ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल मस्जिद... सुप्रीम कोर्ट के समझौते प्रस्ताव से हिंदू-मुस्लिम दोनों का इनकार

वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल के जामा मस्जिद से जुड़े विवाद लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट में अटके हैं. बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों मामलों में समझौते के लिए एक प्रस्ताव दिया था, लेकिन हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों ने इस प्रस्ताव पर असहमति जता दी है.

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वाराणसी का ज्ञानवापी मस्जिद.
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  • ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि व संभल मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों समझौते का प्रस्ताव दिया था.
  • लेकिन सर्वोच्च अदालत के इस समझौते प्रस्ताव से हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्ष ने इनकार कर दिया.
  • हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्ष का कहना है कि यह व्यापक जनहित का मामला है.
नई दिल्ली:

वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह भूमि विवाद और उत्तर प्रदेश के संभल जामा मस्जिद विवाद में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित आपसी सहमति से विवाद समाधान प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है. दोनों पक्षों का कहना है कि इन मामलों का निपटारा अदालत में कानूनी आधार पर ही होना चाहिए. उनका कहना है कि ये मुद्दा एक जगह का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का है.

सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमित से समझौते का दिया था प्रस्ताव

दरअसल  सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने हाल ही में तीनों मामलों के सभी पक्षकारों को पत्र भेजकर “सुप्रीम कोर्ट एक्शन फॉर मेडिएटेड एडजुडिकेशन एंड डिस्प्यूट्स हार्मोनाइजेशन अक्रॉस नेशन (समाधान समारोह-2026)” के तहत समझौते के जरिए समाधान तलाशने का प्रस्ताव दिया था

दोनों पक्षों ने कहा- ऐसे समझौते में नहीं होंगे शामिल

इस पहल का समापन 21 से 23 अगस्त के बीच आयोजित विशेष लोक अदालत में होना है. हालांकि, हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं और तीनों मस्जिदों की प्रबंधन समितियों ने सुप्रीम कोर्ट तथा संबंधित राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को सूचित किया है कि वे इस मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेने के इच्छुक नहीं हैं.  

जनहित के मामले, लोक अदालत या आपसी मध्यस्ता से समझौता सही नहीं

मामलों से जुड़े वकीलों और पक्षकारों का कहना है कि पूजा स्थलों पर स्वामित्व, संवैधानिक अधिकारों और व्यापक जनहित से जुड़े ऐसे संवेदनशील मामलों का फैसला अदालत द्वारा ही किया जाना चाहिए, न कि लोक अदालत या मध्यस्थता के माध्यम से. मस्जिद प्रबंधन समितियों के प्रतिनिधियों ने भी कहा कि वे विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर हैं, लेकिन इन मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजने के इच्छुक नहीं हैं

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लोक अदालत में नहीं जाएगा मामला

सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्षों के इस रुख के बाद अब इन चर्चित मामलों के अगस्त में होने वाली विशेष लोक अदालत में शामिल होने की संभावना लगभग समाप्त हो गई है. गौरतलब है कि समाधान समारोह-2026 की घोषणा  इस साल अप्रैल में की गई थी. इसका उद्देश्य लंबित मामलों का स्वैच्छिक और सहमति आधारित समाधान कराना है.

अब सु्प्रीम कोर्ट को लेना होगा अंतिम फैसला

इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन पोर्टल और एक केंद्रीय समन्वय तंत्र भी स्थापित किया है. तीनों विवादों में व्यापक कानूनी और संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं, जिनमें पूजा स्थल  अधिनियम, 1991 की व्याख्या और उसके दायरे से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं. इन मामलों पर अंतिम फैसला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. 

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