त फैसला सुनाया जा रहा था, उस वक्त पूरी कोर्ट भरी हुई थी. कोर्ट रूम से लेकर गैलरी तक, हर तरफ भीड़ थी, सब टकटकी लगाए इंतजार में थे कि आखिर सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला सुनाएगा. फैसला सुनाते वक्त तो दोनों ही जज भी भावुक हो गए, उनके चेहरे पर ये भाव साफ नजर आ रहा था....मैं तो खुद भी बहुत मायूस था. लेकिन परिवार को लग रहा था कि अगर फैसला पक्ष में आया तो मरीज के लिए बहुत राहत होगी."
उन्होंने कहा कि जब अदालत में फैसला सुनाया जा रहा था तो करीब 10 से 15 मिनट तक पूरी कोर्ट शांत हो गई थी. सब भावुक हो गए थे. दोनों ही जज ने फैसला सुनाने से पहले हरीश के परिवार से मुलाकात की थी, डॉक्टर से हर पहलू की जानकारी ली तब जाकर फैसला सुनाया गया.
'मैं जीत कर भी हार गया '
मनीष जैन यह सब बताते हुए भावुक हो जाते हैं. वह कहते हैं कि शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा कि कोई वकील मुकदमा जीत कर भी हारा महसूस कर रहा था. उन्होंने कहा, "मैं जीत कर भी हार गया था. मैंने अपनी आंख से हरीश को कई बार देखा था, मैं अच्छी तरीके से जानता था कि वह कितने कष्ट में है, 13 साल कोई कम नहीं होता. उसके माता-पिता और परिवार ने जिस तरह उसकी सेवा कि वो शब्दों में बयां करना आसान नहीं है. लेकिन अब सुकून बस इस बात का है कि अदालत ने भी स्थिति को समझा और एक ऐसा फैसला दिया जो देश की न्यायपालिका की इतिहास में नजीर पेश करेगा."
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पैसिव यूथेनेशिया मानने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने 338 पन्ने के जजमेंट में कई अहम निर्देश दिए हैं. पहला कोर्ट ने इसे "पैसिव यूथेनेशिया" मानने से इनकार किया है. मनीष ने कहा, "यूथेनेशिया का मतलब एक्टिविटी होना है, और एक्टिविटी पूरे देश में मनाही है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे विद होल्डिंग (With Holding) और विद ड्राइंग (With Drawing) कहा है. हरीश राणा के केस में यह विथ ड्राइंग होगा. यानी उसके शरीर में जो भी ट्यूब लगी है उसे रिमूव किया जाएगा."
दूसरा कोर्ट ने देश भर के सभी जिलों के चीफ मेडिकल ऑफिसर्स (CMOs) को अपने यहां प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड बनाने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि अगर कोई ऐसा मरीज आता है जो लंबे वक्त से बीमार है, तो मेडिकल बोर्ड उसकी जांच कर अपनी रिपोर्ट सबमिट करेगा. इस रिपोर्ट पर जुडिशल मजिस्ट्रेट संज्ञान लेंगे और फिर इसके बाद सरकार कोई फैसला करेगी." अदालत के फैसले का फायदा यह होगा कि उस व्यक्ति (मरीज) को कोर्ट आने के बजाय पहले मेडिकल बोर्ड के पास जाना होगा और वहीं से कई चीजें साफ हो जाएंगी.
अब कोर्ट के निर्देश के तहत एक महीने के भीतर सभी को अपनी रिपोर्ट सबमिट करनी है. मनीष जैन ने कहा, "जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 11 मार्च को अपना फैसला सुनाया था. इसके तहत अब 11 अप्रैल से पहले सभी सीएमओ को अपनी रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल करनी होगी. इस दौरान यह भी रिपोर्ट किया जाएगा कि सरकार के स्तर पर क्या कार्रवाई हुई."
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परिवार संपर्क में लेकिन हरीश की स्थिति का पता नहीं
हरीश राणा 14 मार्च से नई दिल्ली स्थित एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती हैं. मनीष ने बताया कि हरीश के शरीर में कुल तीन ट्यूब लगी हैं. गले से बलगम निकालने के लिए एक ट्यूब लगी है. दूसरा पेट में फीडिंग के लिए पीईजी और तीसरा यूरिन के लिए ट्यूब लगी है. इन्हीं ट्यूब को चरणबद्ध तरीके से निकाला जाएगा. फिलहाल एम्स में क्या हो रहा है इस बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है. मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है इसीलिए आधिकारिक तौर पर हरीश की स्थिति के बारे में किसी को कोई अपडेट नहीं है. उन्होंने कहा, "हरीश के पिता से मेरी लगातार बात होती रहती है. परिवार ठीक है लेकिन अब मैंने भी हरीश का हाल-चाल लेना बंद कर दिया है. हरीश जिस स्थिति में है उसमें कुछ पूछना ठीक नहीं है."
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ब्रह्मकुमारी के जरिए परिवार से हुआ संपर्क
मनीष बताते हैं कि परिवार ब्रह्मकुमारी के जरिए ही उनके संपर्क में आया था. सिस्टर लवली ने हरीश के पिता से उनकी मुलाकात कराई थी. इसके बाद से वह परिवार से जुड़ गए और लगातार उन्होंने हर स्तर पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराई. वो कहते हैं, "हरीश के केस के बावजूद अभी भी इच्छा मृत्यु लेना इतना आसान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट और सरकार ने जो गाइडलाइन बनाई है उसके तहत ही व्यक्ति को प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा, तभी जाकर उसे इच्छा मृत्यु मिल सकती है. लेकिन हां इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह केस अन्य लोगों के लिए नजीर जरूर पेश करेगा."
मनीष कहते हैं कि उनके लिए यह सब कुछ आसान नहीं था. कई स्तर की लंबी लड़ाई के बाद यह फैसला आया है और उन्हें उम्मीद है कि हरीश के केस के जरिए अब उन तमाम लोगों को राहत मिलेगी जो लंबे समय से इच्छा मृत्यु की आस लगाए हैं.













