- प्रमुख विपक्षी पार्टी ने E20 पर नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र पर अपने हमले तेज कर दिए हैं.
- नीति आयोग ने 2021 की अपनी एक रिपोर्ट में E10 और E20 पेट्रोल से माइलेज को होने वाले नुकसान पर लिखा है.
- इसमें बताया गया था कि पुरानी गाड़ियों के माइलेज पर इथेनॉल पेट्रोल का क्या असर पड़ता है.
भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की योजना कोई नई नहीं है. पिछले कई वर्षों से सरकार पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ा रही है ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो, किसानों को नया बाजार मिले और प्रदूषण घटाया जा सके. इसी योजना का ऐसा ही बड़ा कदम है E20 पेट्रोल, जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है. लेकिन E20 लागू होने के बाद अब देश में नई बहस छिड़ गई है. मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने नीति आयोग की 2021 की नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए E20 पेट्रोल पॉलिसी पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
उनका आरोप है कि सरकार बगैर पर्याप्त तैयारियों के यह ईंधन लागू कर रही है. विपक्ष सरकार पर सवाल उठा रहा है, कई उपभोक्ता पुराने वाहनों को लेकर चिंता जता रहे हैं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. ऐसे में चलिए समझते हैं कि इस पूरे विवाद के बीच 2021 में जारी नीति आयोग का एक रोडमैप चर्चा में क्यों आया और नीति आयोग ने उस रोडमैप में इथेनॉल फ्यूल के बारे में क्या-क्या बताया था?.
E20 क्या है और सरकार ने क्या बताया?
E20 ऐसा ईंधन है जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है. इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाने वाला जैव ईंधन है. सरकार का कहना है कि अगर पेट्रोल में ज्यादा इथेनॉल मिलाया जाएगा तो भारत को कम कच्चा तेल आयात करना पड़ेगा. इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा और कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलेगी. हाल ही में पेट्रोलियम मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार ने 2014-15 से अब तक 1.84 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा का बचत किया है. इससे 302 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की कम खरीद करनी पड़ी.
नीति आयोग कि E20 पर 2021 में जारी रोडमैप
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E20 पर 2021 की नीति आयोग की रिपोर्ट क्या कहती है?
विवाद की सबसे बड़ी वजह यह है कि 2025 से देशभर में E20 को मानक पेट्रोल के रूप में उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि लक्ष्य 2030 तक लागू करने का था. साथ ही 2021 में नीति आयोग और पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक रोडमैप जारी किया था जिसमें इसके लिए चरणबद्ध रणनीति सुझाई गई थी.
नीति आयोग की इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अप्रैल 2022 से पूरे देश में E10 को लागू कर दिया जाएगा. फिर अप्रैल 2023 से E20 ब्लेंड करने की चरणबद्ध शुरुआत करनी होगी, जिसमें सभी स्टेकहोल्डर्स जैसे- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां, गाड़ी बनाने वाली कंपनियां, सर्विस स्टेशन, डिस्टिलरी और उद्यमी सभी ये कदम साथ उठाएंगे और इसे सक्षम बनाएंगे.
इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि जब तक बड़ी संख्या में वाहन पूरी तरह E20 के अनुकूल नहीं हो जाते, तब तक E10 यानी 10 प्रतिशत इथेनॉल वाला पेट्रोल भी उपलब्ध रहना चाहिए.
आलोचकों का कहना है कि व्यवहार में उपभोक्ताओं के पास यह विकल्प लगभग खत्म हो गया. साथ ही सरकार ने हाल में जारी अपनी रिपोर्ट में भी इसका साफ जिक्र किया कि E20 के साथ E10 या E15 के पेट्रोल पंपों पर मिलते रहने की गुंजाइश नहीं है.
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रिपोर्ट में माइलेज पर क्या कहा गया था?
इस रिपोर्ट में E20 के इस्तेमाल पर माइलेज को लेकर यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इससे माइलेज में कमी आती है. इस रिपोर्ट के पहले पन्ने पर ही लिखा है कि जिन चार पहिया वाहनों के इंजन E0 यानी शून्य इथेनॉल के लिए बनाए गए थे और जिन्हें E10 तक के लिए कैलिब्रेट किया गया है, उनकी माइलेज में 6 से 7 फीसद तक की कमी आने का अनुमान जताया गया था. जबकि ऐसे ही दोपहिया वाहनों में माइलेज की गिरावट 3 से 4 फीसद की गिरावट आती है. वहीं जिन चार पहिया वाहनों को E10 के लिए कंपनियों ने तैयार किया था और उन्हें E20 के लिए कैलिब्रेट किया गया तो उनमें 1 से 2 फीसद माइलेज की कमी देखी गई है.
माइलेज में आई कमी से उबरने का उपाय क्या है?
इसी रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया था कि माइलेज में आई इस कमी को कैसे इंजन में कुछ मामूली बदलाव से ठीक किया जा सकता है. भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माताओं की सोसाइटी (SIAM) के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि इंजन के हार्डवेयर में थोड़े से बदलाव और ट्यूनिंग करके ब्लेंड ईंधन से होने वाले माइलेज के नुकसान को कम किया जा सकता है.
नीति आयोग की इस रिपोर्ट में साथ ही ईथेनॉल ब्लेंड किए गए ईंधन से दक्षता घटने की स्थिति में ग्राहकों की भरपाई के लिए, E10 और E20 ईंधन पर टैक्स में छूट पर विचार करने का सुझाव भी दिया गया था.
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2021 की नीति आयोग की रिपोर्ट में किस पर जोर दिया गया था?
इस रिपोर्ट का उद्देश्य E20 लागू करने का रास्ता बताना था, न कि उसका विरोध करना. इसमें मुख्य रूप से कहा गया था कि E20 को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए. ऑटो कंपनियां E20 के अनुकूल इंजन विकसित करें. तेल कंपनियां आपूर्ति व्यवस्था तैयार करें. उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी दी जाए कि उनका वाहन किस ईंधन के लिए उपयुक्त है. पुराने वाहनों के लिए E10 की उपलब्धता पर भी विचार किया जाए, ताकि यह बदलाव आसान हो. यानी रिपोर्ट का जोर बदलाव को धीरे-धीरे लागू करने पर था.
विरोध करने वालों की सबसे बड़ी दलील क्या है?
विरोध करने वालों का कहना है कि देश में अभी भी लाखों पुराने दोपहिया और चारपहिया वाहन ऐसे हैं जिन्हें E20 के हिसाब से डिजाइन नहीं किया गया था. उनकी मुख्य चिंताएं हैं कि सभी वाहन E20 के इस्तेमाल करने में सक्षम हैं या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है. कुछ मामलों में माइलेज कम होने की शिकायतें सामने आई हैं. सरकार ने अपनी ताजी रिपोर्ट में माइलेज के कुछ कम होने की संभावना से इनकार नहीं किया है लेकिन यह भी कहा है कि यह विभिन्न अन्य कारणों से भी संभव है. वहीं, पुराने इंजन में लंबे समय तक इस्तेमाल का प्रभाव क्या होगा, इस पर उपभोक्ताओं में सवाल हैं. ऐसे में अगर ई10 उपलब्ध ही नहीं होगा तो वाहन मालिकों के पास विकल्प सीमित हो जाएंगे और मजबूरी में उन्हें अपने वाहन बदलने पड़ेंगे. इसी आधार पर कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में भी दायर की गई हैं.
सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार इन आशंकाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताती है. सरकार का कहना है कि भारत हर साल बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है. E20 इस निर्भरता को कम करने का महत्वपूर्ण कदम है. इथेनॉल की मांग बढ़ने से गन्ना और मक्का जैसे कृषि उत्पादों के किसानों को लाभ मिलेगा. इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने में मदद मिलेगी. साथ ही यह भी बताया गया है कि नए E20 अनुकूल वाहनों को ध्यान में रखकर उद्योग पहले से तैयारी कर चुका है. यह भी कहा गया है कि E20 की अनुकूलता को लेकर कई परीक्षण किए गए हैं और इसके इस्तेमाल से इंजन पर नकारात्मक असर के पड़ने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है.
ऑटो कंपनियां क्या कह रही हैं?
अधिकांश प्रमुख वाहन निर्माता सरकार के साथ मिलकर E20 के अनुकूल वाहन बाजार में ला चुके हैं. वाहन उद्योग का कहना है कि नए मॉडल E20 के अनुरूप डिजाइन किए गए हैं. हालांकि एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि वाहन मालिक अपनी गाड़ी की कंपनी से जारी ईंधन संबंधी सलाह अवश्य देखें.
फिर सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा?
E20 नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कहा गया है कि उपभोक्ताओं को विकल्प मिलना चाहिए. पुराने वाहनों के हितों का ध्यान रखा जाए. इससे जुड़ी नीति लागू करने से पहले पर्याप्त वैज्ञानिक और तकनीकी समीक्षा हो. दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा दीर्घकालिक फैसला है.
इस विवाद का सबसे बड़ा सवाल क्या है?
दिलचस्प बात यह है कि विवाद E20 को लागू करने को लेकर कम, उसे लागू करने के तरीकों और हड़बड़ाहट पर ज्यादा है. लगभग सभी पक्ष मानते हैं कि इथेनॉल ब्लेंड पेट्रोल भविष्य की जरूरत हो सकता है. लेकिन सवाल यही है कि क्या इसे लागू करते समय पुराने वाहन मालिकों के हितों को ध्यान में रखा गया? क्या उपभोक्ताओं और ईंधन विकल्पों को समुचित अहमियत दी गई? इसी वजह से 2021 की नीति आयोग रिपोर्ट आज फिर चर्चा में है.
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई, सरकार के अगले कदम और ऑटो उद्योग की तैयारी इस बहस की दिशा तय करेंगे. यदि अदालत या सरकार पुराने वाहनों के लिए अलग व्यवस्था या ईंधन विकल्प पर कोई फैसला लेती है, तो E20 नीति में कुछ बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं.
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