बर्न मरीजों के उपचार को लेकर सरकार की सख्ती, हॉस्पिटल के लिए जारी किए नए मानक

केंद्र सरकार ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को रोकने की दिशा में अहम फैसला किया है  एंटीबायोटिक दवाईयों को लेकर सख्ती दिखाते हुए नए मानकों में निर्देश दिया है कि बिना जरुरत यह बर्न मरीजों को नहीं दी जाएगी.

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अब बर्न मरीजों के इलाज में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. अस्पताल संसाधन की कमी का हवाला देकर इलाज को रोक नहीं सकेंगे और मरीजों को घंटों इंतजार भी नहीं करा सकेंगे. केंद्र सरकार ने इसको लेकर नए मानक दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिसे देशभर के अस्पताल में लागू किया गया है. इसमें सरकार ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अस्पताल में इलाज की सुविधा नहीं है तो मरीज को स्थिर कर सीधे उस अस्पताल में भेजेगा, जहां बेहतर इलाज हो सके.

पीएचसी से लेकर मेडिकल कॉलेज की जिम्मेदारी तय 

नए मानकों के तहत पहली बार बर्न के इलाज को लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज तीनों स्तरों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की गई है. इसमें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को पहली बार लिखित रूप में इलाज की जिम्मेदारी दी गई है. पीएचसी को अब 10% से कम जले मरीज का प्राथमिक उपचार करना होगा. उनके पास ठंडा करना (कूलिंग), ड्रेसिंग और टिटनेस इंजेक्शन उपलब्ध होगा. मरीज की स्थिति का आंकलन कर समय पर रेफरल देना जरुरी होगा. अगर सुविधा उपलब्ध नहीं है तो मरीज को वहीं रोकना गलत माना जाएगा. ऐसे मामलों में मरीज को सीधे जिला अस्पताल भेजना होगा.  इसी तरह के नियम जिला अस्पताल पर भी लागू होंगे और सुविधा न होने पर तत्काल मरीज को मेडिकल कॉलेज रैफर करना होगा.

केंद्र सरकार ने राज्यों को जारी इन मानकों का चयन 21 डॉक्टरों की संयुक्त समिति की सिफारिश पर किया है. इसमें नई दिल्ली स्थित एम्स में बर्न के एचओडी डॉ मनीष सिंगल भी शामिल हैं  डॉ. सिंघल का कहना है कि आज भी बर्न मरीज को कई घंटे अस्पतालों में रोक लिया जाता है, जिससे संक्रमण और मौत का खतरा बढ़ जाता है.

बर्न यूनिट को लेकर मेडिकल कॉलेजों में सख्ती 

नए गाइडलाइन के तहत टर्शियरी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में बर्न यूनिट अनिवार्य कर दी गई है. यहां शुरुआती तीन से पांच दिन में त्वचा प्रत्यारोपण करना होगा. वहीं, एयरवे मैनेजमेंट और वेंटिलेशन के अलावा फिजियोथैरेपी, साइकोलॉजिकल काउंसलिंग और रिहैब टीम भी यहां होंगी. डॉ मनीष सिंघल ने बताया कि देश के कई मेडिकल कॉलेजों में आज भी बर्न मरीजों को सामान्य सर्जरी वार्ड में रखा जाता है, जिससे संक्रमण और जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है, साथ ही उपचार में चुनौती पैदा होने की संभावना रहती है.

बर्न मरीज अवसाद और सुसाइड के जोखिम से गुजरते हैं यह पहली बार सरकारी गाइडलाइन में माना गया है इसलिए मनोवैज्ञानिक प्राथमिक उपचार, काउंसलिंग और फॉलो-अप को इलाज का हिस्सा बनाया है. साथ ही संख्या- जैसे पोजिशनिंग, स्प्लिंटिंग, प्रारंभिक गतिशीलता और संकुचन रोकथाम की थेरेपी को भी अनिवार्य किया है. कुछ परिस्थितियों में मरीज का सीधे रैफरल अनिवार्य किया है. इनमें  केमिकल बर्न खासकर आंखों से जुड़ा मामला, इलेक्ट्रिकल बर्न, शरीर को चारों ओर से जकड़ने वाले बर्न, धुएं से सांस की चोट और 40 प्रतिशत से अधिक गहरे बर्न शामिल हैं. इन मामलों में मरीज को बीच के किसी अस्पताल में नहीं रोका जाएगा, सीधे बर्न सेंटर या बर्न आईसीयू भेजा जाएगा.

बच्चे और महिलाएं सबसे अधिक शिकार 

सरकारी दिशानिर्देशों में यह माना गया है कि महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक भारत में बर्न से जूझते हैं. गांव और शहर के गरीब इलाकों में महिलाएं रसोई में आग, गैस, केरोसिन और सिंथेटिक कपड़े और बच्चे गर्म पानी, दूध, तेल और खुले चूल्हे से अक्सर जल जाती हैं.  सरकार ने स्वीकार किया है कि महिलाओं के कई बर्न से जुड़े केस घरेलू हिंसा, असुरक्षित रसोई और सामाजिक उपेक्षा से भी संबंधित होते हैं. चेहरे और हाथों के बर्न से गुजरने वाली महिलाओं को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है जबकि बच्चों के मामलों में देखरेख की कमी और फर्स्ट एड की जानकारी का अभाव सबसे बड़ा कारण है.

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एक से डेढ़ लाख मरीजों की हर साल होती है मौत 

सरकारी आंकड़ों की मानें तो भारत में 60 से 70 लाख लोग प्रति वर्ष बर्न की घटनाओं का शिकार होते हैं जबकि 1 से 1.5 लाख मरीजों की मौत हो जाती है. इसके बावजूद अब तक बर्न के इलाज के लिए देश में कोई एकरूप और बाध्यकारी व्यवस्था नहीं थी. नए मानकों में सरकार ने स्वीकार किया है कि बर्न सिर्फ एक चोट नहीं, बल्कि क्रोनिक डिजीज है, जिसका उपचार लंबे वक्त तक चलता है और जिसमें सर्जरी,  मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और पुनर्वास तक की जरूरत होती है.

एएमआर रोकने के लिए उठाये कदम 

केंद्र सरकार ने एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को रोकने की दिशा में अहम फैसला किया है  एंटीबायोटिक दवाईयों को लेकर सख्ती दिखाते हुए नए मानकों में निर्देश दिया है कि बिना जरुरत यह बर्न मरीजों को नहीं दी जाएगी. निर्देश में रूटीन प्रोफिलैक्टिक एंटीबायोटिक पर रोक लगाते हुए कहा है कि दवा केवल संक्रमण या सेप्सिस में दी जाए और हर बर्न यूनिट अपनी एंटीबायोटिक पॉलिसी बनाएगा.

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