बंगाल का कसाई गोपाल पाठाः जिसने कोलकाता को पाकिस्तान बनने से रोकने की लड़ी थी लड़ाई

आजादी के करीब आठ दशक बाद गोपाल पाठा की कहानी पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है. ये कहानी आज और भी प्रासंगिक हो गई है. कौन है गोपाल पाठा जिनके नाम पर कोलकाता की एक सड़क करने से छिड़ा है बंगाल में संग्राम?

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  • बंटवारे से पहले 1946 में मुस्लिम लीग चाहती थी कि कोलकाता, पाकिस्तान का हिस्सा बने.
  • 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के आह्वान पर कोलकाता में 'डायरेक्ट एक्शन डे' के दौरान भीषण हिंसा भड़की.
  • तब गोपाल पाठा व अन्य हिंदू समूहों ने प्रतिरोध किया. दावा है- इसी प्रतिरोध ने मुस्लीम लीग की कोशिशें कमजोर की.

1947 में भारत की आजादी एक तरफ खुशी तो दूसरी तरफ ऐसा दर्द भी लेकर आई, जिसकी टीस आज भी कई परिवारों और पीढ़ियों में महसूस की जाती है. देश के बंटवारे से पहले बंगाल और पंजाब हिंसा की आग में झुलस रहे थे. इसी दौर में कोलकाता की गलियों से एक ऐसा नाम उभरा, जिसे कुछ लोग शहर का रक्षक मानते हैं, तो कुछ लोग उसे बेहद विवादित शख्सियत के रूप में देखते हैं. यह कहानी है गोपाल चंद्र मुखर्जी की, जिन्हें दुनिया गोपाल पाठा के नाम से जानती है.

गोपाल पाठा उर्फ गोपाल चंद्र मुखर्जी का जन्म 1913 में कोलकाता में हुआ था. उनके परिवार का कॉलेज स्ट्रीट इलाके में मांस बेचने का कारोबार था. बंगाली पाठा, बकरे को कहते हैं और इसी वजह से उन्हें गोपाल पाठा कहा जाने लगा.

करीब 5 फीट 4 इंच लंबे गोपाल पाठा का व्यक्तित्व देखने में एक साधारण सज्जन जैसा था. लंबे बाल, दाढ़ी और मूंछ उनके चेहरे की पहचान थे. लेकिन उस दौर में पुलिस उन्हें एक ऐसे गैंग लीडर के रूप में जानती थी, जिसके इशारे पर सैकड़ों युवक खड़े हो सकते थे.

समय के साथ उनका नाम कोलकाता के सबसे प्रभावशाली और चर्चित लोगों में गिना जाने लगा.

जब कोलकाता के भविष्य पर मंडराने लगा खतरा

1940 के दशक तक भारत का राजनीतिक माहौल तेजी से बदल रहा था. मुस्लिम लीग दो-राष्ट्र सिद्धांत को आगे बढ़ा रही थी और पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ रही थी.

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उस समय पूर्वी बंगाल मुस्लिम बहुल था, लेकिन बड़े उद्योग और व्यापारिक केंद्र मुख्य रूप से कोलकाता और हावड़ा जैसे शहरों में थे. ऐसे में मुस्लिम लीग के लिए कोलकाता का महत्व बेहद बढ़ गया था.

यहीं से शुरू हुई उस संघर्ष की कहानी, जिसने आगे चलकर पूरे शहर को हिंसा की आग में झोंक दिया.

मोहम्मद अली जिन्ना
Photo Credit: AFP

डायरेक्ट एक्शन डे और खून से रंगी सड़कों की कहानी

16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया. उद्देश्य था ताकत का प्रदर्शन कर कोलकाता को पाकिस्तान के दायरे में लाने का दबाव बनाना.

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इसके बाद शहर में हिंसा भड़क उठी. घर जलाए गए, दुकानों में लूटपाट हुई, हत्याएं हुईं और महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएं सामने आईं.

कोलकाता कई दिनों तक भय और अराजकता के साये में डूबा रहा.

जब गोपाल पाठा ने संभाली कमान

17 अगस्त तक हालात और बिगड़ चुके थे. इसी दौरान गोपाल पाठा और उनके साथियों ने जवाबी मोर्चा संभाला.

उनके साथ कई स्थानीय संगठन और युवा समूह भी जुड़ गए. जो हथियार मिल सके, उनके सहारे उन्होंने अपने लोगों को संगठित किया.

गोपाल पाठा को डर था कि अगर विरोध नहीं हुआ तो कोलकाता पाकिस्तान का हिस्सा बन सकता है. इसी सोच के साथ उन्होंने अपने समर्थकों को जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार किया.

कुछ ही दिनों में हालात ऐसे बने कि कोलकाता को पाकिस्तान में शामिल करने का सपना पूरा होता दिखाई नहीं दिया.

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महात्मा गांधी
Photo Credit: AFP

गांधी की अपील भी नहीं बदल सकी उनका फैसला

1947 में जब महात्मा गांधी कोलकाता पहुंचे, तब उन्होंने शांति का संदेश दिया. कई लोगों ने हथियार छोड़ दिए.

लेकिन गोपाल पाठा अपने फैसले पर अड़े रहे.

उनका कहना था कि जब कोलकाता हिंसा की आग में जल रहा था, तब जिन लोगों ने अपने परिवार खोए, उनकी पीड़ा को भुलाना आसान नहीं था. यही वजह थी कि उन्होंने अपने हथियार तक सौंपने से इनकार कर दिया.

प्रतीकात्मक तस्वीर
Photo Credit: PTI

क्या गोपाल पाठा मुस्लिम विरोधी थे?

यही वह सवाल है, जिस पर आज भी सबसे ज्यादा बहस होती है.

गोपाल पाठा को अक्सर हिंदुओं के रक्षक के रूप में पेश किया गया. लेकिन उनका परिवार इस बात से सहमत नहीं है कि उन्हें केवल मुस्लिम विरोधी व्यक्ति के रूप में देखा जाए.

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परिवार का दावा है कि 1946 के दंगों के दौरान उन्होंने कई मुस्लिम परिवारों की भी मदद की. उनके घर की छत पर मुस्लिम परिवारों को शरण दी गई. एक रिक्शा चालक के परिवार को भी सुरक्षित बचाया गया.

परिवार का कहना है कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय आज भी उनका सम्मान करता है.

गोपाल पाठा ने अपने लोगों को दो स्पष्ट आदेश दिए थे. पहला, किसी भी तरह की लूटपाट नहीं होगी. दूसरा, किसी महिला के साथ दुर्व्यवहार नहीं होगा, चाहे वह किसी भी समुदाय की हो. उनका मानना था कि संघर्ष के दौर में भी कुछ सीमाएं कभी नहीं टूटनी चाहिए.

2005 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके नाम पर चल रही बहस आज भी खत्म नहीं हुई है.

बीते वर्ष गोपाल पाठा का नाम एक फिल्म की वजह से चर्चा में आया था और अब उनके नाम पर सड़क करने से. यही वजह है कि उनकी विरासत को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है.  

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